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8वीं पास किसान इनोवेटर ने बनायीं सस्ती मशीने; ग्रामीणों को मिल रही अतिरिक्त आय!

परेश को उनके इन आविष्कारों के लिए देश के चार राष्ट्रपति, एपीजे अब्दुल कलाम, प्रतिभा पाटिल, प्रणव मुखर्जी और रामनाथ कोविंद द्वारा सम्मानित किया जा चुका है!

गुजरात के अहमदाबाद में रहने वाले परेश पांचाल न तो किसी IIT से पढ़े हैं और न ही किसी बड़ी मैकेनिकल कंपनी से उन्होंने ट्रेनिंग ली है। लेकिन फिर भी आज उनका नाम देश के प्रसिद्ध और प्रभावशाली आविष्कारकों की फ़ेहरिस्त में शामिल होता है।

सिर्फ़ आठवीं कक्षा तक पढ़ाई करने वाले परेश ने कभी भी नहीं सोचा था कि एक दिन उनकी बनाई मशीनों के ज़रिए वे ग्रामीण भारत में बदलाव का प्रतीक बन जाएंगे। लेकिन अपनी मेहनत और लगन से उन्होंने साबित किया है कि इनोवेशन किसी डिग्री के चलते नहीं बल्कि ज़रूरत के चलते होता है। इसलिए उनके सभी इनोवेशन साधारण लोगों के लिए होते हैं, ताकि आम ग्रामीण लोगों के जीवन में परिवर्तन आ सके।

एक साधारण परिवार से संबंध रखने वाले परेश की ज़िंदगी उनके पिता के देहांत के बाद बिल्कुल ही बदल गई थी। वे 19-20 साल के थे जब उनके पिता की मृत्यु हुई और उसके बाद उनके ऊपर अपने पूरे परिवार की ज़िम्मेदारी आ गई।

परेश पांचाल

द बेटर इंडिया से बात करते हुए परेश ने बताया, “उस वक़्त किसी बात की कोई चिंता नहीं थी। मुझे जो अच्छा लगता वो करता। लेकिन पापा के देहांत के बाद चीज़ें बदल गई । परिवार की ज़िम्मेदारी आ गई और फिर मैंने पूरा ध्यान पापा की वर्कशॉप को आगे बढ़ाने पर लगा दिया।”

अपने पिता के वर्कशॉप पर काम करते हुए उन्होंने लोगों की ज़रूरत के हिसाब से मशीनों को मॉडिफाई करने का काम किया। वे ग्राहक की ज़रूरत के हिसाब से उसे मशीन बनाकर देते और इसी क्रम में एक बार उनसे किसी ने पतंग उड़ाने वाले मांझे की ऐसी ऑटोमेटिक चकरी बनाने के लिए कहा जिससे कि पतंग कटने के बाद धागे को ऑटोमेटिकली वापस चकरी में डाला जा सके।

परेश बताते हैं कि गुजरात में पतंग उड़ाने का जितना शौक है उतना ही बड़ा पतंग और मांझे का व्यापार भी है। इसलिए उन्हें भी लगा कि यदि वे ऐसा कुछ बनाने में कामयाब हो जाते हैं तो यह बहुत से लोगों को पसंद आएगा। उन्होंने इस मशीन पर काम करना शुरू किया और जब उनका ‘मोटराइज्ड थ्रेड-वाइन्डर’ बनकर तैयार हुआ तो हाथों-हाथ लोगों ने इसे खरीदा।

मोटराइज्ड थ्रेड-वाइन्डर

उनकी बनाई मोटराइज्ड चकरी में आपको बस एक बटन दबाना होता है और फिर पूरा का पूरा धागा ऑटोमेटिकली चकरी पर आ जाता है। इससे न तो मांझे में गांठ पड़ती है और न ही आपके हाथ में चोट आदि लगने का डर रहता है। वीडियो देखने के लिए यहाँ क्लिक करें!

