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कभी किराने की दुकान पर काम करता था यह IIT ग्रेजुएट, आज लाखों में है सैलरी!

11वीं कक्षा की परीक्षा होने के बाद धनंजय अपने एक दोस्त के साथ पटना के लिए निकल पड़े ताकि वे सुपर-30 पहुँच कर टेस्ट दे पाएं।

ब भी IIT का परिणाम आता है या फिर वहां से होने वाली प्लेसमेंट की लिस्ट जारी होती है तो सभी बच्चों की सफलता की कहानी पढ़कर अक्सर हमें लगता है कि देखो क्या किस्मत पायी है? पर हम सिर्फ़ किस्मत और सफलता को देखते हैं। पर शायद ही हमारी नज़र उन सीढ़ियों पर जाती है, जिसके हर एक पायदान को बनाने के पीछे इनके दिनों, महीनों या कभी-कभी सालों की मेहनत होती है।

भारत में जानी-मानी अमेरिकी कंपनी ‘मैथवर्क्स‘ में प्लेसमेंट पाने वाले धनंजय कुमार की कहानी भी कुछ ऐसी ही है। आईआईटी खड़गपुर से इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग करने वाले 23 वर्षीय धनंजय जिस परिवार से आते हैं, वहां किसी ने उनसे पहले कभी आईआईटी या इंजीनियरिंग के बारे में सुना भी नहीं था।

7 सदस्यों के परिवार का पालन-पोषण धनंजय के पिता एक छोटे से किराने की दुकान से चलाते आ रहे थे। इसी दुकान में पिता का हाथ बंटाते हुए धनंजय ने अपने सपनों को बुना और उन्हें पूरा करने के लिए रात-दिन मेहनत की। और उनकी इसी मेहनत का नतीजा है कि आज वे इस काबिल बन गए हैं कि अपने भाई-बहनों और माता-पिता को एक अच्छी ज़िंदगी दे सकें।

बिहार के समस्तीपुर जिले में स्थित जलालपुर गाँव के रहने वाले धनंजय ने पांचवी कक्षा तक गाँव में ही एक छोटे-से स्कूल में पढ़ाई की। पांचवी के बाद आगे की पढ़ाई करने के लिए उन्होंने गाँव के ही सरकारी स्कूल में ही दाखिला ले लिया।

“जो भी अच्छे-खासे परिवार थे, वे तो बाहर अपने बच्चों को प्राइवेट स्कूल भेज सकते थे। पर हमारे घर की आर्थिक स्थिति बिल्कुल भी ठीक नहीं थी। पर मुझे पढ़ने का शौक था तो मैंने सरकारी स्कूल में ही दाखिला ले लिया और फिर घर पर किताबें लाकर पढ़ता था। बस पेपर देने के लिए स्कूल जाता था क्योंकि सरकारी स्कूल की हालत भी खस्ता थी,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया।

धनंजय कुमार

अपनी 12वीं कक्षा तक की पढ़ाई धनंजय ने इसी तरह सेल्फ-स्टडी करते हुए पूरी की। पढ़ाई के साथ-साथ वे घर और दुकान में भी अपने माता-पिता का हाथ बंटाते और छोटे भाई-बहनों का ख्याल भी रखते। धनंजय बताते हैं कि पटना जाकर, जहाँ से भी उन्हें कम से कम दाम में मिले, वहीं से वे सेकंड हैंड किताबें या फिर किताबों की फोटोकॉपी ले आते थे। इतनी सब परेशानियों के बावजूद उन्होंने कभी भी पढ़ाई छोड़ने के बारे में नहीं सोचा। बल्कि उम्र और वक़्त के साथ उनके सपने भी बड़े होते गये।

