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शुरुआत : भिक्षावृति में लिप्त नन्हें हाथों में कलम पकड़ा कर बदलाव लाने की ज़िद!

जो बच्चे कभी रेलवे स्टेशन पर घूमते हुए भीख मांगते नजर आते थे। नशावृति और बाल अपराधों में जकड़े हुए थे, वे आज सबसे पहले ईश्वर की प्रार्थना करते हैं। किताबों में अपने सपनों के रंग भरते हैं।

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बच्चों के साथ अभिषेक शुक्ला।

शिकायत का हिस्सा तो हर बार बनते हैं, एक बार निवारण का हिस्सा भी बनते हैं।

यह पंक्ति उत्तर प्रदेश के प्रयागराज के युवा अभिषेक शुक्ला पर सटीक बैठती है, जिन्होंने समाज में बदलाव लाने के लिए खुद शुरुआत की, न कि सरकार या प्रशासन को जिम्मेदार ठहराया। अपनी टीम के जरिये उन्होंने छोटी-छोटी कोशिशों से गरीब एवं स्लम्स में रहने वाले बच्चों के जीवन में बदलाव लाने का काम किया।

जो बच्चे कभी रेलवे स्टेशन पर घूमते हुए भीख मांगते नजर आते थे। नशावृति और बाल अपराधों में जकड़े हुए थे, वे आज सबसे पहले ईश्वर की प्रार्थना करते हैं। किताबों में अपने सपनों के रंग भरते हैं। खेलते-कूदते अंक ज्ञान के साथ ही नन्हे बच्चे बेसिक शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं।

अभिषेक उत्तर प्रदेश के प्रयागराज में अपने संस्थान ‘शुरुआत-एक ज्योति शिक्षा की‘ के जरिये स्लम्स में रहने वाले 125 बच्चों को पढ़ा रहे हैं। इनमें 90 से ज्यादा लड़कियां हैं।

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स्लम के बच्चों के साथ ‘शुरुआत’ की टीम।

शुरुआत की क्लासेस कच्ची बस्ती में ही घरों के बाहर लगती हैं। अभिषेक की टीम बच्चों को पढ़ाई के साथ ही खेलकूद, आर्ट, म्यूजिक, डांस और आत्मरक्षा करना सिखाती हैं। बालिकाओं को मासिक धर्म से जुड़ी जानकारियां और सैनेट्री नैपकिन भी बांटे जाते हैं। बच्चों को गुड टच व बैड टच से भी अवगत कराया जाता है।

यह पूछने पर कि किस चीज़ या घटना ने उन्हें स्लम्स में रहने वाले गरीब बच्चों के लिए कुछ करने के लिए प्रेरित किया, अभिषेक एक किस्सा सुनाने लगते हैं।

“तीन साल पहले रेलवे क्रॉसिंग पर मुझे एक बच्ची भीख मांगती हुई नज़र आई, पहले मैंने उस पर ध्यान नहीं दिया। लेकिन उसके ज्यादा आग्रह करने पर मैं उससे बात करने के लिए राज़ी हो गया। उससे बातचीत में पता चला कि उसकी माँ नहीं हैं और पिता शराब के नशे में डूबे रहते हैं और वो 4 साल के अपने छोटे भाई का भी पालन-पोषण कर रही है। मुझे यह बात झूठी प्रतीत हुई और मैंने उसे उसके घर ले चलने के लिए कहा।”

 

बच्ची अभिषेक को रेलवे क्रॉसिंग के पास ही बनी बस्ती में ले गई। वहाँ का नज़ारा देखकर अभिषेक के पैरो तले जमीन खिसक गई।

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बच्ची को किताब देते अभिषेक।

बच्ची के घर जाकर अभिषेक ने देखा कि उसके पिता नशे में बेसुध थे जबकि छोटा भाई बैठा हुआ था। अभिषेक को विश्वास नहीं हो रहा था कि लोग ऐसा जीवन जीने के लिए मजबूर है।

अभिषेक ने बस्ती के लोगों से बात की और कहा कि अब वे बस्ती के बच्चों को पढ़ाएंगे और काबिल बनाएंगे। बस्ती के लोग उनकी बातों को अनसुना कर रहे थे।

“साहब! ऐसे कई लोग रोज़ यहाँ आते हैं, कुछ पैसे, खाना और कपड़े देकर फोटो खिंचवा कर चले जाते हैं। वे हमें मदद के लिए आश्वासन तो देते हैं लेकिन कुछ ही दिनों में गायब हो जाते हैं। अगर आप भी कुछ ऐसा ही करना चाहते हैं तो कृपया करके हमारी मदद मत कीजिए।” बस्ती के लोगों ने कहा।