साल 2007 में उनके इस इनोवेशन को नेशनल इनोवेशन फाउंडेशन द्वारा सम्मानित किया गया। परेश ज्ञान संगठन के संपर्क में रहते हुए अलग-अलग और छोटे-बड़े इनोवेशन पर काम कर रहे हैं। परेश के काम को देखते हुए उदयपुर के वन विभाग अधिकारी ओपी शर्मा ने उन्हें राजस्थान के एक छोटे से आदिवासी गाँव में आमंत्रित किया।

“इस गाँव के लोग अगरबत्ती बनाकर अपना रोज़गार चलाते हैं। अगरबत्ती बनाने के सभी काम जिसमें बांस छीलना, अगरबत्ती के लिए बाकी सामग्री बनाना और फिर उसे अंतिम रूप देना आदि हाथों से करते थे। इससे एक तो ये दिन में बहुत ही कम संख्या में अगरबत्ती बना पाते और साथ ही, उनके हाथों में भी घाव आ जाते। इसलिए शर्मा जी चाहते थे कि मैं इन गाँव के लोगों के लिए कुछ बनाऊं जिससे इनका काम सरल हो जाए और आमदनी भी बढ़ जाए,” परेश ने बताया।

अगरबत्ती

मशीन की ज़रूरत गाँव वालों को थी और इसलिए परेश ने उन्हीं से पूछा कि उन्हें कैसी मशीन चाहिए। इस सवाल के जवाब में सभी ने एक ही उत्तर दिया कि ऐसा कुछ जिससे कि एक हैंडल मारने पर ही बांस की स्टिक बन जाए और फिर एक हैंडल से अगरबत्ती तैयार हो जाए। परेश ने उन गाँव वालों की बात सुनी और फिर वापस अहमदाबाद लौट आए।

इसके कुछ समय बाद परेश इन गाँव वालों के मन मुताबिक मशीन बनाकर उनके पास पहुंचे। वहां के सभी वन अधिकारियों के बीच उन्होंने अपने मशीन का प्रदर्शन किया और उन्हें बताया कि मशीन को बिना बिजली के सिर्फ़ एक हैंडल से चलाया जा सकता है।

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उन्होंने दो मशीन ‘बैम्बू स्पलिंट मेकिंग मशीन’ यानी बांस की स्ट्रिप बनाने वाली मशीन और ‘इन्सेंस स्टिक मेकिंग मशीन’ यानी अगरबत्ती बनाने वाली मशीन बनाई। इन मशीनों की मदद से एक दिन में 3500 से लेकर 4000 अगरबत्तियां बनाई जा सकती है। साथ ही, इनमें बिजली का भी कोई खर्च नहीं है और किसी को चोट लगने का भी कोई डर नहीं रहता।

(बाएं) बैम्बू स्पलिंट मेकिंग मशीन, (दाएं) इन्सेंस स्टिक मेकिंग मशीन

“जब मैंने ये मशीन उन गाँव वालों को दी तो उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। उनके चेहरों पर जो राहत के भाव थे, उसे देखकर मेरे मन को जो संतोष मिला, वो मुझे करोड़ों कमाकर भी नहीं मिलता शायद। उसी वक़्त मुझे वन विभाग ने 100 मशीन बनाने का ऑर्डर दिया ताकि पूरे गाँव में मशीनें दी जा सके,” परेश ने बताया।

उनकी इस मशीन की कीमत 15, 600 रुपये है। अपने इस इनोवेशन के लिए भी उन्हें राष्ट्रपति द्वारा सम्मानित किया गया। उनका यह इनोवेशन ग्रामीण स्तर पर काफ़ी कामयाब है क्योंकि इसकी मदद से ग्रामीण लोगों के लिए रोज़गार का एक अच्छा साधन खड़ा किया जा सकता है।

अगरबत्ती बनाने की मशीन के बाद उन्होंने एक और ग्रासरूट्स इनोवेटर गोपाल सिंह के साथ मिलकर ‘गोबर के गमले बनाने की मशीन‘ पर काम किया। उनकी यह मशीन भी ग्रामीण भारत में रोज़गार के साधन उत्पन्न करने के नज़रिए से बहुत कामयाब हुई। इस मशीन के बारे में ज़्यादा जानकारी प्राप्त करने के लिए आप यहाँ क्लिक करें!

