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इंजीनियर का इनोवेशन बना रहा है किसानों को सक्षम; खेत के कचरे से अब बनाते हैं ईंधन!

इस ईंधन को किसान घरों में तो इस्तेमाल करते ही हैं और साथ ही, बाकी को 7 रुपये से लेकर 10 रुपये प्रतिकिलो के हिसाब से बाज़ार में बेच एक अच्छी आमदनी भी कमा सकते हैं!

मुझे मिट्टी के चूल्हे पर बना खाना बहुत पसंद है। आज भी कभी-कभी जब घर में मम्मी चूल्हे पर रोटियां सेंकती हैं तो हम सारे बहन-भाई चूल्हे को घेर कर बैठ जाते हैं। पर कुछ ही देर में जैसे ही धुंआ आँखों में लगता है तो वहां से भाग खड़े होते हैं। हम चंद पल भी धुंआ बर्दाशत नहीं कर सकते।

पर भारत में आज भी न जाने कितने ही गांवों में अनगिनत महिलाएं खाना पकाते हुए इस धुएं को झेलती हैं। और सिर्फ महिलाएं ही नहीं बल्कि घर के बच्चे भी इसका शिकार होते हैं। बहुत बार तो धुएं की वजह से उन्हें खांसी व दमा जैसी बीमारियाँ भी हो जाती हैं। रिपोर्टस के अनुसार, दुनिया में हर साल लगभग 3. 8 मिलियन लोगों की मौत घरों में धुएं आदि के चलते होने वाले वायु-प्रदूषण से होने वाली बिमारियों जैसे न्यूमोनिया, स्ट्रोक, सांस लेने में तकलीफ़ आदि के कारण होती है।

ऐसे में, सवाल आता है कि आख़िर लकड़ी और उपलों के अलावा कौनसा ईंधन इस्तेमाल करें? भले ही सरकार द्वारा एलपीजी गैस सिलिंडर सबसिडी पर दिया जा रहा है, लेकिन ग्रामीण महिलाओं को चूल्हे पर ही खाना बनाना भाता है।

इसलिए हमें ऐसा कोई विकल्प चाहिए जोकि पर्यावरण के अनुकूल भी हो और जिसमें धुंआ भी ना के बराबर हो। पर सबसे ज़रूरी बात यह है कि यह आसानी से ग्रामीण इलाकों में मिल भी जाए। ऐसे में, हमारी तलाश खत्म होती है बायोमास ब्रिकेट पर।

बायोमास ब्रिकेट, एक किफायती, इको-फ्रेंडली और बहुत ही कारगर ईंधन का विकल्प है, लेकिन सवाल आता है कि आख़िर इसे बनाया कैसे जाये? वैसे तो बाज़ारों में ब्रिकेट बनाने की बड़ी-बड़ी मशीनें उपलब्ध हैं लेकिन ये मशीनें इतनी महंगी हैं कि आम ग्रामीण इसे नहीं खरीद सकते।

ग्रामीणों की इन्हीं सब समस्याओं को जान-समझकर,गुजरात के एक इंजीनियर, दर्शील पांचाल ने एक ऐसी हाथ से चलने वाली ब्रिकेटिंग मशीन बनाई है, जिससे बहुत ही आसानी से ये ब्रिकेट्स बनाये जा सकते हैं। इस मशीन को न तो बिजली की ज़रूरत है और न ही पेट्रोल-डीजल की। हाथ से चलने वाली यह मशीन बहुत ही कम वजन की है और कम स्थान घेरती है।

अपनी बनायी मशीन के साथ दर्शील पांचाल

गुजरात के वापी में रहने वाली दर्शील ने अमेरिका से इंडस्ट्रियल इंजीनियरिंग में मास्टर्स की डिग्री हासिल की है। अमेरिका से लौटने के बाद उन्होंने अपने फैमिली बिज़नेस, एस. के. इंजीनियर्स में काम करना शुरू किया, जहाँ वे अलग-अलग इंडस्ट्रीस के लिए मशीनरी बनाते हैं। पर दर्शील कुछ अलग करना चाहते थे।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया,