लोगों की इस बात ने अभिषेक को झकझोर दिया और देश में 52 लाख से ज्यादा एनजीओ और सामाजिक संस्थाओं की कार्यशैली पर सवाल खड़ा कर दिया। वे सोचने लगे कि उत्सवों एवं कुछ विशेष दिनों पर सेल्फी के लिए स्लम्स का दौरा ज़रूर किया जाता है।

 

लोग अगले दिन अखबार में अपनी फोटो देखकर खुश हो जाते हैं लेकिन स्लम्स के बच्चों की डबडबाई आँखे मदद को तरस जाती हैं। उसी दिन अभिषेक ने प्रण किया कि वे अब इन बच्चों को जरूर पढ़ाएंगे।

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बच्चों को पढ़ाते अभिषेक शुक्ला।

“मैं अगले दिन फिर स्लम्स में गया और पांच बच्चों के साथ पढ़ाने की शुरुआत कर दी। इन बच्चों को हम सीधे पुस्तक हाथ में नहीं दे सकते हैं इसलिए खेलकूद, नाच-गान और छोटे-मोटे प्राइज के जरिये शिक्षा के प्रति जागरूक किया। हम काम करते रहे और धीरे-धीरे बच्चों की संख्या 25 हो गई। अब हमारे लिए मैनेज करना मुश्किल हो रहा था, इसलिए हमने सोशल मीडिया से और अन्य लोगों से मदद की अपील की। इससे लोग मदद के लिए आगे आए और हमारा काम चल निकला,”अभिषेक ने कहा।

अभिषेक आज ‘शुरुआत संस्थान’ के जरिये बच्चों को पढ़ा रहे हैं। वे बच्चों के सर्वांगीण विकास के लिए कंप्यूटर शिक्षा, डांस एवं म्यूजिक और सेल्फ डिफेन्स की क्लासेज भी लगवाते हैं।

‘शुरुआत’ की टीम स्लम्स में रहने वाली औरतों को भी शिक्षित कर रही हैं। कई महिलाएं भी उनके साथ जुड़कर बच्चों को पढ़ाती हैं। यहाँ घरों में झाड़ू-पोंछा करने वाली महिलाओं से लेकर सत्तर साल की अम्मा भी पढ़ने आती हैं। वे बेसिक अंक ज्ञान एवं अपना नाम लिखना सीख रही हैं। अपने बच्चों को बेहतर भविष्य देने के लिए मेहनत के साथ ही स्वाभिमान से जी रही हैं।

 

‘शुरुआत’ की ओर से बेसिक शिक्षा के बाद बच्चों को निजी या सरकारी स्कूल में एडमिशन दिलवाया जाता है और उनकी पढ़ाई का सारा खर्च भी वहन किया जाता है। 

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स्कूल में एडमिशन के बाद ख़ुशी व्यक्त करते बच्चे।

संस्थान के कार्यों को देखते हुए जब बहुत बच्चे पढ़ने आने लगे तो संभालना मुश्किल हो गया। उनकी टीम ने वहां के करीब 20 बच्चों का स्कूल में एडमिशन करवाया, लेकिन ‘शुरुआत’ के युवा सब भी खुद पढ़ने वाले थे। ट्यूशन पढ़ा कर जितना मदद संभव थी उतनी की, लेकिन उसके बाद भी देखा कि काफी संख्या में बच्चे छूट रहे हैं, तो उन्होंने फंड इकट्ठा करने के लिए के अभियान चलाने की सोची।

ऐस में अभिषेक और टीम ने “दीजिए एक बच्चे को शिक्षा, जिससे कोई बच्चा ना मांगे भिक्षा“, कैम्पेन शुरू किया। उन्होंने सोशल मीडिया के जरिये सक्षम लोगों से निवेदन किया कि यदि हर व्यक्ति एक बच्चे की शिक्षा का खर्च जो हर महीने 350 रुपये आता है, उठा ले तो उन बच्चों की जिंदगी संवर जाएगी। इस अभियान को लोगों ने काफी सराहा और आगे बढ़कर मदद की।

 

‘शुरुआत’ के इस खास अभियान में बस्ती के बच्चों ने भी लोगों से मदद मांगी थी ताकि वे पढ़ सके।    

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‘शुरुआत’ के अभियान के तहत बच्चे मदद मांगते हुए ।

