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‘IIM टॉपर सब्ज़ीवाला’ : सामुदायिक खेती के ज़रिए बदल रहा है 35, 000 किसानों की ज़िंदगी!

आज कौशलेंद्र की इन पहलों से लगभग 35, 000 किसान परिवारों को फायदा पहुँच रहा है।

भी एक छोटे-से कमरे से अपना बिज़नेस शुरू करने वाले कौशलेंद्र आज पूरे बिहार के किसानों और उनके परिवारों से जुड़े हुए हैं। उनका उद्देश्य बिहार में किसानों के सामुदायिक संगठन बनाना है, ताकि सभी किसान एक-दूसरे से जुड़कर, एक-दूसरे की मदद करते हुए आगे बढ़ें।

बिहार के नालंदा जिले में स्थित मुहम्मदपुर गाँव के रहने वाले कौशलेंद्र ने अपनी स्कूल की पढ़ाई जवाहर नवोदय स्कूल से की। यहाँ रहते हुए उन्होंने देखा कि बहुत-से बच्चे छुट्टियों में भी अपने घर नहीं जाते थे, क्योंकि उनके माता-पिता के पास इतने साधन नहीं थे कि वे उन्हें ढंग से दो वक़्त का खाना भी खिला सकें। यही वजह है कि स्कूल की पढ़ाई के दौरान ही कौशलेंद्र ने ठान लिया था कि भविष्य में वे कुछ भी करें, पर उनका उद्देश्य एक ही रहेगा और वह है बिहार का विकास।

बारहवीं कक्षा के बाद उन्होंने गुजरात के जूनागढ़ के इंडियन काउंसिल ऑफ़ एग्रीकल्चरल रिसर्च से एग्रीकल्चरल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। इसके बाद उन्होंने इज़रायल की एक कंपनी के लिए आंध्र प्रदेश में ड्रिप-इरिगेशन सिस्टम पर काम किया। एक साल जॉब करने के बाद वे फिर एक बार गुजरात पहुँचे और उन्होंने CAT के एग्जाम की तैयारी शुरू कर दी।

उन्होंने एग्जाम पास किया और उन्हें IIM अहमदाबाद में दाखिला मिल गया। एमबीए की पढ़ाई के दौरान उन्होंने हमेशा टॉप किया और गोल्ड मेडलिस्ट रहे। वे चाहते तो देश की बड़ी से बड़ी फर्म में उन्हें नौकरी मिल जाती। पर उनका लक्ष्य एकदम साफ़ था। उन्हें अपना कुछ काम शुरू करना था, वह भी कोई ऐसा स्टार्ट-अप जिसके ज़रिये बिहार के किसानों के लिए काम किया जा सके।

कौशलेंद्र

साल 2007 में उन्होंने पटना में एक छोटा-सा कमरा किराए पर लिया और राज्य भर में अलग-अलग जगहों की यात्रा करते हुए किसानों से मिलने लगे। कौशलेंद्र बताते हैं कि उन्हें हमेशा लगता था कि अगर राज्य का विकास करना है तो शुरुआत गाँवों और किसानों से करनी होगी। अगर हम खेती पर आधारित परिवारों का आर्थिक स्तर उठाने में कामयाब हो गये, तो राज्य की ज़्यादातर समस्याएं सुलझ जायेंगी।

लगभग 9 महीने तक वे अलग-अलग किसानों से मिले, उनकी समस्याएं पूछीं, उनकी रोज़मर्रा की ज़रूरतों को समझा और साथ ही उन्हें किस तरह के समाधान की ज़रूरत है, इस पर विचार किया।

अपने अनुभव से उन्हें समझ में आया कि आगे बढ़ने के लिए ‘हाइब्रिड मॉडल’ पर काम करना होगा। इसके लिए साल 2008 में उन्होंने अपने भाई के साथ मिलकर दो संगठन शुरू किए। एक ‘कौशल्या फाउंडेशन’ जो पूरी तरह से नॉन-प्रॉफिट ऑर्गनाइजेशन है और जिसका उद्देश्य किसानों के हितों का संरक्षण है। वहीं, उन्होंने एक कमर्शियल कंपनी Knids Green Private Limited (KGPL) भी शुरू की।