“एक सोशल फाउंडेशन के साथ काम के दौरान मुझे पता चला कि कैसे आज भी गांवों में औरतें पारम्परिक ईंधन के चलते बहुत सी बिमारियों का शिकार होती हैं। मैं चाहता था कि उनके लिए ऐसा कोई ईंधन उपलब्ध हो जो कि उनके लिए सस्ता भी हो और अच्छा भी हो। जब मैं इस पर काम कर रहा था तो मुझे बायोमास ब्रिकेट्स के बारे में पता चला।”

क्या हैं बायोमास ब्रिकेट?

ब्रिकेट्स

कृषि में बचने वाले जैविक कचरे जैसे कि भूसा, पराली, फूस आदि और किचन वेस्ट व गोबर आदि को इस्तेमाल करके ये ब्रिकेट बनाये जाते हैं। यह कोयले का जैविक विकल्प है। एक ब्रिकेट लगभग 15-20 मिनट तक जलता है और यह  पुर्णतः पर्यावरण के अनुकूल है। साथ ही, ये बहुत ही हल्के होते हैं और इन्हें स्टोर करना भी बहुत ही आसान है।

खेतों में बचने वाले कचरे को अक्सर किसान जला देते हैं, पर यह बहुत ही कारगर साबित हो सकता है, ये उन्हें पता ही नहीं है। बाकी जिसे थोड़ी-बहुत जानकारी है, वह अक्सर यह सोचते हैं कि ब्रिकेट कैसे बनाये जाएँ। दूसरी तरफ, देश में ज़्यादातर बॉयलर प्लांट्स में इन ब्रिकेट्स को इस्तेमाल किया जा रहा है। जिसके लिए व्यवसायी गांवों से बहुत ही कम दामों में जैविक कचरा खरीदते हैं और फिर इलेक्ट्रिक मशीनों से उससे ब्रिकेट्स बनाकर, इंडस्ट्री में इस्तेमाल करते हैं।

दर्शील ने सोचा कि क्यों न गाँव के इस साधन को उनके भले के लिए ही इस्तेमाल किया जाए।

अपने आईडिया पर काम करते हुए उन्होंने एक मैन्युअल ब्रिकेटिंग मशीन का ड्राफ्ट तैयार किया, जो कि ग्रामीण भारत के लिए एक अच्छा इनोवेशन साबित हो।

क्या है प्रक्रिया?

दर्शील बताते हैं कि ब्रिकेट बनाने की प्रक्रिया बहुत ही सरल है। कोई भी इसे आसानी से अपने रोज़मर्रा के काम करते हुए बना सकता है। सबसे पहले सभी तरह के कूड़े-कचरे, एग्री-वेस्ट, किचन वेस्ट, कागज़ आदि को छोटे-छोटे टुकड़ों में काटा जाता है। फिर इसमें थोड़ा पानी और गोबर मिलाकर स्लरी तैयार की जाती है। जब यह मिश्रण थोड़ा गाढ़ा हो जाता है तो इसे मशीन में डालकर ब्रिकेट का आकार दिया जाता है।

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आकार देने के बाद ब्रिकेट्स को दो-तीन दिन के लिए सुखा दिया जाता है। इन ब्रिकेट्स को आप घर में ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर सकते हैं और साथ ही, बाज़ार में आप इसे 7 रुपये से 10 रुपये प्रति किग्रा के हिसाब से बेचकर एक अच्छी आमदनी भी कमा सकते हैं।

ब्रिकेटिंग मशीन

दर्शील बताते हैं कि ब्रिकेट्स बनाने की क्षमता के हिसाब से उन्होंने मैन्युअल ब्रिकेटिंग मशीन के अब तक 3 मॉडल बनाये हैं। यदि दो व्यक्ति प्रतिदिन 8 घंटे इन मशीन पर काम करें तो ब्रिकेटिंग लीवर प्रेस मॉडल से एक घंटे में 20-25 ब्रिकेट्स बना सकते हैं। पूरे दिन में लगभग 40 किलोग्राम ब्रिकेट्स बनाने की इस मशीन की क्षमता है। और इस मशीन की कीमत जीएसटी समेत आपको 16, 000 रुपये पड़ती है।

