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IIT की दो छात्राओं ने बनाया कपड़े के पैड को साफ़ करने के लिए सस्ता डिवाइस!

एक महिला अपने जीवन में माहवारी के वर्षों के दौरान लगभग 125 किलोग्राम नॉन-बायोडिग्रेडेबल वेस्ट उत्पन्न करती है।

लोग अक्सर इनोवेशन को इंजीनियरिंग से जोड़ते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है, बल्कि यह किसी भी क्षेत्र में हो सकता है। जब भी हम इनोवेशन की बात करते हैं तो साथ में उससे होने वाले इम्पैक्ट की बात भी करते हैं। इनोवेशन तो कुछ भी, कहीं से भी हो सकता है लेकिन अहम है कि आपका इनोवेशन किस उद्देश्य को पूरा कर रहा है।

यह सोच है एक युवा इनोवेटर ऐश्वर्या अग्रवाल की, जिनके एक इनोवेशन से अनगिनत लोगों की ज़िंदगी में बदलाव लाया जा सकता है। IIT बॉम्बे में पढ़ रही ऐश्वर्या ने IIT गोवा की एक छात्रा देवयानी मलादकर के साथ मिलकर ऐसी तकनीक पर काम किया है जिससे कि सैनेटरी नैपकिन का डिस्पोजल आसानी से हो सके।

आज के समय में लड़कियों और महिलाओं को माहवारी के समय नियमित रूप से सैनिटरी पैड, टेम्पोन आदि इस्तमाल करने के लिए जागरूक किया जाता है। लेकिन इसके साथ ही हमें पर्यावरण का भी ध्यान रखना होगा। इन छात्राओं का यह इनोवेशन इसी सोच पर आधारित है।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए ऐश्वर्या बताती है, ”हमारे देश में अभी भी महिलाएं माहवारी के दिनों में सैनिटरी नैपकिन की जगह कपड़ा इस्तमाल करती है। ऐसे में, उनका सैनिटरी नैपकिन इस्तमाल करना ही बहुत बड़ी बात है। लेकिन सिर्फ़ इसी एक चीज़ से हम बहुत लंबे समय के लिए उनके जीवन में बदलाव नहीं ला सकते क्योंकि यह पर्यावरण के लिए हानिकारक भी है।”

ऐश्वर्या और देवयानी ने अपना प्रोजेक्ट मई, 2019 में IIT गाँधीनगर के डेढ़ महीने के समर प्रोग्राम Invent@IITGN के दौरान शुरू किया था। उनके प्रोजेक्ट का उद्देश्य ऐसी किसी सामाजिक समस्या पर काम करना था जिसका प्रभाव बड़े स्तर पर हो। ऐसे में उन्होंने सैनिटरी नैपकिन को डिस्पोज करने की तकनीक पर काम करने की सोची।

(बाएं से दाएं) प्रोटोटाइप के साथ ऐश्वर्या और देवयानी

उनके अनुसार एक सैनिटरी नैपकिन को डिस्पोज होने में 500 से 800 साल का समय लग जाता है। एक महिला अपने जीवन में माहवारी के वर्षों के दौरान लगभग 125 किलोग्राम नॉन-बायोडिग्रेडेबल वेस्ट उत्पन्न करती है। अपने इनोवेशन के ज़रिए वे इसका हल निकालना चाहती थी । उन्हें इस प्रोजेक्ट के लिए 50 हज़ार रुपए की सहयोग राशि मिली।

”पिछले कुछ समय में औरतों में माहवारी के समय सैनिटरी पैड इस्तेमाल करने की जागरूकता तो आई है, पर अभी भी अगर बात री-यूजेबल पैड इस्तेमाल करने की हो तो महिलाओं के मन में एक संकोच है। इसके अलावा, इन री-यूजेबल पैड को साफ़ करने का तरीका भी सही नहीं है। साथ ही, बहुत सी महिलाएँ और लड़कियाँ सैनिटरी पैड को हाथ से धोने में हिचकती है और यदि वे धोए तब भी ये पैड पूरी तरह से साफ़ नहीं होते। आप वॉशिंग मशीन में धुले पैड को भी सुरक्षित नहीं कह सकते हैं,” ऐश्वर्या ने कहा।

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इस समस्या के समाधान के लिए उन्होंने ‘क्लीन्स राइट’ नाम से एक डिवाइस बनाया, जिससे री-यूजेबल सैनिटरी पैड को आसानी से साफ़ किया जा सकता है और इसमें बायोमेडिकल वेस्ट भी कम लगता है। यह डिवाइस अभी अपनी प्रोटोटाइप स्टेज में है और इसके लिए इन दोनों छात्राओं ने पेटेंट के लिए अप्लाई किया है।

इस बारे में देवयानी कहती हैं, “इस मुद्दे पर काम करने के लिए हमें निजी और सामाजिक, दोनों ही तरह के अनुभवों ने प्रेरित किया। हमने एक लड़की के केस के बारे में पढ़ा, जिसमें उसकी मौत माहवारी में गंदा कपड़ा इस्तमाल करने के चलते हुई बीमारी टॉक्सिक शॉक सिंड्रोम की वजह से हो गई। वैसे तो यह कपड़े के पैड ग्रामीण इलाकों में इस्तमाल करने के बाद धोए जाते हैं लेकिन इससे भी इनमें से कीटाणु पूरी तरह नहीं जाते हैं।”

साभार: Invent at IITGN/Facebook

इन छात्राओं का बनाया यह डिवाइस महिलाओं के लिए बहुत उपयोगी है क्योंकि इससे आप पैड को धो सकते हैं और स्टरलाइज भी कर सकते हैं। इसे इस्तमाल करने के लिए इलेक्ट्रिसिटी की ज़रूरत नहीं है, बल्कि इसमें एक पैडल लगा होता है और इसकी मदद से आप सैनिटरी नैपकिन को धो सकते हैं। इसके बाद इन्हें पानी में से निकाला जाता है और फिर स्पिन-ड्राई किया जाता है।

फ़िलहाल, ऐश्वर्या और देवयानी इसमें सोलर उर्जा से चलने वाले यू.वी. लैंप पर भी काम कर रही है जिससे कि सैनिटरी पैड को धोने के बाद स्टरलाइजेशन किया जा सके। इससे नैपकिन में से सभी हानिकारक जीवाणु-कीटाणु मर जाते हैं। इसके अलावा, वे अपने डिवाइस में और भी अन्य कई तरह के संशोधन कर रही हैं जिससे कि यह महिलाओं के लिए बहुत उपयोगी साबित हो। इस डिवाइस को अंडर-गारमेंट्स धोने के लिए भी इस्तेमाल किया जा सकता है। पूरी तरह से बनने के बाद इसकी कीमत लगभग 1500 रुपए रहेगी।

बेशक, इस डिवाइस में समाज में बड़ा बदलाव लाने की क्षमता है। अंत में ऐश्वर्या सिर्फ़ इतना कहती है, “यह सिर्फ़ इंजीनियरिंग नहीं है, बल्कि समाज में बदलाव लाने की चाह है। हर कोई अपने क्षेत्र के ज्ञान का इस्तमाल करके यह कर सकता है। हम सिर्फ़ अपने ज्ञान का इस्तमाल कर रहे हैं।”

संपादन: भगवती लाल तेली 
मूल लेख: अनन्या बरुआ 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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