फाउंडेशन और कंपनी का संचालन उस छोटे-से किराए के कमरे से ही शुरू हुआ। उन्होंने किसानों को विभिन्न किस्म की फसलें उगाने के लिए प्रशिक्षित करना शुरू किया, उनके लिए वर्कशॉप करवाए और साथ ही खेती से संबंधित जो भी मदद उन्हें चाहिए थी, मुहैया करवाई। इसके बाद उनकी कमर्शियल कंपनी किसानों से फसल ख़रीदकर उन्हें लागत के हिसाब से सही दाम देने लगी। इस फसल को कौशलेंद्र अलग-अलग वेंडर और ग्राहकों को बेचते हैं। इसकी शुरुआत उन्होंने फलों और सब्ज़ियों से की।

आज उन्होंने किसानों के लिए ख़ास सब्ज़ी-मंडी भी बनवाई है

कौशलेंद्र कहते हैं, “इसके पीछे बस एक ही उद्देश्य था कि किसानों को उनकी उपज का सही दाम मिले और लोगों को खाने के लिए ताज़े फल और सब्ज़ियाँ।” उनका कहना है कि KGPL सप्लाई चेन मार्केटिंग पर काम करती है। वे फल और सब्ज़ियाँ ‘समृद्धि ग्रीन एसी कार्ट’ के ज़रिए मार्केट में पहुँचाते हैं। शुरुआत में एक वक़्त ऐसा भी था, जब कौशलेंद्र ने ख़ुद भी पटना की गलियों में अपनी कार्ट ले जाकर फल और सब्जियां बेचीं।

शुरू के सालों में बहुत-सी मुश्किलें झेलने के बाद अब KGPL पूरी तरह से स्थापित हो गयी है और मार्केट में अपनी पहचान बना चुकी है। साल 2016-17 में इसका टर्नओवर लगभग 5 करोड़ रुपए था।

कौशलेंद्र ने बताया कि अब वे सिर्फ़ ‘कौशल्या फाउंडेशन’ को संभाल रहे हैं। उन्होंने अपनी माँ के नाम पर फाउंडेशन का नाम रखा है। कौशल्या फाउंडेशन का उद्देश्य लाभ कमाना नहीं, बल्कि ज़मीनी स्तर पर किसानों के लिए काम करना है।

उनका उद्देश्य किसान परिवारों का आर्थिक स्तर उठाना है

उन्होंने कहा, “हमें इस बात से कोई मतलब नहीं है कि कितने किसान हमारे साथ जुड़े हुए हैं। मतलब सिर्फ़ इससे है कि जो भी किसान हमारे साथ जुड़े हुए हैं, उनकी ज़िंदगी में हमारी मदद से कोई बदलाव आ रहा है या नहीं। हम सिर्फ़ कृषि के क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि शिक्षा, स्वास्थ्य और सामाजिक स्तर पर भी उनके जीवन में सुधार लाना चाहते हैं।”

फाउंडेशन का मुख्य कार्यालय पटना में है, जबकि कई फील्ड ऑफिस नवादा, मुजफ्फरपुर, चंपारण जैसे जिलों में भी हैं।

कौशलेंद्र बताते हैं कि जब उन्होंने किसानों से मिलना शुरू किया और उन्हें अलग-अलग तकनीक का इस्तेमाल करके खेती करने के सुझाव दिए, तो बहुत कम लोगों ने उनकी बातों पर ध्यान दिया। महीनों की दिन-रात की मेहनत के बाद वे किसानों में भरोसा पैदा कर पाए और अब आलम यह है कि उन्हें ख़ुद किसी गाँव या कस्बे में जाना नहीं पड़ता, बल्कि वे उसी जगह काम करते हैं, जहाँ के लोग आगे बढ़कर उनसे मदद मांगते हैं।

कौशलेंद्र जिस भी गाँव में वे किसानों की ट्रेनिंग के लिए वर्कशॉप कराते हैं, वहाँ उनकी कोशिश रहती है कि वे किसानों के समूह बनाएं। इससे किसान जो भी सीखते हैं, वह दूसरे किसानों को सिखाते हैं और इस तरह से एक चेन बनती है।