तो वहीं 22, 000 रुपये की कीमत वाली ब्रिकेटिंग जैक मशीन की क्षमता एक दिन में 64 किलोग्राम ब्रिकेट्स और प्रति घंटा 35-40 ब्रिकेट्स बनाने की है। तीसरा मॉडल, ब्रिकेटिंग हाइड्रोलिक जैक है, जिससे आप 90 किलोग्राम ब्रिकेट्स प्रतिदिन और 48-56 ब्रिकेट्स प्रतिघंटा बना सकते हैं। इसकी कीमत 28, 000 रुपये है।

इन मशीन की ख़ासियत के बारे में बात करते हुए दर्शील ने कहा,

“हमारी मशीनें बहुत ही कम वजन की हैं और फोल्डबल हैं। इन्हें कोई भी आसानी से उठाकर एक जगह से दूसरी जगह ले जा सकता है। इसके अलावा किसी बिजली की ज़रूरत नहीं और ना ही कोई ख़ास रख-रखाव करना पड़ता है।”

दर्शील के मुताबिक उनकी कंपनी अब तक 200 मशीनें बेच चुकी है। उन्होंने मणिपुर, मध्य-प्रदेश, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, कर्नाटक, राजस्थान और झारखंड जैसे राज्यों में मशीनें दी हैं। हालांकि, उन्होंने बताया कि वे सीधे तौर पर ग्रामीण समुदायों को बहुत कम मशीनें दे पाएं हैं। ज़्यादातर, इन ग्रामीण इलाकों में काम कर रहे संगठनों ने उनसे ग्रामीण रोज़गार को बढ़ावा देने के लिए मशीनें खरीदी हैं।

प्रक्रिया ब्रिकेट्स बनाने की

“हम जिन भी संगठनों या फिर स्वयं सहायता समूहों को मशीनें देते हैं, उन्हें जाकर एक बार इसे इस्तेमाल करने की ट्रेनिंग भी देकर आते हैं। प्रक्रिया बहुत ही आसान है इसलिए बहुत ही कम बार होता है कि हमें दोबारा कभी जाना पड़े,” उन्होंने बताया।

ब्रिकेटिंग मशीन के अलावा, दर्शील ने कचरा-प्रबंधन के लिए भी मशीन बनाई है। वे कहते हैं कि अक्सर प्लास्टिक या फिर कृषि के कचरे को ही व्यवस्थित ढंग से कहीं रीसाइक्लिंग या प्रोसेस के लिए भेजना मुश्किल हो जाता है। क्योंकि यह बहुत जगह घेरता है और यूँ ही बिखरा-बिखरा रहता है।

इसलिए उन्होंने ऐसी मशीन बनायी है जिससे कि इस कचरे को कॉम्पैक्ट करके, व्यवस्थित किया जा सके। इससे यह वेस्ट मैनेज भी हो जायेगा, स्टोरेज में भी जगह कम जाएगी और ट्रांसपोर्टेशन तो बहुत ही आसानी से हो जायेगा।

दर्शील अंत में कहते हैं कि उनका मुख्य उद्देश्य ग्रामीण भारत के लिए इको-इनोवेशन करना है। जो कम लागत के हों और उनकी दैनिक ज़िंदगी का हिस्सा बनकर, उनके लिए एक रोज़गार का साधन जुटाने में मददगार हों। कोई भी ग्राम पंचायत उनसे ये मशीनें लेकर अपने गाँव में इनस्टॉल कर सकती है। इससे गाँव में कचरा-प्रबंधन भी होगा और गाँव के लोगों के लिए ईंधन के साथ-साथ अतिरिक्त आय भी बनेगी।

दर्शील पांचाल से संपर्क करने के लिए 9638780377 पर डायल करें या फिर आप उन्हें contact.skengineers@gmail.com पर मेल कर सकते हैं!

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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