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गुटखा छोड़, उन पैसों से 7 साल में लगाए 1 हज़ार पौधे!

“एक दिन वाटिका में आग लग गई और 200 पौधे जलकर राख हो गए। उस दिन मैं इतना रोया, जितना शायद अपनी माँ की मौत के समय भी नहीं रोया था। मेरे बच्चों ने मुझे सोच में देखकर आपस में सलाह की और मुझसे बोले, पापा आप एयरटेल के डिश को हटाकर फ्री वाला डिश लगा दीजिए और उन पैसों से पौधों की सुरक्षा के लिए तार की जाली ले आइए।”

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महावीर प्रसाद पांचाल।

रोज़ 30-40 रुपए का गुटखा खा जाना एक आम बात है। लोग स्वाद-स्वाद में लगी इस आदत के कब गुलाम बन जाते हैं, उन्हें पता ही नहीं चलता। ऐसे में कितना भी चाहें पर वे अपनी इस आदत को छोड़ नहीं पाते हैं और आगे चलकर कई भयावह बीमारियों के शिकार हो जाते हैं। लेकिन राजस्थान के एक साधारण व्यक्ति ने नशा छोड़, गुटखा के पैसों से वो कर दिखाया जिसकी किसी ने कल्पना भी नहीं की थी।

ग्राम सहण, तहसील नैनवाँ, जिला बून्दी, राजस्थान के रहने वाले महावीर प्रसाद पांचाल ने गुटखा खाना छोड़, उन पैसों से 1000 पौधे लगा यह साबित कर दिया कि ठान लो तो कुछ भी मुश्किल नहीं।

आज वह लगातार पौधारोपण कर रहे हैं। उन्होंने एक हनुमान वाटिका बनाई है, जिसमें  61 प्रजातियों के 1000 पौधे लहलहा रहे हैं। आइए सुनते हैं उनकी कहानी, उन्हीं की ज़ुबानी…

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महावीर प्रसाद पांचाल।

मैं महावीर प्रसाद पांचाल सहण का रहने वाला हूँ। जिला मुख्यालय से 60 किलोमीटर की दूरी पर मेरा गाँव है। पेड़-पौधों से मुझे बचपन से ही लगाव था। बचपन में जब हम घर बनाना खेलते थे तो मेरा घर सबसे सुंदर होता था। मैं मेरे घर को कनेर, नीम और कुआडिया की टहनियों से सजाता था। बचपन से ही मेरा सपना था कि मैं खूब पेड़ लगाऊं। जब मैं बस से बून्दी या कोटा जाता तो खिड़की के पास बैठकर पर्वतमाला को निहारा करता था। बारिश के दिनों में आम, जामुन, इमली के बीज कहीं भी लगा देता था। हालांकि ये कभी बड़े नहीं हुए, क्योंकि मैं गलत जगह पर इन्हें लगाता था। खैर, बचपन कब निकल गया पता ही नहीं चला।

पढ़ाई-लिखाई और बाद में घर की जिम्मेदारियों में यह शौक दब गया। पढ़ाई के बाद मैंने गाँव में ही किराने की दुकान खोल ली। उसके बाद 2010 में मैंने पास के कस्बे देई में ऑटो पार्ट्स की दुकान खोली और चलाने लगा। 20 जून 2013 की बात है, मैं दुकान पर फुर्सत में बैठा हुआ था, अतीत की स्मृतियां मेरे सामने आ गई।

मैंने सोचा आधी उम्र बीत गई। जिंदगी की भागा दौड़ी में पेड़-पौधों का शौक पीछे छूट गया। उसी समय मेरे एक मित्र पीताम्बर शर्मा दुकान पर आए। मैंने मेरे शौक के बारे में उन्हें बताया तो उन्होंने गाँव में स्थित हनुमान जी के मंदिर की बेकार पड़ी 100 बीघा जमीन पर पौधारोपण की सलाह दी।

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हनुमान वाटिका में अपने लगाए पेड़ों के पास खड़े महावीर और पेड़ों पर आए फल।

मन ने गवाही दी, लेकिन इतने बड़े स्तर पर पौधारोपण के लिए जेब इजाज़त नहीं दे रही थी। दूसरे दिन, मेरे एक मित्र लादू लाल सेन जो दुर्व्यसन मुक्ति मंच के नाम से एनजीओ चलाते थे, किसी काम से दुकान पर आए। मेरे मुँह में गुटखा भरा हुआ था और मैं उनकी बातों का जवाब अजीब सी आवाज में दे रहा था। उन्होंने मुझे गुटखा छोड़ने की सलाह दी और कहा कि इन पैसों को काजू-बादाम खाने में खर्च करो या घर खर्च में लगाओ। क्या मिलता इन्हें खाने से?

