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82 वर्षीय राव ने कैंसर से जूझते मरीज़ों के लिए खोला मुफ्त आश्रय-घर!

पिछले दो दशकों से बेंगलुरु होसपिस ट्रस्ट-करुणाश्रय के ज़रिए इन्होंने 20000 से भी ज़्यादा कैंसर पीड़ितों के लिए काम किया है।

म अक्सर सुपरहीरो की बातें करते हैं; लेकिन ये वो नहीं हैं जो चमत्कारिक रूप से उड़ कर लोगों की मदद करते हैं। ये वो सच्चे हीरो हैं, जिन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य ही ज़रूरतमंदों की सेवा को बना लिया है। बेंगलुरु के 82 वर्षीय किशोर राव ऐसे ही व्यक्ति हैं।

पिछले दो दशकों से बेंगलुरु होसपिस ट्रस्ट-करुणाश्रय के ज़रिए इन्होंने 20000 से भी ज़्यादा कैंसर पीड़ितों के लिए काम किया है। कैंसर पीड़ित अपने आखिरी दिन शांति और धैर्य से बिता सकें, इसके लिए उन्होंने ख़ुद को समर्पित कर दिया है। बेंगलुरु स्थित होसपिस ट्रस्ट-करुणाश्रय कैंसर पीड़ितों के लिए संभवत: देश का पहला रेजिडेंशियल पैलिएटिव केयर सेंटर है। यहाँ उन कैंसर मरीज़ों की देखभाल की जाती है, जिनकी बीमारी आख़िरी स्टेज में पहुँच चुकी होती है। द बेटर इंडिया से एक विशेष साक्षात्कार में किशोर राव ने अपने शुरुआती दिनों, इस काम की प्रेरणा, इसमें सामने आई परेशानियों और खुद अपने बारे में खुल कर बातें की।

मौत के साथ लड़ने के विचार का जन्म

राव कहते हैं, “इस पूरे मामले की शुरुआत मेरी माँ की मौत के बाद हुई। मेरी माँ कई साल पहले कैंसर से लड़ते हुए गुज़र गईं और यह बात मेरे दिमाग में बैठ गई। इसके बाद मैंने कैंसर पीड़ितों को सहारा और थोड़ी शांति देने के लिए काम करना शुरू किया।“

राव ने बाद में यह महसूस किया कि वास्तव में वे यही काम करना चाहते थे। वर्ष 1986 में कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाने के लिए गठित इंडियन कैंसर सोसाइटी की कर्नाटक शाखा की स्थापना में इन्होंने अहम भूमिका निभाई थी। इस सोसाइटी ने कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाने का काम शुरू किया। ये बताते हैं, “यह एक पुरानी सोसाइटी थी जो बॉम्बे में 1952 में बनी थी और मैंने बेंगलुरु में इसकी शाखा को खोलने के लिए काम किया था।“

राव अपनी नौकरी से समय निकाल कर कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाने और इस बीमारी की शुरुआती पहचान के लिए कैंप लगाते। साथ ही, ज़रूरतमंद लोगों की मदद भी करते।

1992 में राव ने कैंसर के अंतिम चरण से जूझ रहे लोगों की देखभाल के लिए खुद को समर्पित करने का निर्णय लिया। तीन दशकों तक नौकरी करने के बाद इन्होंने स्वेच्छा से रिटायरमेंट ले लिया।

किशोर राव

इन्होंने बताया, “उस समय मेरी फुल टाइम नौकरी थी। इससे मुझे कैंसर पीड़ितों के लिए काम करने का पूरा समय नहीं मिल पाता था। तब मैंने सोचा कि समय से पूर्व रिटायरमेंट ले लेने से इस काम को आगे बढ़ाना आसान हो जाएगा।“

