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इनके कार्ड की मांग है विदेशों में भी, एक इनोवेटिव आइडिया ने किया कमाल, कार्ड बना रूमाल!

पिछले 25 वर्षों से वे पुणे में ‘उगम कॉपियर्स’ के नाम से फोटोकॉपी और प्रिंटिंग का व्यवसाय चला रहे हैं।

हाराष्ट्र के पुणे में रहने वाले उदय गाडगिल की बेटी नेत्रा की शादी 2016 में नवंबर में हुई थी। पर उनकी बेटी की शादी में जैसा कार्ड बांटा गया था, उसका इस्तेमाल एक अलग रूप में आज तक हो रहा है। अब राजस्थान, महाराष्ट्र और उत्तराखंड से लेकर अमेरिका तक में भी ऐसे ही कार्ड का चलन बढ़ता जा रहा है। इसी कार्ड की तर्ज पर अब देश-विदेश में लोग अपनी शादी के कार्ड छपवा रहे हैं और दूसरों को भी ऐसा करने की प्रेरणा दे रहे हैं।

इस कार्ड की ख़ासियत है कि यह इको-फ्रेंडली है और साथ ही समारोह खत्म होने के बाद भी लंबे समय तक आप इसका इस्तेमाल कर सकते हैं। जी हाँ, क्योंकि यह कार्ड सिर्फ़ कार्ड ही नहीं, बल्कि एक सूती रूमाल भी है। 12×12 इंच के इस रूमाल पर बहुत ही सुंदर ढंग से शादी या फिर किसी अन्य समारोह के कार्यक्रम के बारे में डिजिटल प्रिंटिंग की गई है, जो दो बार की धुलाई में ही निकल जाती है और फिर आप इसे रूमाल की तरह इस्तेमाल कर सकते हैं।

पर्यावरण के अनुकूल इस तरह के इनोवेटिव कार्ड को बनाने का आइडिया उदय गाडगिल का था। पिछले 25 वर्षों से वे पुणे में ‘उगम कॉपियर्स’ के नाम से फोटोकॉपी और प्रिंटिंग का व्यवसाय चला रहे हैं। 52 वर्षीय गाडगिल पर ‘स्वच्छ भारत अभियान’ का बहुत प्रभाव पड़ा। उन्होंने निश्चय किया कि वे अपने जीवन में ऐसे बदलाव करेंगे, जिससे देश की स्वच्छता और सफाई अभियान में योगदान दे सकें।

उदय गाडगिल (बाएं) रुमाल पत्रिका के साथ
रुमाल पत्रिका

इसकी शुरुआत उन्होंने अपनी बेटी की शादी से की। द बेटर इंडिया से बात करते हुए उन्होंने बताया, “अक्सर लोग कचरे को निपटाने के अलग-अलग तरीके ढूँढते हैं। लेकिन मेरा मानना है कि हम ऐसे तरीके अपनाएं जिससे ज्यादा कचरा इकट्ठा ही न हो सके। मैंने इस बारे में बहुत सोचा कि मैं ऐसा क्या कर सकता हूँ, जिससे कम से कम कचरा निकले।”

उनकी यह सोच शादी के इस इनोवेटिव कार्ड को बनवाने में व्यावहारिक रूप में सामने आई। उन्होंने फ़ैसला किया कि बेटी की शादी का कार्ड वे सूती रूमाल पर प्रिंट कराएंगे। लेकिन इसमें उन्हें कई मुश्किलों का सामना करना पड़ा। उनकी जान-पहचान वालों के मन में उनके इस कदम के प्रति झिझक तो थी ही, पर इसकी प्रिंटिंग के दौरान भी उन्हें समस्याओं का सामना करना पड़ा।

उन्होंने बताया, “मैं कोई ऐसा प्रिंट चाहता था जो दो-चार बार धुलने पर ही निकल जाए और फिर उसका रूमाल की तरह इस्तेमाल करने में लोगों को समस्या न हो। पर इस तरह का प्रिंट मिलना आसान नहीं रहा। आख़िर, बहुत खोजबीन करने के बाद ऐसे रंग मिले, जिनसे डिजिटल प्रिंट करने पर 2 बार की धुलाई में ही पूरा प्रिंट निकल जाता है।”

गाडगिल की इस पहल को बहुत से लोगों ने सराहा तो कई लोग हैरानी से उनसे पूछते कि ऐसा कार्ड क्यों? पर उनकी बेटी चित्रा और दामाद चिन्मय को अपने पिता की इस कोशिश पर गर्व है।

