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मंदिर के कचरे में ढूंढा व्यवसाय का खज़ाना, खड़ा कर दिया करोड़ों का कारोबार!

साल 1998 से अम्बा जी मंदिर के बिल्कुल बाहर रामी की दुकान है, जहाँ आज वे दो हज़ार से भी ज़्यादा हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स बेचते हैं!

गुजरात के बनासकांठा जिले में स्थित अम्बा जी मंदिर देशभर में मशहूर है। लगभग 1200 साल पुराने इस मंदिर में हर साल दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु आते हैं और पूजा-आराधना करते हैं। लोगों की श्रद्धा और विश्वास के साथ-साथ ये मंदिर गुजरात की सांस्कृतिक विरासत में भी ख़ास स्थान रखता है।

जितनी इस मंदिर की महत्ता है और यहाँ लोग अपनी आस्था प्रकट करने पूजा सामग्री लेकर आते हैं। उससे हर साल, मंदिर से लाखों टन कचरा भी निकलता है। इसमें मंदिर में भेंट चढ़ी चीज़ें जैसे कि नारियल के छिलके, चुनरी, फूल, बचा हुआ प्रसाद आदि शामिल होता है। यह वेस्ट मंदिर से निकलकर डंपयार्ड या फिर लैंडफिल पहुँचता है। ऐसे में आपने कभी सोचा है कि प्रकृति पर इसका क्या असर पड़ता है?

जहाँ हम बहुत से लोग इस बारे में कभी सोचते भी नहीं है, वहीं एक शख्स पिछले 20 सालों से यह सुनिश्चित कर रहा है कि मंदिर में चढ़ाई जाने वाली हर एक चीज़ को नया जीवन मिले। क्योंकि जो हमें कचरा नज़र आता है, उसमें 52 वर्षीय हितेंद्र रामी को व्यवसाय नज़र आया!

हितेंद्र रामी

साल 1998 से अम्बा जी मंदिर के बिल्कुल बाहर रामी की दुकान है, जहाँ आज वे दो हज़ार से भी ज़्यादा हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट्स बेचते हैं। हैरत की बात यह है कि ये सभी प्रोडक्ट्स मंदिर से निकलने वाले कचरे को ही रीसायकल करके बनाए जाते हैं। जी हाँ, इस दुकान में आपको 50 रुपए से लेकर 5 लाख रुपए तक के प्रोडक्ट मिलेंगे, वो भी वेस्ट से बने हुए।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए हितेंद्र रामी बताते हैं, “वैसे तो हम मूल रूप से मेहसाणा के रहने वाले हैं और मैं गार्डन मैनेजमेंट का काम करता था। हमारी इस मंदिर से बहुत श्रद्धा थी इसलिए जब भी हम कहीं बाहर काम के लिए जाते थे तो यहाँ दर्शन करते हुए जाते थे।”

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साल 1997 में रामी यहाँ नैनीताल में अपने एक प्रोजेक्ट से पहले दर्शन करने ही आए थे और जब वे बाहर निकल रहे थे तो अचानक एक नारियल का छिलका उनके पैर में आकर लगा। वह कहते हैं कि जैसे ही वो छिलका उन्हें लगा तो अचानक उनके मन में आया कि लोग इसे यूँ ही फेंकने की बजाय किसी काम में क्यों नहीं ले लेते।

“जो दूसरों को कचरा लगता है उसमें मुझे एक अच्छा व्यवसाय दिखा और बस मैंने ठान ली कि मैं इसी से अपना कारोबार बनाऊंगा,” उन्होंने कहा।

उन्होंने सबसे पहले बेसिक रिसर्च की कि वे नारियल के छिलके को कैसे फिर से इस्तेमाल कर सकते हैं। और एक बार जब उन्हें समझ में आ गया कि वे इस छिलके से हैंडीक्राफ्ट प्रोडक्ट बनायेंगें तो उन्होंने अम्बाजी मंदिर के सामने ही दुकान खोलने का निर्णय लिया। उन्होंने अपने व्यवसाय को ‘नंदनवन’ नाम दिया।

2, 000 से भी ज़्यादा प्रोडक्ट्स बना रहे हैं रामी

आज वे नारियल के छिलकों से चप्पल, सजावट की चीजें जैसे झूमर, टोकरी और तो और मूर्तियाँ भी बना रहे हैं। उनकी दुकान में आपको 5 फीट से लेकर 12 फीट तक की नारियल के छिलकों से बनी गणपति की मूर्ति मिल जाएगी।

