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घर में ही मशरूम की खेती कर बनातीं हैं स्वादिष्ट प्रोडक्ट्स; मिला ‘बेस्ट फार्म वुमन’ का अवॉर्ड!

कभी दिन में दो वक़्त की रोटी के लिए भी परेशान रहने वाली अनिमा आज महीने के लगभग 30, 000 रुपये कमा रहीं हैं।

श्चिम बंगाल में उत्तर दीनाजपुर जिले के चोपरा ब्लॉक के एक छोटे से गाँव, दंधुगछ की रहने वाली अनिमा मजूमदार को महिंद्रा समृद्धि अवॉर्ड-2019 में ‘बेस्ट फार्म वुमन अवॉर्ड ऑफ़ इंडिया’ के खिताब से सम्मानित किया गया। अनिमा को यह सम्मान मशरूम की अच्छी खेती और प्रोसेसिंग करके मशरूम के उम्दा प्रोडक्ट्स बनाने के लिए मिला है।

एक मध्यम वर्गीय परिवार से आने वाली अनिमा ने कभी भी नहीं सोचा था कि एक दिन उन्हें इस तरह का कोई सम्मान मिलेगा या फिर उनके जानने-पहचानने वाले लोग उन्हें ‘मशरूम लेडी’ के नाम से पुकारेंगे। आज से चार साल पहले तो उनके पास अपनी बेटी की फीस के लिए भी पैसे नहीं थे, लेकिन फिर मशरूम फार्मिंग पर एक ट्रेनिंग ने सब कुछ बदल दिया।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए अनिमा ने बताया, “हमारे पास सिर्फ 1 बीघा ज़मीन है और उसी में हमारा घर है और बाकी में, मेरे पति मुर्गी पालन करते हैं। मैं भी उनकी मदद करती थी क्योंकि इसी से खर्च चलता था।”

Anima Majumder, Mushroom Farmer

 

लेकिन फिर गाँव के लोगों ने उनका मुर्गी-पालन का काम बंद करवा दिया क्योंकि इससे आस-पड़ौस में काफ़ी बदबू रहती थी। मुर्गी-पालन का काम बंद होने के बाद अनिमा और उनके पति को कोई रास्ता नहीं नज़र आ रहा था। उन्हें लगा कि शायद अब उन्हें गाँव से निकलकर दिहाड़ी-मजदूरी के लिए शहर जाना पड़े। क्योंकि उनके पास इतना भी साधन नहीं था कि वे घर के राशन का भी खर्च चला पाएं।

“फिर एक दिन मुझे कृषि विज्ञान केंद्र का पता चला जो कि हमारे गाँव के पास में ही है। वहां से कोई न कोई गाँव में किसानों को ट्रेनिंग वगैरह के लिए बुलाता रहता था। मैंने भी सोचा कि मैं भी जाकर देखूं तो वहां पर डॉ. अंजलि शर्मा मैडम से बात हुई। उन्होंने बोला कि तुम मशरूम की खेती ट्राई करो। उसमें ज़्यादा लागत नहीं है और जल्दी रिजल्ट मिलता है,” उन्होंने आगे बताया।

उत्तर बंगा कृषि विश्वविद्यालय के उत्तर दीनाजपुर कृषि विज्ञान केंद्र में ‘गृह विज्ञान’ की स्पेशलिस्ट, डॉ. अंजलि शर्मा के मार्गदर्शन में अनिमा ने मशरूम फार्मिंग पर 3 दिन की ट्रेनिंग ली। यहाँ से ट्रेनिंग लेने के बाद उन्होंने अपने घर में ही मशरूम फार्मिंग के लिए पूरा सेट-अप तैयार किया। अनिमा बताती हैं कि शुरू में मशरूम के 200-300 बीज भी उन्हें कृषि विज्ञान केंद्र से ही मिले।

 

Dr. Anjali Sharma wth all the farmers during mushroom farming training

 

कैसे होती है मशरूम की खेती?

