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9 साल में 5, 000 किसानों तक मुफ़्त देशी बीज पहुंचा चुके हैं यह कृषि अधिकारी!

“साल 2008 में जब कैंसर के चलते मैंने अपनी पत्नी को खो दिया, तो मुझे लगा कि मैं अपने लेवल पर लोगों का स्वास्थ्य सुधारने के लिए जो कर सकता हूँ, ज़रूर करूँगा।”

ध्य-प्रदेश के खरगोन जिले में कृषि विभाग के कृषि विस्तार अधिकारी के रूप में कार्यरत 57 वर्षीय पूर्णा शंकर बार्चे को राज्य के जैव विविधता बोर्ड ने पुरस्कार से सम्मानित किया। बार्चे को यह पुरस्कार उनके देसी बीजों के संकलन, संरक्षण और संवर्धन के लिए किये गये कार्यों के लिए मिला है।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए बार्चे ने बताया,

“प्राकृतिक और जैविक खेती के बारे में मुझे साल 2010 में सुभाष पालेकर जी से सीखने का मौका मिला। उन्होंने ही हमें बताया कि देश में कृषि क्षेत्र का विकास जैविक खेती से ही हो सकता है और इसके लिए आपको देसी बीजों का इस्तेमाल करना होगा। उनकी वर्कशॉप के बाद मैंने अपनी ड्यूटी के साथ-साथ जैविक खेती को बढ़ावा देने के लिए अपने स्तर पर काम शुरू किया।”

पालेकर की वर्कशॉप के बाद बार्चे ने खुद को जैविक खेती के मास्टर ट्रेनर के तौर पर तैयार किया और फिर उन्होंने मध्य-प्रदेश में अलग-अलग इलाकों में जाकर किसानों को ट्रेनिंग देना शुरू किया। इसी सफ़र में उनका एक मुख्य उद्देश्य देसी बीजों का संरक्षण भी रहा। बार्चे बताते हैं कि देसी बीज इकट्ठा करने की उनकी चाह उन्हें सुदूर पहाड़ियों और वनों तक ले गयी, जहाँ आदिवासी किसान खेती करते हैं।

पूर्णा शंकर बार्चे

“इन आदिवासी भाइयों से बहुत सी फसलों जैसे मक्का, गेंहूँ, चावल, ज्वार, अरहर, बाजरा, मूंगफली, भिंडी, गिलकी, उड़द, अमाड़ी, फल और सभी तरह की दालों के देसी बीज हमें मिले। इसके बाद, एक बार हम किसानों के समूह को लेकर महाराष्ट्र के टूर पर गये थे। यहाँ वर्धा के आसपास के इलाकों में जैविक खेती के ही बहुत-से तरीके हमने देखे,” बार्चे ने बताया।

धीरे-धीरे उन्होंने अपना स्वदेशी बीजों का बैंक तैयार कर लिया। फिर वे जहाँ भी वर्कशॉप या फिर ट्रेनिंग के लिए जाते, वहां किसानों को देशी बीज बांटते थे। उन्होंने न सिर्फ़ ट्रेनिंग के दौरान, बल्कि अलग-अलग जगह लगने वाले कृषि मेलों और प्रदर्शनी में भी देशी बीज का प्रचार व प्रसार किया। आज उनका काम इतना फ़ैल चूका है कि मध्य-प्रदेश के अलावा, छत्तीसगढ़, महाराष्ट्र, गुजरात, हरियाणा, पंजाब जैसे राज्यों में भी आज किसान उन्हें ट्रेनिंग के लिए बुलाते हैं। उनसे फ़ोन करके अपने लिए देशी बीज मंगवाते हैं।

“मैं किसानों से ट्रेनिंग-वर्कशॉप या फिर ये देशी बीजों के कोई पैसे नहीं लेता। और मैं जो भी अपने स्तर पर काम करता हूँ, सभी अपनी ड्यूटी के बाद करता है। शाम में छह बजे के बाद या फिर वीकेंड्स पर, मैं किसानों के बुलावे पर जाता हूँ। बहुत बार, अलग-अलग राज्यों के अफसरों ने भी अपने यहाँ किसानों को जैविक खेती सिखाने के लिए आमंत्रित किया है,” उन्होंने बताया।

अब तक, उन्होंने 5 हज़ार से भी ज़्यादा किसानों को देशी बीज पहुंचाए हैं और वह भी बिल्कुल निःशुल्क।

दूर-दराज के क्षेत्रों में भी पहुंचाते हैं देशी बीज

इस कार्य को करने की अपनी प्रेरणा के बारे में बताते हुए बार्चे ने कहा कि सबसे बड़ी प्रेरणा थी कि आज कैसे रसायनों के द्वारा की जा रही खेती से हमारा खान-पान बर्बाद हो रहा है। आज हम केमिकल युक्त अनाज और दाल खा रहे हैं। कहीं न कहीं ये बहुत-सी बिमारियों का कारण भी है।