अपना व्यवसाय शुरू करते समय उन्होंने सबसे पहले नारियल विक्रेताओं से बात की कि वे नारियल के बचे हुए छिलके उन्हें दे दें। “नारियल वाले मुझे छिलके तो देते ही और फिर उनके यहाँ से ‘कचरा’ हटाने के पैसे भी देते थे। फिर धीरे-धीरे मैंने मंदिर प्रशासन से भी बात की और वहां से मुझे कचरा इकट्ठा करने का काम मिल गया। अब मेरे व्यवसाय के लिए कच्चा माल तो तैयार था बस मुझे इससे ऐसे प्रोडक्ट बनाने थे जो की प्रकृति के अनुकूल हो और आकर्षक भी हो,” रामी ने आगे कहा।

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जब नारियल के साथ उनका एक्सपेरिमेंट सफल रहा तो उन्होंने अन्य चीज़ों जैसे ध्वजा, चुनरी, फूल-प्रसाद आदि की भी रीसाइक्लिंग करके प्रोडक्ट्स बनाना शुरू किया। आज उनकी दुकान का नाम देश-विदेशों तक फैला हुआ है। 400 से ज़्यादा लोग रेग्युलर तौर पर उनके साथ काम करते हैं और इसके अलावा, समय-समय पर और भी कारीगर उनसे जुड़ते ही रहते हैं।

इको-फ्रेंडली गणपति बप्पा

रामी बताते हैं कि जब उन्होंने यह काम शुरू किया था तब से ही उनका एक सिद्धांत था कि वे जो भी करें उससे लोगों को रोज़गार मिलना चाहिए। इसलिए वेस्ट इकट्ठा करने से लेकर प्रोडक्ट्स आदि बनाने के लिए वे अम्बा जी के आसपास के आदिवासी गांवों में रहने वाले लोगों, ख़ासकर महिलाओं से जुड़े हुए हैं।

उन्होंने गाँव-गाँव जाकर लोगों को ट्रेनिंग दी और फिर उन्हें अपने घरों में ही रहकर काम करने के लिए कहा। रामी उनके यहाँ कच्चा माल पहुंचाते हैं और फिर वे लोग प्रोडक्ट्स बनाकर ‘नंदनवन’ पर पहुंचा देते हैं। सभी कारीगरों को प्रति प्रोडक्ट के हिसाब से पैसे मिलते हैं। उनके साथ जुड़ा हुआ हर एक कारीगर परिवार महीने के 10 से 12 हज़ार रुपए प्रति माह कमा रहा है। बाकी अलग-अलग सीजन के हिसाब से भी उनकी आय पर फर्क पड़ता है।

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रामी कहते हैं कि उनकी ‘वॉललेस फैक्ट्री है’ क्योंकि उनके साथ काम करने वाले लोग अपनी सुविधा के अनुसार अपने घरों में रहकर ही काम करते हैं। इससे उनके आने-जाने का किराया आदि भी बचता है। परिवार के सभी सदस्य मिलकर काम करते हैं तो ज़्यादा प्रोडक्ट्स बनते हैं और पारिवारिक आय भी ज़्यादा होती है। इस तरह से उनका कॉन्सेप्ट ‘वसुधैव कुटुम्बकम’ का है।

रामी को अब निजी और सरकारी संगठनों द्वारा देशभर से ट्रेनिंग के लिए बुलाया जाता है। अब तक उन्होंने देश के लगभग सभी राज्यों में 18 हज़ार से भी ज़्यादा लोगों को ट्रेनिंग दी है और स्टार्टअप शुरू करने में भी मदद की है। उनका अपना सालाना टर्नओवर दो करोड़ रुपये से ऊपर है।

स्कूल-कॉलेज के बच्चों को भी ट्रेनिंग देते हैं रामी

अंत में हितेंद्र रामी सिर्फ़ इतना ही कहते हैं, “किसी भी इंसान में काम करने की लगन और तमन्ना होनी चाहिए। हमारे देश के हर हिस्से में अनगिनत मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च, शांतिपीठ, दरगाह आदि है। इन सब जगहों पर न जाने कितने लोग क्या-क्या चढ़ाते हैं और फिर यह सब वेस्ट में जाता है। आपको बस थोड़ी-सी अलग सोच और हिम्मत की ज़रूरत है। आप अपने गाँव, शहर में रहकर ही अपना व्यवसाय शुरू कर सकते हैं। यदि किसी इस काम में मेरी मदद चाहिए तो बेहिचक संपर्क करें।”

बेशक, हितेंद्र रामी जैसे लोग विरले ही होते हैं जिन्हें वेस्ट में सिर्फ़ बेस्ट दिखाई देता है। उनसे संपर्क करने के लिए 9408729910 पर डायल करें!


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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