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चित्रा और चिन्मय

हमारे समाज में आजकल शादी-ब्याह से जुड़ी हर रस्म में लोग धन-दौलत का दिखावा करने से पीछे नहीं हटते। शादी के कार्ड से लेकर रिसेप्शन तक, हर चीज़ में उन्हें भव्यता चाहिए। पर गाडगिल का मानना है कि बदलाव तो स्वाभाविक है और अब समय की ज़रूरत के हिसाब से हमें अपने रस्मों-रिवाजों को इको-फ्रेंडली तरीके से पूरा करने पर ध्यान देना चाहिए। गाडगिल कहते हैं,

“किसी भी समारोह में वस्त्र देना बहुत ही शुभ माना जाता है। इस तरह, हम लोगों को आमंत्रित भी अगर कोई वस्त्र देकर कर रहे हैं, तो यह बहुत अच्छी बात है। इससे आपकी नेक भावना ही सामने आती है और साथ ही, आप न जाने कितने पेड़ों को बचाने में सहयोग करते हैं।”

कागज बनाने के लिए न जाने कितने ही पेड़ हर साल काटे जाते हैं। पहले ही पर्यावरण को काफ़ी नुकसान पहुँचाया जा चुका है। फिर कार्यक्रम संपन्न हो जाने के बाद ये निमंत्रण कार्ड किसी काम के नहीं रह जाते। और तो और, रद्दी वाले भी इन्हें नहीं लेते, क्योंकि इनविटेशन कार्ड के लिए जिस कागज का इस्तेमाल किया जाता है, उसे रिसाइकिल करना बहुत मुश्किल होता है। ऐसे में, गाडगिल ने सूती रूमाल के रूप में एक बहुत ही अच्छा और इको-फ्रेंडली विकल्प हमें दिया है।

उदय गाडगिल के इस इनोवेटिव आइडिया पर लोगों का ध्यान तब गया, जब ख़ुद प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पत्र लिखकर उनकी सराहना की।

गाडगिल ने कहा, “मैंने अपनी ख़ुशी से प्रधानमंत्री कार्यालय में अपनी बेटी की शादी का यह निमंत्रण पत्र भेजा था। मुझे कोई उम्मीद नहीं थी कि उन्हें यह मिलेगा या फिर उनका जवाब आएगा।”

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने गाडगिल को सराहना पत्र भेजा

गाडगिल के इस इनोवेटिव आइडिया को बहुत पसंद किया जा रहा है। रूमाल, प्रिंटिंग आदि का खर्च मिलाकर एक निमंत्रण पत्र की कीमत 25 रुपए पड़ती है। पर गाडगिल इसकी लागत को और भी कम करने के लिए काम कर रहे हैं।

उन्हें देश के अलग-अलग राज्यों राजस्थान, उत्तराखंड, तेलंगाना आदि से भी ऑर्डर मिल रहे हैं। एक ऑर्डर तो उन्हें अमेरिका से भी मिला था। लोग उन्हें सोशल मीडिया के ज़रिए कार्यक्रम की सभी जानकारी भेज देते हैं। साथ ही, जिस भी डिजाइन में वे कार्ड बनवाना चाहते हैं, बता देते हैं। एक बार सब कुछ फाइनल होने के बाद गाडगिल निमंत्रण पत्र प्रिंट करके उन्हें कूरियर कर देते हैं।

वे कहते हैं, “यह पूरा काम डिजिटल टेक्नोलॉजी से होता है। मैं तो कहता हूँ कि फालतू के दिखावों में न पड़कर अब हमें वॉट्सऐप, फेसबुक आदि के ज़रिए ही लोगों को आमंत्रित करना चाहिए। जिस भी तरीके से कचरा कम से कम हो, उसे अपनाना चाहिए। जैसे हम कहीं भी खाना खाने जाएं तो सबसे पहले टिश्यू ढूँढते हैं। मैं कहूँगा कि सबको अपने साथ रूमाल रखने की आदत डालनी चाहिये। यह ज़्यादा किफायती है।”

और अंत में, वह यही संदेश देते हैं कि अब ज़रूरी हो गया है कि हम दूसरों से सवाल करने की जगह खुद से पूछना शुरू करें। हमें खुद से पूछना चाहिए कि हम अपने देश के निर्माण में कैसे योगदान दे सकते हैं। अगर हमारे छोटे-से कदम से भी कुछ अच्छा होता है, तो हमें वह कदम उठाना चाहिए। यदि आप यह नहीं समझ पा रहे हैं कि आप क्या कर सकते हैं, तो फिर ऐसे लोगों से प्रेरणा लें, जो पहले ही कुछ सकारात्मक कर रहे हैं।

उदय गाडगिल जी से संपर्क करने के लिए इस नंबर 09422006548 पर डायल करें।

संपादन: मनोज झा


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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