‘शुरुआत’ के जरिये पढ़ने वाले बच्चों की संख्या आज 125 पहुंच गई है और मदद के लिए काफी संख्या में लोग आगे भी आ रहे हैं। इस वक्त शहर के चार स्थानों गिरजा घर, रेलवे स्टेशन, सीएमपी के सामने और अलोपीबाग चुंगी के पास बच्चों को पढ़ाया जा रहा है। शहर के युवा जो खुद पढ़ रहे हैं लेकिन अपना कीमती समय निकालकर इन बच्चों के भविष्य को सुधारने में मदद कर रहे हैं।

अभिषेक कहते हैं, “16 सितंबर 2016 को मैंने अकेले ही स्लम एरिया के बच्चों को पढ़ाना शुरू किया। धीरे-धीरे कई लोगों ने सहयोग किया। लगभग सवा साल तक हम लोगों ने ट्यूशन पढ़ाकर अपने खर्चे पर इन बच्चों को पढ़ाने का काम किया। लेकिन अब बच्चों की संख्या बढ़ने लगी और उनकी सामान्य जरूरतों को पूरा करने के लिए हमारे पास फंड नहीं थे।”

इसके बाद अभिषेक ने 13 अक्टूबर 2017 को “ शुरुआत-एक ज्योति शिक्षा की ” का रजिस्ट्रेशन करवाया। अब वे पहले की तुलना में ज्यादा सही तरीके से काम कर रहे हैं।

 

इनकी चाहत है कि बच्चों को बेहतर शिक्षा मिले और ये बच्चे जिंदगी के उच्च मुकाम को हासिल कर सके।

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बच्चों को पढ़ाते हुए ‘शुरुआत’ के सदस्य।

अभिषेक के इस अभियान से वे बच्चे भी जुड़े हैं जिन्होंने अपनी इच्छा से या किसी के प्रयास से 8वीं, 10वीं तक पढ़ाई तो किसी तरह कर ली लेकिन आगे की पढ़ाई करने में सक्षम नहीं थे। ये बच्चे भी स्लम एरिया के ही हैं। इस साल स्लम के काफी बच्चों ने हाईस्कूल और इंटर की परीक्षा भी दी, इसमें बच्चों ने 50 फीसदी से लेकर 84 प्रतिशत तक अंक हासिल किए। इन बच्चों में से कोई प्रशासनिक अधिकारी, कोई डॉक्टर तो कोई इंजीनियर बनना चाहता है।

यहाँ पढ़ने और पढ़ाने वालों में आधे से ज्यादा बेटियां हैं। तीन साल के अथक प्रयास से आधे से ज्यादा बच्चों ने भीख मांगना और नशा करना छोड़ दिया है, जो बचे हैं वे भी छोड़ने के कगार पर हैं। यह शुरुआत है, अभी भी स्लम एरिया की स्थिति बहुत अच्छी नहीं कही जा सकती है। इसलिए अभी यहाँ बहुत कुछ करना बाकी है।

स्लम्स की बेटियां स्लम्स के बच्चों को पढ़ाने के लिए आगे आ रही हैं। ‘शुरुआत’ का मकसद उन्हें केवल शिक्षा देना ही न होकर अच्छा इंसान बनाना भी है ताकि वो अपने परिवार के साथ ही देश के निर्माण में अपनी भागीदारी निभाए।

 

अभिषेक के साथ इस नेक काम में आदित्य, शालिनी, प्रवर, अंजू, अंकिता, अंजलि, पूजा, आशिया, अंजलि, नितिन, नीरज, रुपेश, अमित, विकास, प्रिंशु,अमन, सिद्धार्थ, विकास, शोभित, रवि, विवेक शामिल है। इन युवाओं की टीम ही ‘शुरुआत’ को आगे बढ़ा रही हैं।

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शुरुआत की टीम के सदस्य और अभिषेक।

अभिषेक का कहना है कि समाज में बदलाव लाने की इस पहल में उनकी पूरी टीम का सहयोग है और उन्हीं के बलबूते 125 से ज्यादा बच्चों को वे पढ़ा पा रहे हैं। समाज में लोग मदद के लिए आगे आ रहे हैं। अगर आप भी मदद करना चाहते हैं तो करिए। समाज एवं देश को आपकी जरूरत है। बदलाव का हिस्सा बनिए।

अगर आपको अभिषेक की यह पहल अच्छी लगी और आप उनकी मदद करना चाहते हैं तो इस नम्बर 7007917085, 8005092910 पर संपर्क कर सकते हैं। आप ‘शुरुआत’ के फेसबुक पेज से भी जुड़ सकते हैं।

लेखिका – शालिनी यादव 

संपादन – भगवती लाल तेली 


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