कैंसर का वर्गीकरण

राव ने कैंसर को अलग-अलग वर्गों में बांटा है। वे बताते हैं, “ मैंने कैंसर को तीन हिस्से में रखा है- पहले हिस्से में कैंसर के प्रति जागरूकता फैलाने का काम है, दूसरे में उसका इलाज है और तीसरे में वह स्थिति है, जहाँ इलाज पूरा हो जाता है और मरीज़ या तो पूरी तरह ठीक हो जाते हैं या डॉक्टरों के पास उनके इलाज के लिए कोई और विकल्प नहीं बचता।“

राव का काम पहले और तीसरे हिस्से में आता है। चूंकि इनके पास कैंसर की चिकित्सा से संबंधित कोई विशेषज्ञता नहीं है, ये इस बीमारी के इलाज में दखलंदाज़ी नहीं देते, पर समय से इसकी पहचान, जागरूकता और अंत में ख्याल रखने का काम राव के हिस्से का है।

कैंसर मरीजों को आखिरी दिनों में दी जाने वाली सेवा

राव वर्षों से कैंसर रोगियों से जुड़े हुए हैं। इस दौरान इन्होंने यह देखा कि जब यह बीमारी लाइलाज हो जाती है और मरीज़ की मौत तय होती है, तो उस अवस्था में मरीज़ों को सुकून देने की कोई उचित व्यवस्था या प्रक्रिया नहीं थी। राव किदवई मेमोरियल इंस्टीट्यूट की गवर्निंग काउंसिल में शामिल थे। राव बताते हैं कि जब इन्होंने रोगियों को इस बीमारी के आखिरी चरण से जूझते देखा, खासकर उनको जो अशिक्षित और आर्थिक रूप से पिछड़े हुए थे, तो उनके मन में आख़िरी स्टेज के कैंसर मरीज़ों की देख-रेख करने के लिए अलग से सेंटर शुरू करने का विचार आया।

अपने शरीर की दशा जाने बिना, कैंसर के दर्द को बर्दाश्त करते रहने से ये रोगी अक्सर हताश और निराश हो जाते थे।

धीरे-धीरे इन्होंने कैंसर के अंतिम चरण के पहुँच चुके रोगियो के लिए काम करना शुरू कर दिया।

1992 में कैंसर मरीज़ों की आखिरी समय में देखभाल के लिए कोई योजनाबद्ध ठोस प्रयास नहीं किया जा रहा था। राव बताते हैं कि उन्हें सरकार का भी कोई सहयोग नहीं मिल रहा था।

राव ने कहा, “मुझे 1994 तक का समय उन लोगों की पहचान करने में लग गया, जो कैंसर के आखिरी स्टेज से जूझ रहे रोगियों की मदद कर सकते थे।“

इंडियन कैंसर सोसाइटी और रोटरी क्लब ऑफ इन्दिरा नगर, बेंगलुरु की मदद से राव ने बेंगलुरु होसपिस ट्रस्ट नाम से एक चैरिटेबल ट्रस्ट की स्थापना की, जिसके बारे में उनका दावा है कि कैंसर रोगियों के लिए काम करने वाला भारत में अपनी तरह का यह पहला ट्रस्ट है।

बेंगलुर होसपिस ट्रस्ट

राव बताते हैं कि कैसे शुरुआत में वे लोगों के घर जाया करते थे। वे कहते हैं, “हमने सोचा कि रोगियों का उनके घर में ही देखभाल करना सबसे सही तरीका रहेगा। महीने भर के अंदर ही हमने नर्सों की एक टीम और एक काउन्सलर को रख लिया था।“

राव और उनकी टीम ऑटो से रोगियों के घर उनकी मदद करने जाती थी।

राव बताते हैं, “उन्हें आगे क्या करना है, अस्पताल ने यह बताने की कभी कोशिश नहीं की और जिस समय हमने शुरुआत की, तब शहर में ऐसे रोगियों की देखभाल के लिए और कोई सुविधा नहीं थी।“