उनके जाने के बाद मैंने सोचा कि बात तो सही है। क्या मिलता है गुटखा खाने से। क्यों न गुटखा पर खर्च होने वाली राशि पेड़-पौधे पर लगाई जाए। उन दिनों मैं प्रतिदिन 30-40 रुपए का गुटखा खा जाया करता था। मुझे दिशा मिल चुकी थी। दूसरे दिन, मैं दृढ़ निश्चय के साथ हनुमान जी के मंदिर पहुँचा। हाथ में कुदाली और कुल्हाड़ी थी। वहाँ एक सौ बीघा ज़मीन है जो अंग्रेजी बबूल की झाड़ियों से भरी पड़ी थी।

 

मैंने अंग्रेजी बबूल की झाड़ियों को काटा और गड्ढे खोदे। हाथों में छाले पड़ गए, लेकिन एक जुनून ही था कि मैं अपने काम में लगा रहा। मैं प्रतिदिन सुबह डेढ़ से दो घंटे काम करता था।

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हनुमान वाटिका में सफाई करते महावीर प्रसाद पांचाल।

मैंने उस वर्ष लगभग 2 बीघा ज़मीन से अंग्रेजी बबूल साफ़ किया और उस जगह को हनुमान वाटिका का नाम दिया। उसके बाद मैं सरकारी नर्सरी से पौधे खरीदकर लाया और पौधारोपण किया।

“मेरे लगाए पौधे फलने-फूलने लगे। लेकिन यह कार्य इतना आसान नहीं था, इसमें भी बहुत चुनौतियों का सामना करना पड़ा। कुछ अनुभव की भी कमी थी। गड्ढे ज्यादा गहरे खुद गए थे और पौधे छोटे थे। ऐसे में ज्यादातर पौधे पानी से गल गए। लेकिन मैंने हार नहीं मानी और फिर उन गड्ढों में पौधे लगाए। इस तरह मेरे पौधारोपण का कार्य चलता रहा। नीलगाय और बकरियों ने मुझे बहुत परेशान किया। न जानवर पौधों को नुकसान पहुँचाने से पीछे हटते और न ही मैं हार मानता। खैर, इस तरह पौधे बड़े होते गए।”

29 फरवरी 2016 को मेरे छोटे बेटे अर्जुन का जन्मदिन था। मैं इस दिन से एक नई शुरुआत करना चाहता था। मैंने सोचा हम बच्चों को जन्मदिन पर महंगे-महंगे तोहफे देकर उन्हें भौतिकवादी बनाते हैं और अनजाने में ही उन्हें गलत पाठ पढ़ा देते हैं कि जो महंगे तोहफे देता है, वह ज़्यादा प्यार करता है, जबकि प्रेम और महंगे तोहफों का कोई सम्बन्ध नहीं होता।

 

मैं अपने बच्चे को कीमती तोहफे की जगह जीवनभर काम आने वाली सीख देना चाहता था, इसलिए मैंने निश्चय किया कि मैं इस अवसर पर पौधारोपण कर अपने बच्चे को पर्यावरण संरक्षण से जोडूंगा। 

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महावीर प्रसाद की पर्यावरण संरक्षण की मुहीम में भागीदारी करता उनका बेटा अर्जुन।

इतिहासकार डॉ. एस.एल. नागौरी, मेरे मार्गदर्शक विट्ठल सनाढ्य, लादू लाल सेन सहित ग्रामीणों की मौजूदगी में बेटे के जन्मदिन पर 51 पौधे लगाए गए और इस तरह मेरे कार्य की ख्याति जिले से बाहर भी होने लगी।

लेकिन ईश्वर को कुछ और ही मंजूर था। 1 मार्च 2016 को हनुमान वाटिका के बीच से गुजर रही 11 हज़ार केवी लाइन के तार टूटने से वाटिका में आग लग गई और 200 पौधे जलकर राख हो गए। उस दिन मैं इतना रोया, जितना शायद अपनी माँ की मौत के समय भी नहीं रोया था। इष्ट मित्रों ने सांत्वना दी। शेष बचे पौधों की सुरक्षा टेढ़ी खीर थी। एक ही दिन में बाड़ करनी थी वरना जानवर पौधों को खा जाते। मेरे बच्चों ने मुझे सोच में देखकर आपस में सलाह की और मुझसे बोले, पापा आप एयरटेल के डिश को हटाकर फ्री वाला डिश लगा दीजिए और उन पैसों से पौधों की सुरक्षा के लिए तार की जाली ले आइए।