समय-समय पर किसानों को ज़रूरी ट्रेनिंग मुहैया करवाई जाती है

कौशलेंद्र कहते हैं, “मैंने गाँधी जी को काफ़ी पढ़ा है। सामुदायिक उत्थान और ग्राम स्वराज जैसे उनके सिद्धांतों ने मुझे काफ़ी प्रभावित किया है। जिस ‘सस्टेनेबल लाइफ’ को लेकर आज इतनी बहस हो रही है, उसके बारे में उन्होंने सालों पहले लिख दिया था। उनसे ही मुझे प्रेरणा मिली कि समुदाय को इस तरह से प्रशिक्षित करो कि लोग ख़ुद अपने उत्थान के लिए आगे आएं। इससे आप रहें न रहें, लेकिन बदलाव ज़रूर होता रहेगा।”

Promotion

इसी सोच के साथ आगे बढ़ते हुए कौशलेंद्र ने ‘किसान उत्पादक संगठन’ यानी ‘एफपीओ’ बनवाने पर जोर दिया। आज 16 से भी ज़्यादा एफपीओ वे बनवा चुके हैं, जिनमें से एकंगरसराय कृषि प्रोड्यूसर कंपनी (जो दलहन और सब्जी उत्पादक है) को ‘बेस्ट एफपीओ’ का अवॉर्ड दिया गया। इस एक एफपीओ से लगभग 1500 किसान जुड़े हुए हैं।

पहले उन्होंने सिर्फ फल और सब्ज़ियों की खेती में सुधार का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब वे किसानों की ज़रूरतों के हिसाब से ट्रेनिंग सेशन करवाते हैं और हर तरह की फसल के लिए मार्केट उपलब्ध कराते हैं। उनका लक्ष्य ‘सेफ और सस्टेनेबल फार्मिंग’ है। इसके तहत वे ‘इंटिग्रेटेड पेस्ट मैनेजमेंट,’ ‘नैचुरल पेस्ट मैनेजमेंट,’ ‘नैचुरल फार्मिंग’ आदि को लेकर काम करते हैं।

कौशलेंद्र ने बताया कि फ़िलहाल उनकी टीम कृषि के साथ-साथ स्वच्छता, शिक्षा और महिला उत्थान के लिए कार्य कर रही है। स्वच्छता के प्रति लोगों को जागरूक करने के लिए वे कई अभियान चला रहे हैं। इसमें अलग-अलग समुदाय के लोगों को इकट्ठा करके उन्हें साफ़-सफाई का महत्व उदाहरणों के ज़रिए बताया जाता है।

महिला किसानों के उत्थान पर हो रहा है काम

शिक्षा अभियान में भी उनका जोर महिलाओं और बड़े-बुजुर्गों को शिक्षित करने पर है। आज के ज़माने में शिक्षा बच्चों से लेकर बुजुर्गों और स्त्री-परुषों, सभी के लिए बहुत ज़रूरी है। इससे संबंधित एक घटना का जिक्र करते हुए उन्होंने कहा, “हम एक गाँव में किसानों की सभा कर रहे थे, तो वहां एक महिला किसान ने सभा के बाद कहा कि सर, आप मेरे गाँव आइए, एक समस्या पर बात करनी है।

जब कौशलेंद्र अपनी उनकी टीम के साथ वहाँ गए तो पता चला कि उनके समूह का नेतृत्व जिस महिला के हाथ में है, उस पर कोई भरोसा ही नहीं कर रहा है। दरअसल, वहां सभी को लगा कि उनके इकट्ठे किए हुए पैसे, जो बैंक में जमा करने होते हैं, उसने अपने लिए खर्च कर दिए हैं और जब समूह की लीडर उन्हें बैंक का स्टेटमेंट दिखा रही थीं तो उसे पढ़ पाना किसी के लिए संभव नहीं था। इसके चलते गाँव में काफ़ी तनाव का माहौल था।

