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वो ‘मुंबई’, जो शायद आपने देखी न हो!

”आमतौर पर मेरी वॉक से पास-पड़ोस के लोग ज्‍यादा जुड़ते हैं, मुझे काफी अच्‍छा लगता है जब खुद बांद्रावासी मेरे साथ अपनी ही जडों को टटोलने निकल पड़ते हैं और अचानक उन्‍हें लगता है कि वे एलिस इन वंडरलैंड की तरह हैं।”

बंबई अभिभूत करता है, अपनी खूबसूरती या बदसूरती या अपने पेशेवर अंदाज़ या अपनी बेफिक्री और बेताबियों से नहीं बल्कि कदम-कदम पर बदलते अपने तेवर से। धारावी का लंबा इलाका अचंभित न सही मगर मन के किसी कोने को कोंचता जरूर है तो चौपाटी के समुद्री किनारे पर शहरी भीड़भाड़ के बीच अकेलेपन के झूठे अहसास में डूबे जोड़ों की गलबहियां खुशफहमियत की तरफ ले जाती रहती हैं। अपने कई-कई द्वीपों के भीतर कई हजार द्वीप छिपाए खड़ा है बॉम्बे।

डॉ भाऊ दाजी लाड संग्रहालय

 

बगदादी यहूदी मुहल्‍लों की सैर

रटे-रटाए टूरिज्‍़म के मुहावरे आपको मरीन ड्राइव या गेटवे ऑफ इंडिया और जुहू-चौपाटी ले जाकर छोड़ आते हैं। वहां भीड़-भाड़ है, बेशक ऐतिहासिक ताज लैंड्स और लियोपोल्‍ड भी है। लेकिन मुंबई के अतीत में झांकना हो, कला, इतिहास, धरोहरों से रूबरू होना हो तो फोर्ट चले आइये। फोर्ट नेबरहुड में छिपे इसके बगदादी यहूदी मुहल्ले चौंकाते हैं, कहीं पारसी सरगोशियां हैरान करती हैं, काला घोड़ा में फैशन और आर्ट के दिलचस्‍प मिज़ाज लुभाते हैं तो छत्रपति शिवाजी टर्मिनस यानी सीएसटी की भव्‍य इमारत आकर्षित करती है। आपको हैरानी होगी जानकर कि देश में ताजमहल के बाद यही वो इमारत है जिसे सबसे ज्‍यादा सैलानी देखने आते हैं।

नज़दीक है एशियाटिक सोसायटी लाइब्रेरी जिसकी 1830 में निर्मित इमारत ग्रीक आर्किटैक्‍चर से प्रेरित है।

काला घोड़ा के फैशनेबल कैफे हाउसों और डिजाइनर स्टोर्स वाली एक पतली-सी गली में बढ़ते हुए केनेसेथ एलियाहू साइनागॉग की दोमंजिला नीली इमारत से आपका सामना होगा। इसे जैकब इलियास डेविड ने अपने मरहूम पिता इलियाहू ससून की याद में बनवाया था। 1884 में यह साइनागॉग बनकर पूरा हुआ और देखते ही देखते यह आसपास बसने वाले उन बगदादी यहूदियों का प्रमुख इबादतखाना बन गया जो 19वीं सदी में मुंबई आकर बसने लगे थे। यही वो जगह है जहां आकर मुंबई के बग़दाद, बसरा, बुशायर के धुंधलाए रिश्‍ते समझ आते हैं।

डेविड ससून का मुंबई

फोर्ट का यह इलाका कभी उन यहूदियों से आबाद था जो बग़दाद के दाऊद पाशा के जुल्मों से परेशान हो अपना वतन छोड़कर आए थे। 1832 में डेविड ससून अपने परिवार के संग मुंबई पहुंचे थे और देखते ही देखते तेल, कपड़ा मिलों से लेकर चीन के साथ अफीम का कारोबार उन्हें कलकत्ता, हांगकांग, कैन्टॉन, शंघाई से लेकर जापान के योकोहामा और नागासाकी शहरों तक में शोहरत दिला चुका था। उनकी डेविड ससून एंड कंपनी मुंबई के कपड़ा मिल कारोबार पर छा गई थी।

