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राजकुमारी गुप्ता: काकोरी कांड में बिस्मिल और अशफ़ाक के साथ था इनका भी हाथ!

राजकुमारी की क्रांतिकारी गतिविधियों का सच काकोरी कांड के बाद खुला। शायद बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि काकोरी कांड में सेनानियों के लिए हथियार पहुंचाने की ज़िम्मेदारी राजकुमारी ने ली थी।

देश के लिए मर-मिटने वालों की फ़ेहरिस्त में एक और अनसुना नाम शामिल होता है और वह है – राजकुमारी गुप्ता। यह नाम न तो स्कूल की इतिहास की किताबों में मिलेगा और न ही उनके बारे में गूगल पर कोई ख़ास जानकारी आपको हासिल होगी।

पर देश पर खुद को कुर्बान करने वाली इस महान बेटी की अनसुनी और अनकही कहानी को हम तक पहुँचाया है सागरी छाबरा की लिखी एक किताब, ‘इन सर्च ऑफ़ फ्रीडम: जर्नीज़ थ्रू इंडिया एंड साउथ-ईस्ट एशिया‘ ने। छाबरा पिछले 20 सालों से स्वतंत्रता संग्राम के सेनानियों के बारे में लिख रही हैं।

साल 1902 में उत्तर प्रदेश के कानपूर जिले के बाँदा जिले में एक पंसारी के घर में राजकुमारी का जन्म हुआ। सिर्फ़ 13 साल की थीं राजकुमारी, जब उनकी शादी मदन मोहन गुप्ता से कर दी गयी। मदन उस समय राष्ट्रीय कांग्रेस के सदस्य थे और आज़ादी की लड़ाई में काफी सक्रिय थे।

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दोनों ही पति-पत्नी को गांधी जी के आदर्शों ने काफ़ी प्रभावित किया और वे उनके आन्दोलनों से जुड़ गये। पर राजकुमारी पर गाँधी जी की अहिंसावादी सोच के साथ-साथ क्रांतिकारियों के विचारों का भी प्रभाव पड़ा। जैसे-जैसे समय बीता उन्हें लगने लगा कि सिर्फ़ बातों से आज़ादी नहीं मिलेगी। स्वतंत्रता के लिए हथियार उठाने ही पड़ेंगे।

देखते ही देखते राजकुमारी, चन्द्रशेखर आज़ाद की हिंदुस्तान सोशलिस्ट रिपब्लिकन एसोसिएशन का हिस्सा बन गयीं और उनके गुप्त संदेश एक जगह से दूसरी जगह पहुंचाने लगीं। वक़्त के साथ, उन्हें आज़ाद के सबसे क़रीबी क्रांतिकारियों के गुट में शामिल कर लिया गया।

चंद्रशेखर आज़ाद (साभार)

हालांकि, उनकी ये सभी क्रांतिकारी गतिविधियाँ, उनके पति और ससुराल वालों से छिपी हुई थीं। क्योंकि उनके पति गांधीवादी विचार रखते थे।

राजकुमारी की क्रांतिकारी गतिविधियों का सच काकोरी कांड के बाद खुला। शायद बहुत ही कम लोग जानते होंगे कि काकोरी कांड में सेनानियों के लिए हथियार पहुंचाने की ज़िम्मेदारी राजकुमारी ने ली थी। उन्होंने इस ज़िम्मेदारी को बख़ूबी निभाया भी। एक बार उन्होंने कहा भी था, “हम ऊपर से गांधीवादी थे और नीचे से क्रांतिवादी।”

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रिपोर्ट्स के मुताबिक, राजकुमारी अपने कपड़ों में हथियार छिपा कर अपनी तीन साल की बेटी के साथ खेतों से गुज़र रही थीं, जब उन्हें गिरफ्तार किया गया। उनके परिवार को जब उनकी गिरफ्तारी का पता चला तो उन्होंने राजकुमारी को अपने घर से बेदखल कर दिया। उनके सभी अपनों ने उनसे रिश्ते तोड़ लिए।

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यहाँ तक कि उनके ससुराल वालों ने ‘वीर भगत’ अखबार में खबर भी छपवाई कि उनका राजकुमारी से कोई रिश्ता नहीं है। फिर भी वह अपनी राह चलती रहीं, स्वतंत्रता की लड़ाई में कई बार जेल गयीं और देश के लिए खुद को समर्पित कर दिया।

साभार: यूट्यूब

उनका जिक्र सुरुचि थापर-ब्जोर्केर्ट द्वारा लिखी गयी किताब, “वीमेन इन इंडियन नेशनल मूवमेंट: अनसीन फेसेस एंड अनहर्ड वॉइसेस’ में भी मिलता है। किताब के एक अंश के मुताबिक, राजकुमारी ने एक कविता कही थी,

“तिरंगा है झंडा हमारा,
बीच चरखा चमकता सितारा
शान है ये इज्जत हमारी,
सिर झुकाती है हिन्द सारी,
चाहे सब कुछ ख़ुशी से छोड़ना
वीरो ना झंडा झुकाना
गोलियों की झड़ी अब लग गयी थी,
नींव आज़ादी की पड़ी थी।”

राजकुमारी गुप्ता ने अपनी पूरी ज़िंदगी गर्व और स्वाभिमान के साथ जी। अपने देश के लिए उन्हें चाहे जो भी खोना पड़ा हो, लेकिन उन्हें कोई शिकायत नहीं रही। छाबरा को दिए े इंटरव्यू के दौरान उन्होंने कहा था, “हमको जो करना था, किया।”

भारत को अपनी इस महान बेटी पर गर्व है। हम उम्मीद करते हैं कि देश के ऐसे अनसुने, अनकहे नायक-नायिकाओं को इतिहास में अपना हिस्सा मिलेगा!

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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usha vishwkarma

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