पहला बड़ा दान

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“मैं मुंबई किसी काम से गया था और वहाँ किसी ऐसे संगठन की तलाश में था, जो मेरी इस पहल में सहयोग देने के लिए आगे आए। मैं बॉम्बे हाउस में टाटा हेड ऑफिस पहुँच गया। बिना किसी से समय लिए पहुँचने के कारण वहाँ किसी से बात हो पाना कठिन था और मैं लौटने के लिए तैयार था, लेकिन भाग्य ने मेरा साथ दिया और मैं वहाँ के कार्यकारी निदेशक से बात करने में सफल रहा। उऩके साथ मुझे 2 घंटे बिताने का मौका मिला।“

राव बॉम्बे से लौट आए। उन्होंने बताया, “हमें एक सप्ताह के भीतर ट्रस्ट द्वारा हमारे इस काम के लिए 10 लाख की राशि की स्वीकृति दिए जाने की सूचना मिली। इससे हमें बहुत बड़ा सहारा मिला और हमें आगे बढ़ने का एक साधन मिल गया।

करुणाश्रय का जन्म

राव बताते हैं कि हर परिस्थिति में अलग-अलग लोगों से सहयोग मिलता रहा। इसके बिना यह संगठन वहाँ नहीं होता, जहाँ आज है। करुणाश्रय की शुरुआत के बारे में ये बताते हैं, “कर्नाटक के मुख्य सचिव ने सरकार तक हमारी पहुँच बनाने में अहम भूमिका निभाई। अपने रिटायरमेंट के बाद वे हमारे ट्रस्ट में शामिल हो गए और धर्मशाला बनाने के लिए सरकार से लीज़ पर ज़मीन लेने में हमारी काफी मदद की।“.

ज़मीन मिलने के बाद उस पर बिल्डिंग खड़ा करना बहुत बड़ी ज़िम्मेदारी थी।

“मुझे तब नहीं लगा था कि एक डिनर पर उस समय की प्रसिद्ध आर्किटेक्ट स्व. तारा चंदावरकर के साथ हुई बातचीत से हमें धर्मशाला के लिए जगह मिलने की संभावना पैदा हो जाएगी।”

राव को याद है कि किस प्रकार चंदावरकर ने डिनर के दौरान उन पर सवालों की बौछार कर दी थी और उनसे धर्मशाला बनाने को लेकर हर संभव सवाल पूछा।

राव ने बताया, “अंत में वे हमारे लिए एक जगह देने की योजना बनाने के लिए तैयार हो गईं।“

राव के काफी पैसे तब बच गए, जब चंदावरकर ने उनके इस काम के लिए मुफ़्त मदद करने की पेशकश की। पूरे विश्वास के साथ उनका काम करने को राज़ी होना राव की पूरी टीम का मनोबल बढ़ाने के लिए काफी था।

राव कहते हैं, “हम जो कर रहे थे, उसमें उनका सहयोग बहुत महत्वपूर्ण समय पर मिला। ऐसा लग रहा था जैसे अपने तरीके से उन्होंने अपना हाथ मेरी पीठ पर रख दिया हो और मैं जो करना चाहता था, उसकी ओर मुझे आगे बढ़ा रही हों।“

करुणाश्रय में ये क्या करते हैं

1 मई, 1999 को यह बिल्डिंग बन कर तैयार हुई और यहाँ पहले मरीज को लाया गया। बिल्डिंग बनने के 20 साल के बाद यहाँ अब तक 23,000 कैंसर मरीजों की मदद की गई है।

ये कहते हैं, “हम इन्हें जो सेवा देते हैं, वह पूरी तरह से मुफ़्त है। चाहे वो बेड हो, या दवाइयाँ, या परामर्श या फिर भोजन। चाहे अमीर हो या गरीब, किसी भी जाति या धर्म का हो, हम यहाँ आने वाले हर मरीज का स्वागत करते हैं।