“हम बचपन में कभी सोचते ही नहीं थे कि हम ये नहीं कर सकते, हम वो नहीं कर सकते। हमेशा यही माना कि मेहनत करेंगें तो जो चाहे वो कर पायेंगें। पापा ने भी हमेशा मोटीवेट ही किया और हमारे यहाँ टीवी वगैराह तो कभी नहीं था। पर हमें रेडियो सुनने का बहुत शौक था और साथ ही, जब भी मौका मिलता तो जाकर अख़बार ख़रीदकर भी पढ़ते थे। हमने बाहर की दुनिया को इन दो चीज़ों से ही जाना और समझा था,” धनंजय ने बताया।

अख़बारों से ही उन्हें IIT- JEE जैसी परीक्षाओं के बारे में पता चला और साथ ही, वे उन लोगों की कहानियाँ पढ़ते, जो ढ़ेरों मुश्किलों के बावजूद इस मुक़ाम तक पहुंचे थे। रेडियो और अख़बार के ज़रिए प्रेरणात्मक लोगों के बारे में सुन-पढ़कर ही उनमें भी इतना आत्मविश्वास आ गया था कि 10वीं में उन्होंने ठान लिया था कि वे आगे चलकर इंजीनियरिंग करेंगें।

पर जब उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास कर ली, तो देखा कि उनके साथ के ज़्यादातर लड़कों को परिवार वालों ने बाहर कोचिंग के लिए भेज दिया है। पर धनंजय के परिवार के पास इतने साधन ही नहीं थे कि वे उन्हें कोई कोचिंग करवा सकें।

“10वीं के बाद मुझे पहली बार घबराहट हुई और लगा कि शायद मैं अपने सपनों को पूरा नहीं कर पाऊंगा। मेरे चारों तरफ जो माहौल था उसे देखकर कोई नहीं कह सकता था कि मैं कभी भी आईआईटी जैसी जगह पर पढ़ सकता हूँ। उस वक़्त मैं पहली बार कमजोर पड़ा था।”

इस मुश्किल समय में धनंजय को सिर्फ़ एक ही आशा की किरण दिखी- ‘सुपर 30’!

“जब मैं आठवीं क्लास में था तब मैंने पहली बार आनंद सर के बारे में और सुपर-30 के बारे में पढ़ा था। उनके बारे में पढ़कर मुझे हमेशा ही अच्छा लगता था और एक प्रेरणा मिलती थी। पर यह कभी भी नहीं सोचा था कि एक दिन मैं भी उनके ‘सुपर 30’ का हिस्सा बनूँगा।”

11वीं कक्षा की परीक्षा होने के बाद धनंजय अपने एक दोस्त के साथ पटना के लिए निकल पड़े ताकि वे सुपर-30 पहुंचकर टेस्ट दे पाएं। उन्होंने इस बारे में अपने माता-पिता को भी नहीं बताया, बस कहा कि दूसरे गाँव अपने दोस्त के यहाँ जा रहे हैं।

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धनंजय बताते हैं कि उनके पास इतने पैसे भी नहीं थे कि वे ट्रेन की टिकट भी खरीद सकें। क्योंकि जो भी पैसे थे उसी में से रास्ते में खाना-पीना का भी इंतजाम करना था और गाँव से स्टेशन तक जाने के लिए बस का किराया भी देना था।

आनंद कुमार का सुपर 30 बैच

जैसे-तैसे वे और उनके दोस्त सुपर-30 के टेस्ट के लिए पटना पहुंचे। वहां उन्होंने पहले टेस्ट दिया और फिर आनंद कुमार ने उनका इंटरव्यू लिया। पढ़ाई के प्रति धनंजय की लगन और उनका टैलेंट देखकर आनंद कुमार ने उन्हें अपने यहाँ रख लिया। सुपर-30 का हिस्सा बनना धनंजय के जीवन का सबसे बड़ा बदलाव था। यहाँ रहकर न सिर्फ़ उन्होंने परीक्षा की तैयारी की, बल्कि यह भी सीखा कि कैसे दूसरों की ख़ुशी में भी आप अपना प्रोत्साहन ढूंढ सकते हैं।