डॉ भाऊ दाजी लाड संग्रहालय में डेविड ससून की प्रतिमा

डेविड ससून के ज़माने को बीते आज करीब डेढ़ सौ साल होने को आए हैं और उनके निशान शहर के कुछ हिस्सों में अब भी बुलंदी के साथ चस्पां हैं। जैसे काला घोड़ा में डेविड ससून लाइब्रेरी एंड रीडिंग रूम।
डेविड ससून ने बॉम्बे में 9 टैमरिंड स्ट्रीट को (जिसका हस्ती भी अब बाकी नहीं रही) में अपनी पहली रिहाइश के तौर पर चुना था। यह शहर के भीतर थी (फोर्ट दरअसल, कोई किला नहीं था बल्कि शहर को घेरे खड़ी दीवार की वजह से शहर के इस हिस्से को फोर्ट कहा जाता था)। कुछ ही समय में ससून बायकुला के बंगले में शिफ्ट हो गए जो आज मसीना अस्पताल है। उन्‍होंने बायकुला में यहूदी समुदाय के लिए यहूदी प्रार्थना गृह मैगन डेविड सिनागॉग बनवाया जो हिंदुस्तान के सबसे बड़े और बेहद आकर्षक इस्रायली प्रार्थना गृहों में से है।
फो‍र्ट सैलानियों को मौजूदा मुंबई शहर के उस इतिहास से मिलवाता है जिससे इसके अपने बाशिन्दे तक अनजान हैं।

 

पुर्तगाली धरोहर की सैर

मुंबई का एक खास इलाका है बांद्रा। यहां ऑल्‍टरनेटिव टूरिज्‍़म की इबारत लिख रही हैं अंशु गुप्‍ता। उनकी वन शू ट्रस्‍ट फॉर रिस्‍पॉन्सिबल एंड माइंडफुल ट्रैवल्‍स के साथ आप बांद्रा के पुर्तगाली अतीत को टटोल सकते हैं। अंशु के साथ बांद्रा ‘गांव’ के गली-मुहल्लों को टापते हुए बारहा यह ख्याल आता है जैसे आप गोवा में पहुंच गए हो। बंगलों-फ्लैटों की नेम प्लेट पर फर्नांडीज़, रॉड्रिग्स, साल्सेट कैथॅलिक जैसे नाम चुपके से यह बता जाते हैं कि मुंबई के इस हिस्से का गोवा से जरूर कोई नाता है।

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बांद्रा की गलियों में सुबह-सवेरे का नज़ारा हो सकता है कुछ ऐसा

अंशु कहती हैं, ”खुद बांद्रा के कितने ही बाशिंदों को भी मालूम नहीं होता है कि जहां वे आज बसते हैं उस जगह से बमुश्किल 500 मीटर दूर ही पुर्तगाली जहाज़ी बेड़े पहुंचे थे और मुंबई के द्वीपों पर पुर्तगाल का कब्‍ज़ा हो गया था। यह 16वीं सदी की बात है।”

बांद्रा के उस भूले-बिसरे अतीत को जानने के लिए अंशु के साथ बांद्रा की सैर पर निकल पड़ने का ख्‍याल बुरा नहीं है। यह एक अजब किस्म की विरासत की सैर है जिसमें ऐतिहासिक स्मारकों की जगह उन बंगलों, चर्चों, मुहल्लों, स्कवॉयर, स्ट्रीट्स, सिमिट्री वगैरह ने ले ली है जिन्हें नए दौर के साथ बदलने की कोई हड़बड़ी नहीं है।
अंशु बीते कई सालों से अक्‍सर सवेरे सैर पर जब भी जाती रहीं तो बांद्रा के इस पुर्तगाली अतीत को अपने कैमरों के संग-संग यादों में भी बंद करती चलीं। उन्‍होंने अपने इलाके की धरोहर को निराले अंदाज़ में संजोकर रखने का नाम दिया ”नेबरहुड प्रोजेक्ट” ।

वे कहती हैं – ”अपने ही मुहल्ले को जानना, अपने ही बैकयार्ड को टटोलना, उसके सीने में दबे किस्‍सों-कहानियों को कान लगाकर सुनने का नाम है ”नेबरहुड प्रोजेक्ट” है।

एक रोज़ मैं भी अंशु की सवेरे की सैर का हिस्‍सा बन गई थी और उस हेरिटेज वॉक के बहाने मालूम हुआ कि बांद्रा या वांद्रे (Marathi) उपनगर 24 गांवों का समूह था जो मुख्य रूप से कोली मछुआरों और किसानों से आबाद था। फिर पुर्तगाली शासन के दौरान, 16वीं और 17वीं शताब्दी में इसकी ज्यादातर आबादी ने कैथॅलिक धर्म अपना लिया।
बांद्रा में समुद्रतट से यही कोई सौ-दो सौ फर्लांग दूर खड़ा यह चर्च पुर्तगालियों ने 1616 में बनाया था।