डॉ. अंजलि शर्मा ने मशरूम फार्मिंग के बारे में बताते हुए कहा कि भारत के किसान तीन किस्म के मशरूम उगा सकते हैं-

१. ऑयस्टर मशरूम,

२. बटन मशरूम और

३. मिल्की यानी कि दुधिया मशरूम

ऑयस्टर मशरूम की खेती पूरे साल होती है, जबकि बटन मशरूम को सर्दियों में और मिल्की मशरूम को गर्मियों में लगाया जाता है।

“मशरूम की खेती के लिए आपको बीज लगाने से पहले भी थोड़ी तैयारी करनी होती है। वैसे तो इस खेती के लिए ज़रूरी चीज़ें अपने आस-पास ही आपको मिल जाएंगी जैसे कि पुआल (धान का भूसा) को सबसे पहले पानी में भिगोया जाता है। इसमें कार्बेंडाजिम और फॉर्मलीन भी मिलाये जाते हैं और फिर इस पुआल को किसी चारपाई/चटाई आदि पर फैलाया जाता है,” डॉ. शर्मा ने बताया।

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अच्छी तरह से सूखने के बाद इस भूसे को पॉलीबैग में भरा जाता है। पुआल की तीन लेयर बैग में लगानी होती हैं। एक लेयर लगाने के बाद उसमें बीज को किनारे-किनारे रखकर उस पर फिर से एक और लेयर लगाया जाता है। इन्हें ऊपर से रबड़ से बाँध दिया जाता है और चारों ओर 10-12 छिद्र कर दिए जाते हैं।

Preparing polybags to grow mushroom (Right) and harvesting oyster mushroom (left)

 

इन पॉलीबैग को एक बंद कमरे में बांस आदि लगाकर रस्सियों से लटका सकते हैं। यह इंफ्रास्ट्रक्चर आप अपने खेतों में या फिर अपने घर के ही किसी कमरे में भी तैयार कर सकते हैं। डॉ. शर्मा कहती हैं कि किसान मशरूम की एक पूरी फसल दो से ढाई महीने में ले सकते हैं।

लेकिन सबसे ज़रूरी बात है कि मशरूम के बीज यदि एक महीने से ज़्यादा पुराने हो तो वो खराब हो जाते हैं। यदि आप उन्हें लैब में कम तापमान में रखते हैं तभी वे एक महीने तक ठीक रहते हैं। वरना बहुत बार तो ये बीज एक हफ्ते से भी ज़्यादा दिन तक नहीं रहते। मशरूम की खेती में भी तापमान का बहुत ध्यान रखना पड़ता है।

 

मशरूम की प्रोसेसिंग में है मुनाफा:

अनिमा बताती हैं कि उन्होंने मशरूम की खेती पर ट्रेनिंग लेकर अपने घर में ही मशरूम यूनिट पर काम किया। सबसे पहले कृषि विज्ञान केंद्र की मदद से उन्होंने पूरा इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार किया और फिर बीज लगाए। मशरूम का उत्पादन तो उनके यहाँ काफ़ी अच्छा हुआ क्योंकि उन्होंने बहुत ही मेहनत और तरीके से अपनी फसल पर काम किया था।

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Promotion

लेकिन अब समस्या थी कि इसे बेचा कहाँ जाये? “हमारे गाँव में तो कोई परिवार मशरूम खरीदने और खाने के बारे में नहीं सोच सकता। ऐसे में, सबसे पास सिलीगुड़ी शहर ही था, तो मैं और मेरे पति लगभग दो घंटे का सफर करके वहां के बाज़ार में अपनी फसल बेचने जाते। मैंने उत्पादन पर मेहनत की तो मेरे पति ने बाज़ार पर ध्यान दिया।”

 

Making different products from Mushroom

 

धीरे-धीरे अनिमा को मशरूम की खेती में अच्छा उत्पादन मिलने लगा। क्योंकि उनका फार्म तैयार था और अब उन्हें सिर्फ़ बीज लगाने होते हैं। इसके अलावा, पहली फसल से जो कुछ भी बचता, उसे वह खाद की तरह इस्तेमाल करती हैं। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती उनके लिए यही रहती कि अगर कभी उनकी पूरी मशरूम की फसल नहीं बिकी तो क्या? क्योंकि मशरूम को ज़्यादा दिन तक नहीं रखा जा सकता।

ऐसे में, एक बार फिर वह डॉ. अंजलि शर्मा के पास पहुंचे। डॉ. शर्मा बताती हैं कि यह समस्या सिर्फ़ अनिमा को ही नही बल्कि उनके यहाँ से ट्रेनिंग लेने वाले ज़्यादातर किसानों को होती है। ख़ासकर कि एकदम गाँव-देहात में रहने वाले किसान। इसलिए उन्होंने अपनी टीम के साथ मिलकर इन किसानों को फार्मिंग के साथ-साथ, मशरूम की प्रोसेसिंग करके उसके प्रोडक्ट्स बनाने की ट्रेनिंग भी शुरू की।