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“साल 2008 में जब कैंसर के चलते मैंने अपनी पत्नी को खो दिया, तो मुझे लगा कि मैं अपने लेवल पर लोगों का स्वास्थ्य सुधारने के लिए जो कर सकता हूँ, ज़रूर करूँगा। क्योंकि कैंसर पर बात करो तो इसका एक मुख्य कारण कहीं न कहीं हमारा ये केमिकल की खेती से उपजा भोजन भी है। इसलिए मैंने देश में जैविक और प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने का फ़ैसला किया। साथ ही, अपने किसान भाइयों के लिए भी मुझे कुछ करना था,” बार्चे ने कहा।

किसानों को जैविक खेती सिखाकर, बार्चे उन्हें जैविक सर्टिफिकेशन हासिल करने में भी मदद करते हैं। साथ ही, उन्होंने किसानों के जैविक उत्पादों को सही बाज़ार उपलब्ध कराने का ज़िम्मा भी खुद उठाया है। वे बताते हैं कि अच्छी बात है कि अब धीरे-धीरे सभी बड़े शहरों में अब जैविक बाज़ार बन रहे हैं। दिल्ली, पुणे, बंगलुरु आदि की तरह ही हमारे यहाँ इंदौर में भी ‘जैविक सेतु’ के नाम से ऑर्गेनिक मार्किट शुरू हुआ है।

‘जैविक सेतु’ बाज़ार में सिर्फ़ जैविक किसानों से ही उनके उत्पाद टेस्टिंग करने के बाद ख़रीदे जाते हैं और उन्हें उनकी उपज का उचित दाम मिलता है। खरगोन जिले में भी उन्होंने अपने एक किसान साथी से जैविक स्टॉल खुलवाया है। इस स्टॉल पर उन्होंने मिट्टी के बर्तन रखें है और साथ ही, जैविक सब्ज़ियाँ, अनाज, दाल और तेल आदि बेचीं जाती हैं। बार्चे कहते हैं कि इस स्टॉल को काफ़ी अच्छा फीडबैक मिल रहा है।

किसान के लिए खुलवाया जैविक स्टोर

इसके अलावा, उन्होंने एक और पहल की है और वह है लोगों को अपने घरों में किचन गार्डन लगाकर अपनी खुद की सब्ज़ियाँ उगाने के लिए प्रोत्साहित करना। शहर के बड़े से बड़े लोगों से लेकर आम लोगों तक, सभी उनसे अपने बाग-बगीचे के लिए देशी बीज मंगवाते हैं और घर में ही जैविक सब्ज़ियाँ उगाने की ट्रेनिंग भी लेते हैं।

बार्चे सिर्फ़ जैविक खेती में ही नहीं, बल्कि पूरी तरह से इको-फ्रेंडली लाइफस्टाइल जी रहे हैं। उनकी किचन में आपको खाना भी मिट्टी के बर्तनों में पकता हुआ मिलेगा। इसके अलावा, वे खुद तरह-तरह की जैविक खाद, कीटनाशक आदि तैयार करते हैं।

वे कहते हैं,

“आज हम अपने खाने-पीने पर इतना खर्च कर रहे हैं और फिर भी स्वस्थ और पोषण से भरपूर खाना हमें नहीं मिल रहा है तो यह चिंता की बात है। शहर तो शहर गांवों तक भी कैंसर जैसी बीमारियाँ पहुँच गयी हैं और इसका एक मुख्य कारण है हमारी मिट्टी और पानी में केमिकल का पहुंचना। इसलिए मैं बस यही अनुरोध करता हूँ अपने किसान भाइयों से कि जैविक और प्राकृतिक खेती करें। भले ही थोड़ी मेहनत ज़्यादा हो, पर आपना जीवन स्वच्छ और स्वस्थ रहेगा।”

जैविक खाद आदि की मुफ़्त ट्रेनिंग देते हैं बार्चे और निजी जीवन में भी इस्तेमाल करते हैं मिट्टी के बर्तन

पूर्णा शंकर बार्चे अपने पास सीखने के लिए आने वाले किसी भी इंसान को सिखाने से ना नहीं कहते हैं। वे खुद पूरे देश में लोगों को किसानी सिखाने के लिए यात्रायें करते हैं और बहुत बार तो दूसरे राज्यों से लोग उनके घर पर आकर किसानी सीखते हैं।

यदि आप भी जैविक और प्राकृतिक खेती सीखना चाहते हैं या फिर कोई किसान समूह, एक ट्रेनिंग के लिए उन्हें बुलाना चाहता है तो आप पूर्णाशंकर बार्चे जी से 8435446702 पर सम्पर्क कर सकते हैं! साथ ही, कोई भी उनसे फसलों के लिए देशी बीज ले सकता है!

संपादन: भगवती लाल तेली


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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