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हनुमान वाटिका के लिए बाढ़ बनाते महावीर प्रसाद।

दिल भर आया था मेरा। खैर, जैसे-तैसे करके जाली से पौधों की सुरक्षा की। पौधे लगाने का क्रम अनवरत जारी रहा।

मेरे कार्य को देख कर मेरे फेसबुक मित्रों ने एक पौधा उनके नाम से लगाने का अनुरोध किया। चूँकि, हनुमान वाटिका में मैंने किसी का सहयोग नहीं लिया, इसलिए वाटिका के सामने मैंने चार-पांच बीघा जमीन चुनी और उसे फेसबुक वाटिका का नाम दिया। राजस्थान के अलावा अन्य राज्यों के मित्रों ने मुझे ऑनलाइन कुछ रुपए भेजे। मैंने उनके नाम से पौधे लगाए। इसके अलावा मैं पिछले पांच-छह वर्षों से सीडबॉल बनाकर सहण से देई मार्ग पर (10km) फेंक रहा हूँ। इस विधि से लगभग 200-250 नीम लग चुके हैं।

 

इस काम में मेरे बेटे चर्मेश, अर्जुन और बेटियाँ निशा, अम्बिका और मेरी पत्नी मंजू देवी भी मेरा सहयोग करती हैं।

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महावीर प्रसाद को उनके काम में बेटे चर्मेश, अर्जुन और बेटियाँ निशा, अम्बिका व पत्नी मंजू भी साथ देती हैं।

“मैं कोई बड़ा आदमी नहीं हूँ और न ही कोई संस्थान हूँ, लेकिन मैं जिस भी लायक हूँ उसे इस प्रकृति माँ को सौंपना चाहता हूँ। मेरा सपना है कि मेरा गाँव हरा-भरा हो। मैं गाँव से समीपस्थ कस्बा देई तक (10km) सड़क के किनारे पेड़ लगाकर एक ग्रीन बेल्ट तैयार करूँगा।

मैं विशेष अवसरों पर गाँव के लोगों को पौधारोपण के लिए प्रेरित कर उनसे जन्मदिन, शादी की वर्षगाँठ, नौकरी लगने की खुशी, पूर्वजों की स्मृति आदि में फेसबुक वाटिका में पौधे लगवाता हूँ।

आज हनुमान वाटिका में पेड़ों पर फल आने लग गए हैं, लेकिन इन फलों को मैं अपने उपयोग में नहीं लेता। ये सिर्फ पक्षियों के लिए है। मोर, कोयल, तोते, पपीहे, तीतर और नाना प्रकार के रंग बिरंगे पक्षी यहाँ बसेरा करने लगे हैं। खरगोश भी आने लगे हैं। हनुमान वाटिका पक्षियों की प्रजनन स्थली बन गई है। फिल्म कलाकर प्रदीप काबरा, जिला वन संरक्षक सतीश कुमार जैन भी वाटिका में अपने हाथों से पौधे लगा चुके हैं।

 

मुझे ग्राम पंचायत, उपखण्ड अधिकारी, जिला कलक्टर द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। रणथंभौर टाइगर रिजर्व ने भी मुझे सम्मानित किया था। मुझे जिला वृक्षवर्धक पुरस्कार भी मिल चुका है।

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हनुमान वाटिका में पौधरोपण के बाद महावीर प्रसाद को विभिन्न जगहों पर सम्मानित किया गया।

महावीर प्रसाद का काम वाकई सराहनीय है। देश के हर व्यक्ति को उनकी तरह सोच रखते हुए नशा छोड़कर, नशे में लगने वाले पैसे किसी नेक काम में खर्च करने चाहिए। महावीर प्रसाद हम सब के लिए एक प्रेरणा है।

अगर आप भी महावीर जी के इस नेक काम में अपनी ओर से कुछ योगदान दे पर्यावरण को बचाना चाहते हैं तो उन्हें नीचे लिखे पते पर संपर्क कर सकते हैं। आप इस नंबर 96801 03086, 94149 63450 पर उन्हें कॉल भी कर सकते हैं।

महावीर पांचाल
पांचाल ऑटो पार्ट्स
बून्दी रोड देई, तहसील नैनवाँ,
जिला – बून्दी, राजस्थान

 

संपादन – भगवती लाल तेली


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