1999 में 50 बेड के साथ इसकी शुरुआत की गई थी। धर्मशाला में तीन साल पहले 2 और वार्ड बढ़ा दिए गए हैं। इससे अब 73 मरीजों के रहने की व्यवस्था हो गई है। वे कहते हैं, “दुख की बात है कि हर दिन औसतन हम 2 मरीजों को खो देते हैं, क्योंकि ये हमारे पास बीमारी की अंतिम अवस्था में आते हैं।“

करुणाश्रय में आज औसतन हर दिन 73 मरीजों की देखभाल की जा रही है और होम केयर फैसिलिटी से अन्य 75 मरीजों का ध्यान रखा जा रहा है। राव कहते हैं कि ये लोग करीब 150 मरीजों की देखभाल की ज़िम्मेदारी उठा रहे हैं।

कमी से किस प्रकार निपटा जाता है?

एक घटना के बारे में ये बताते हैं, “मुझे वह दिन याद है जब यहाँ पहले मरीज को लाया गया था। मैं नर्स और डॉक्टर के साथ रूम में खड़ा था। जैसे ही उस मरीज को यहाँ लाया गया, मैं खुद को रोक नहीं पाया और मेरे आँसू निकल गए।“

 “मुझे महसूस हो रहा था कि आखिरकार मैं इनके लिए कुछ कर पा रहा हूँ और इसके साथ ऐसी भावनाएँ मेरे मन में आईं कि मैं ख़ुद पर काबू नहीं रख पाया।“

साल-दर-साल यह देखना कि किस प्रकार यह टीम इन मरीजों के आखिरी और दर्द भरे समय को आरामदायक बनाने की कोशिश करती है, इस काम के साथ होने वाली परेशानियों को कम कर देता है। ये कहते हैं, “जो बात मुझे ताकत देती है, वह ये है कि यहाँ सभी मरीज़ शांति और संतोष के साथ इस दुनिया से विदा लेते हैं।“

सम्मानपूर्ण मृत्यु

जो भी मरीज इनके साथ रहते हैं, उनकी आखिरी इच्छा पूरी करने की ज़िम्मेदारी करुणाश्रय बहुत गंभीरता से लेता है। मरीज़ कुछ चीज़ों की चाहत रखते हैं और उनकी मांग भी करते हैं। राव बताते हैं, “हमारे पास ऐसे लोग थे जिन्होंने रात में बिरयानी बनवाने और खिलाने की मांग की। उनकी नाज़ुक स्थिति को देख कर हम उन्हें यह नहीं कह सकते थे कि इसे कल के खाने में देंगे। इसलिए हमने यह तय किया कि या तो कोई जा कर यह लाएगा या तुरंत बना कर इन्हें देगा, क्योंकि यह उनका आखिरी खाना भी हो सकता था।“

यह पूछे जाने पर कि ऐसी कौन-सी बातें हैं जो इनकी उपलब्धियों का कारण रहीं, ये तीन बातों का उल्लेख करते हैं।

काम के असर को दिखा पाना

ऐसे काम का समर्थन करना जो अपने आप में अच्छा है

काम में ईमानदारी और पारदर्शिता

आज अगर आप एक अच्छा काम करना चाहते हैं, तो आपके पास मौका है खुले दिल से दान कर के राव और उनकी टीम की मदद करने का, ताकि ये अपना काम जारी रख सकें। आप मिलाप के पेज पर दान कर सकते हैं।

करुणाश्रय एयरपोर्ट-वरथुर मेन रोड, मरथहल्ली में स्थित है और +91-8476133 पर यहाँ संपर्क किया जा सकता है।

मूल लेख – विद्या राजा 

संपादन – मनोज झा 


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Written by निधि निहार दत्ता

निधि निहार दत्ता राँची के एक कोचिंग सेंटर, 'स्टडी लाइन' की संचालिका रह चुकी है. हिन्दी साहित्य मे उनकी ख़ास रूचि रही है. एक बेहतरीन लेखिका होने के साथ साथ वे एक कुशल गृहिणी भी है तथा पाक कला मे भी परिपक्व है.

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