“आनंद सर और उनका पूरा परिवार जिस तरह से हम बच्चों के लिए दिन-रात मेहनत करता, उसे देखकर लगता कि हालात चाहे जैसे भी हों, अगर आप में कुछ करने का हौसला है तो कोई आपको नहीं रोक सकता। उन लोगों को देखते ही सारी निराशा और डर मन से चला जाता था। वहां रहते हुए ही मैंने सीखा कि कभी भी भविष्य के बारे में बहुत ज़्यादा मत सोचो, सिर्फ़ मेहनत करो। क्योंकि कभी-कभी अधिक सोचना भी हमारे डर को बढ़ावा देता है और हम कुछ नहीं कर पाते हैं,” उन्होंने आगे बताया।

धनंजय ने अपने पहले अटेम्पट में भी टेस्ट क्लियर कर लिया था, लेकिन उस वक़्त उन्हें NIT में दाखिला मिल रहा था। इसलिए आनंद सर के सपोर्ट से उन्होंने एक बार फिर तैयारी करने का फ़ैसला किया और साल 2015 में अच्छी रैंक से परीक्षा पास करके उन्होंने IIT खड़गपुर में दाखिला लिया।

वैसे तो IIT की परीक्षा पास करना ही सिर्फ़ एक मुश्किल नहीं थी, बल्कि और मुश्किलें तो धनंजय की ज़िंदगी में अब शुरू हुई थीं। उनके परिवार को अपने बेटे की सफलता पर ख़ुशी तो बहुत थी, लेकिन आर्थिक तंगी इस कदर थी कि वे उसे काउंसलिंग फीस के भी पैसे नहीं दे सकते थे। तब भी धनंजय की मदद आनंद कुमार ने ही की और जैसे-तैसे फीस के लिए पैसे जुटाकर उन्हें दिए।

अपने गुरु अननद कुमार के साथ धनंजय

“फिर IIT में पढ़ाई की फीस एक लाख रुपये से ऊपर थी, पर उसके लिए अच्छा यह है कि जब मेरा दाखिला हो गया तो कैंपस में मौजूद बैंक से ही मुझे एजुकेशन लोन आसानी से मिल गया। इस वजह से फीस के लिए कभी परेशानी नहीं हुई। पर हाँ, बाहर की दुनिया मेरी सोच से कहीं ज़्यादा बड़ी थी। बहुत अलग-अलग लोग और सब की अलग सोच। इस सब में मुझे अपनी पहचान बनानी थी। पर सबसे अच्छी बात हमेशा ही यह रही कि मैंने अपने वर्तमान पर ध्यान दिया न कि कल की चिंता की।”

यह धनंजय की मेहनत का ही नतीजा है कि बंगलुरु स्थित अमेरिकी कंपनी ‘मैथवर्क्स’ में उन्होंने जॉब हासिल कर ली। यह कंपनी सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट के क्षेत्र में काम करती है और दुनिया की नामी-गिरामी कंपनियों की लिस्ट में आती है। धनंजय अभी ट्रेनिंग पीरियड में है और उनका शुरूआती पैकेज ही लाखों में है।

अब वे इस काबिल हैं कि अपने पूरे परिवार को एक बेहतर ज़िंदगी दे सकते हैं। और इसके लिए वे अभी भी हर दिन मेहनत कर रहे हैं। अंत में धनंजय सिर्फ़ इतना ही कहते हैं कि अक्सर हम चीज़ों को पहले से प्लान करने लगते हैं और फिर उससे संबंधित इतना कुछ जानने-समझने की कोशिश करते हैं कि भविष्य की चिंता में डर जाते हैं। और जब एक बार डर आ गया अपने मन में तो सफलता की राह पर चलना मुश्किल हो जाता है। इसलिए कभी भी आगे की सोचने की बजाय, इधर-उधर ध्यान भटकाने की बजाय अपने लक्ष्य पर ध्यान दें।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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