परेश को उनके इन आविष्कारों के लिए देश के चार राष्ट्रपति, एपीजे अब्दुल कलाम, प्रतिभा पाटिल, प्रणव मुखर्जी और रामनाथ कोविंद द्वारा सम्मानित किया जा चुका है। उन्हें सबसे ज़्यादा ख़ुशी इस बात की है कि उनकी मशीनों को न सिर्फ़ गांवों में बल्कि कई जेल अधिकारियों द्वारा कैदियों के उत्थान के लिए भी इस्तेमाल किया जा रहा है।

सबसे पहले उनकी अगरबत्ती बनाने वाली मशीन को कोलकाता के अलीपुर महिला जेल द्वारा ख़रीदा गया ताकि वहां की महिला कैदियों को रोज़गार के कुछ गुर सिखाए जा सके। कोलकाता के बाद गुरुग्राम जेल और उत्तर-प्रदेश के दसना जेल में भी उनकी मशीनों को ख़रीदा गया। यहाँ पर उन्होंने जेल के अधिकारियों और कैदियों के लिए ट्रेनिंग वर्कशॉप भी की है।

चारों राष्ट्रपति ने किया सम्मानित

आज परेश Dolphin Engimech Innovative Pvt Ltd कंपनी के मालिक है और उनकी कंपनी का टर्नओवर एक करोड़ रुपए से भी ऊपर है। लेकिन उन्हें यह नाम और शोहरत आसानी से नहीं मिली है। अपने इस सफर में उन्होंने बहुत-सी मुश्किलों का सामना किया है और सबसे बड़ी चुनौती थी उनके 15 वर्षीय बेटे की मौत। लगभग एक साल पहले एक दुर्लभ बीमारी के चलते उन्होंने अपने बेटे को खो दिया।

परेश की जगह अगर कोई और होता तो शायद अपने बेटे के गम में सब कुछ त्याग कर बैठ जाता, लेकिन परेश ने ऐसा नहीं किया और अपने जीवन का लक्ष्य बदल दिया।

वे कहते हैं, “उसके जाने के बाद मुझे लगा कि ज़िंदगी कितनी छोटी है और इसलिए हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम अपने जीवन में किसी का भला करे। हम कितना भी पैसा कमा ले, उसे अपने साथ नहीं ले जा सकते हैं। हमें कोशिश करनी चाहिए कि हम किसी की दुआएं अपने साथ लेकर चलें।”

अब परेश का उद्देश्य गाँव के लोगों की ज़रूरतों के हिसाब से उनके लिए मशीन बनाना है। वे किसी बड़ी कंपनी या फिर बड़े ब्रांड के लिए आविष्कार करने की बजाय साधारण लोगों के लिए कुछ करना चाहते हैं। उनकी सोच है कि वे अपने हुनर के ज़रिए ग्रामीण भारत को बेहतर बनाए।

अपने संदेश में वे सिर्फ़ इतना कहते हैं, “यदि आपके पास कोई भी आइडिया है जो किसी भी तरह से गाँव के लोगों की ज़िंदगी बदल सकता है तो मुझे बताए। मैं उससे आविष्कार/मशीन आपको बनाकर दूंगा और जिस भी तरह से मदद हो पाएगी, मैं करूँगा। मुझे अपने लिए कुछ भी नहीं चाहिए, मैं बस गरीब और ज़रूरतमंद लोगों के चेहरे पर मुस्कान देखना चाहता हूँ। यही मेरे लिए सबसे बड़ा संतोष है।”

अगर आपको परेश पांचाल की कहानी से प्रेरणा मिली है और आप उनकी बनाई मशीन खरीदना चाहते हैं या फिर आपके पास कोई ऐसा आइडिया है जो ग्रामीण लोगों के लिए हितकर हो सकता है, तो परेश पांचाल से 09429389162 पर संपर्क करें!

अगरबत्ती बनाने वाली मशीन कैसे करती है काम


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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