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अनिमा ने मशरूम प्रोसेसिंग की ट्रेनिंग ली और फिर उन्होंने मशरूम का अचार, पापड़ और दालेर बोरी (दाल की बड़ियाँ) बनाना शुरू किया। वह कहती हैं कि अब मशरूम से भी ज़्यादा उनके इन प्रोडक्ट्स की मांग बढ़ गयी है। खासकर कि पापड़ की, बहुत बार तो वह जितने भी पापड़ के पैकेट लेकर बाज़ार पहुँचती हैं, वह भी कम पड़ जाते हैं।

“अब हम दिन का 800 से 1000 रुपये तक कमा लेते हैं। कभी-कभी तो 1200 रुपये भी हो जाता है। पहले से स्थिति बहुत- बहुत ज़्यादा ठीक हुई है। सबसे बड़ा तो कि अपनी बेटी की फीस टाइम पर दे रहे हैं। अभी भी लगातार विज्ञान केंद्र से जुड़े हुए हैं, कुछ भी होता है तो डॉ. शर्मा मैडम से बात करते हैं,” अनिमा ने आगे कहा।

Selling her products in the market

 

कभी दिन में दो वक़्त की रोटी के लिए भी परेशान रहने वाली अनिमा आज महीने के लगभग 30, 000 रुपये कमा रहीं हैं। उनकी यह तरक्की न सिर्फ़ उनके अपने लिए बल्कि उनके इलाके में बहुत से लोगों के लिए प्रेरणा का स्त्रोत बन गयी है। उनके बाद से गाँव में और भी लोगों ने मशरूम की खेती करना शुरू किया है। लोगों की थोड़ी बढ़ती तादाद देखकर डॉ. शर्मा और उनकी टीम ने एक ‘फार्मर इंटरेस्ट ग्रुप’ बना दिया है और इसकी केशियर भी अनिमा ही है।

उन्होंने इन सभी किसानों को FSSI सर्टिफिकेट भी दिलाया है ताकि उनके प्रोडक्ट्स बिना किसी परेशानी के बाज़ारों में जा सकें। इसके अलावा, वे शहर के कुछ सुपरमार्केट से भी इन किसानों को जोड़ने की कोशिश में हैं। डॉ. शर्मा कहती हैं कि उन्होंने अब तक 400 से भी ज़्यादा किसानों को ट्रेनिंग दी है। जैसे-जैसे मशरूम प्रोसेसिंग में उनके पास किसानों की संख्या बढ़ेगी तो वे एक ‘फार्मर प्रोड्यूसर कंपनी’ भी शुरू करवाना चाहती हैं।

 

Anima receiving Mahindra Smariddhi Award for Best Farm Woman

 

अनिमा मजूमदार की सीखने की ललक और मेहनती स्वभाव के चलते उनकी सफलता को देखते हुए ही डॉ. शर्मा ने महिंद्रा समृद्धि सम्मान के लिए उनका नाम भेजा। इस सम्मान के साथ अनिमा को 2,11, 000  रुपये का इनाम भी मिला, जो बेशक किसी भी किसान परिवार के लिए बहुत बड़ी बात है।

अनिमा अब डॉ. शर्मा के मार्गदर्शन में मशरूम के बीज बनाने की ट्रेनिंग भी कर रही हैं। क्योंकि मशरूम के बीज अभी भी किसानों को आसानी से नहीं मिल रहे हैं। ऐसे में, मशरूम के बीज बनाने की ट्रेनिंग होने से, वे इस क्षेत्र में भी अपना व्यवसाय बढ़ा सकते हैं।

यदि आप मशरूम की खेती से संबंधित कोई जानकारी चाहते हैं या फिर ट्रेनिंग करना चाहते हैं, तो अपने गाँव या शहर के पास उपलब्ध किसी भी कृषि विज्ञान केंद्र में जाकर जानकारी हासिल कर सकते हैं!

संपादन – मानबी कटोच 

Summary: Anima Majumder from Dandhugachh village of Chopra Block of Uttar Dinajpur District in West Bengal is a successful Mushroom Farmer. She has received “National level Mahindra Samridhi Award – 2019” in the young farm women category. Anima is a progressive farm woman working under the technical guidance of Uttar Dinajpur Krishi Vigyan Kendra. She has received the award for her significant contribution to “Mushroom Production, Mushroom Spawn Production, and its value addition”.


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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