इस समस्या का हल कौशलेंद्र को सिर्फ़ शिक्षा में ही नज़र आया और उन्होंने महिलाओं से पूछा कि क्या वे पढ़ना चाहेंगी। जब सभी इसके लिए राजी हो गईं तो उन्होंने वहाँ दोपहर बाद उनके लिए शिक्षा की व्यवस्था करवाई, ताकि उन्हें कम से कम साक्षर तो बनाया जा सके।

आज कौशलेंद्र के इन कामों से लगभग 35, 000 किसान परिवारों को फायदा मिल रहा है। उनकी कोशिश है कि हर किसान की मासिक आय कम से कम इतनी हो कि वह अपने बच्चों को अच्छे स्कूल में भेज सके। ख़ुशी की बात यह है कि अब उनकी कोशिशें रंग ला रही हैं।

कौशलेंद्र ने कहा,

“पिछले कुछ समय से मैंने एक अन्य पहल शुरू की है। मैं पूरे उत्तर बिहार का भ्रमण कर रहा हूँ। मैं कहीं भी रुकने के लिए होटल या धर्मशाला नहीं तलाशता, बल्कि मैं उन किसानों के यहाँ रुकता हूँ, जो हमसे जुड़े हुए हैं। मैंने अपने अनुभव से सीखा है कि ट्रेनिंग या मीटिंग सेशन में ज़्यादातर लोग खुलकर बात नहीं कर पाते हैं। पर जब रात में आप उनके यहाँ रुकते हैं, उनके साथ बैठकर खाना खाते हैं, चारपाई लगाकर आँगन में सोते हैं, तब जो रिश्ता बनता है, वह अलग ही होता है।”

उन्होंने एक-दो वाकये का जिक्र करते हुए बताया कि वे पूर्णिया में एक किसान के यहाँ रुके थे। पहले वह किसान किसी मीटिंग में कभी कुछ नहीं बोलता था। पर उस दिन अपने यहाँ रात को खाना खाते समय उसने कौशलेंद्र को बहुत-सी ऐसी बातों से अवगत करवाया, जो उनके काम में मददगार थीं।

ऐसे ही, एक किसान के यहाँ उन्होंने उसके बच्चों से बात की और पूछा कि उनके पिता अब ‘कौशल्या फाउंडेशन’ के साथ काम कर रहे हैं, तो उन्हें कैसा लगता है। बच्चे बहुत खुश थे और उन्होंने कहा कि अब अच्छा है। पहले हमें सरकारी स्कूल में जाना पड़ता था, पर अब बाबा को अच्छी कमाई हुई तो उन्होंने प्राइवेट स्कूल में दाखिला करवाया है।

कौशल्या फाउंडेशन के वोलंटियर गाँव-गाँव जाकर लोगों को चमकी बुखार के बारे में जागरूक भी कर रहे हैं

कौशलेंद्र इस बदलाव को अपनी असली सफलता मानते हैं। अंत में वे सिर्फ़ यही कहते हैं,

“मैं महात्मा गाँधी के देश में पैदा हुआ हूँ। वह आदमी जो सिर्फ़ एक धोती पहनकर और एक लाठी लेकर चलता था, उसने पूरे देश में क्रांति ला दी। अगर वह कह दे तो आंदोलन शुरू हो जाए और जरा-सी हिंसा होने पर उसी के कहने पर बड़े से बड़ा आंदोलन रुक जाता था। तो समस्या दूसरों में नहीं है, समस्या हम में ही है, क्योंकि हम बदलाव तो चाहते हैं, पर ख़ुद से शुरुआत नहीं करते।

महात्मा गाँधी ने बिल्कुल सही कहा है कि जो बदलाव हम दूसरों में देखना चाहते हैं, उसकी शुरुआत हमें ख़ुद से करनी होगी। इसलिए अगर हम चाहते हैं कि हमारे देश में कृषि का स्तर ऊँचा उठे, तो इसके लिए किसानों को आगे आना होगा और हर वह कोशिश करनी होगी, जिससे बदलाव हो सके।”

यदि आप एक किसान हैं और कौशल्या फाउंडेशन से किसी भी तरह की मदद चाहते हैं तो 8864000132 या 9631422145 पर डायल कर सकते हैं। इसके अलावा, आप उनके फेसबुक पेज पर भी उनसे जुड़ सकते हैं।

संपादन – मनोज झा


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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