सेंट एंड्रयूज़ चर्च

जब आगरे में ताज बनकर खड़ा हुआ था तब तक इस चर्च ने उम्र के 38 वसंत देख लिए थे! बीत रहे वक़्त का हिसाब कभी रखा है आपने इस अंदाज़ में, जैसा सेंट एंड्रयूज़ चर्च ने रखा है।

 

अंशु की उंगली पकड़कर ख्वाबों के शहर का ये वाला हिस्सा देखकर आपको अचरज होगा कि बेचैन शहर के सीने में इतने सुकून में भी कोई पड़ा हो सकता है। बांद्रा के ये बंगले, रंगों से सराबोर या बेरंग, उनके झड़ते पलस्तर और सरकती ईंटों के बीच वक़्त कहीं तेजी से भागता चला गया है, लेकिन कुछ है जो अब भी वहीं ठिठक गया है।

बांद्रा में पुराना पुर्तगाली शैली का बंगला

इसे ओल्‍ड वर्ल्‍ड चार्म नहीं तो और क्‍या कहोगे आप ? निराले डिजाइन और रंग-बिरंगी बाहरी दीवारों के अपने मोहपाश में बांधने वाले ऐसे बंगलों में से ही किसी में कोई आधुनिक फैशनेबल कैफे चल रहा है या किसी में स्टूडियो खुल चुका है। कोई चुप-सा खड़ा है, कोई चुप रहकर भी बहुत कुछ कह डालता है।

मुंबई का ऐसा दीदार मेरी तो कल्‍पनाओं से परे था। ऊंची-ऊंची अट्टालिकाओं वाले जिस शहर को मैं जानती आयी थी, यह सचमुच उससे एकदम फर्क था।

बॉलीवुड के कुछ सिरे इस हिस्‍से से जुड़े हैं। मसलन, महबूब स्‍टूडियो, सलमान और अरबाज़ खान के ऑफिस और यहां तक कि क्रिकेट सितारे सचिन तेंदुलकर का घर भी बांद्रा की इस सैर के बहाने आप देख सकते हैं।

अंशु कहती हैं, ”मैं विरासत की इस सैर को कराती हूं ताकि लोगों को उन बीते सैंकड़ों सालों के इतिहास की जानकारी हो सके जो उनकी अपनी आंखों के सामने होते हुए भी छिपा रह जाता है।”

हम इसे नहीं देख पाते क्‍योंकि हम अपनी रोज़-बरोज़ की जिम्‍मेदारियों में मसरूफ हैं। लेकिन हमारे अपने ही पास-पड़ोस में इतना सारा इतिहास, संस्‍कृति, खूबसूरती और किस्‍से टंगे हैं।

”आमतौर पर मेरी वॉक से पास-पड़ोस के लोग ज्‍यादा जुड़ते हैं, मुझे काफी अच्‍छा लगता है जब खुद बांद्रावासी मेरे साथ अपनी ही जडों को टटोलने निकल पड़ते हैं और अचानक उन्‍हें लगता है कि वे एलिस इन वंडरलैंड की तरह हैं।”

 

अगर मुंबई की अगली सैर के दौरान ऑल्‍टरनेटिव टूरिज्‍़म आपके भी ज़ेहन में है तो अंशु गुप्‍ता से जुड़ सकते हैं –
Website: http://oneshoetravels.com/
Facebook page: https://www.facebook.com/OneShoeTravels/
Email: oneshoetravels@gmail.com


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Written by अलका कौशिक

अलका कौशिक की यात्राओं का फलक तिब्बत से बस्तर तक, भूमध्यसागर से अटलांटिक तट पर हिलोरें लेतीं लहरों से लेकर जाने कहां-कहां तक फैला है। अपने सफर के इस बिखराव को घुमक्कड़ साहित्य में बांधना अब उनका प्रिय शगल बन चुका है। दिल्ली में जन्मी, पली-पढ़ी यह पत्रकार, ब्लॉगर, अनुवादक अपनी यात्राओं का स्वाद हिंदी में पाठकों तक पहुंचाने की जिद पाले हैं। फिलहाल दिल्ली-एनसीआर में निवास।

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