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मिलिए आकाशवाणी की पहली महिला म्यूज़िक कम्पोजर से; बनाया था देश का पहला महिलाओं का ढोल बैंड!

बोलांदी नंदा, बंसती बिष्ट और जागर सम्राट प्रीतम भरत्वाण को पद्मश्री सम्मान से नवाज़े जाने के बाद एक बार फिर पहाड़ के लोक को गौरवान्वित होने का मौका मिला है। महिला दिवस के अवसर पर राष्ट्रपति भवन में राष्ट्रपति रामनाथ कोविन्द ने विभिन्न क्षेत्रों में उल्लेखनीय कार्य करने वाली 40 से अधिक महिलाओं को नारी शक्ति पुरस्कार से सम्मानित किया। इस अवसर पर राष्ट्रपति द्वारा लोक गीतों व लोक संगीत के संरक्षण के लिए काम करने वाली डॉ. माधुरी बड़थ्वाल को नारी शक्ति पुरस्कार-2018 से नवाज़ा गया।

ऋतु मा ऋतु कु ऋतु बडी
ऋतु मा ऋतु बसंत ऋतु बडी
……….

जौ जस देवा खोली का गणेशा

ग्वीरालू फूल फूली गे मेरा भेना

रे मासी कू फूल, फूल कविलास
के देवा चढालू, फूल कविलास 

ये लोकगीत तो महज कुछ उदाहरण हैं। उनके पास सैकड़ों लोक गीतों का खजाना है, जो आज लोक जीवन से विलुप्त हो चुके हैं। इन लोक गीतों को अगर डॉ. माधुरी बड़थ्वाल की जादुई आवाज में सुना जाए तो भला कौन लोक संगीत का मुरीद न हो जाए। माधुरी ने लोक परम्पराओं को अपनी आधुनिक सोच के साथ सहेजने का प्रयास किया है। 

नारी शक्ति पुरस्कार प्राप्त करते हुए डॉ. माधुरी


माधुरी को महज ढाई साल की उम्र में ही लोक संगीत के प्रति गहरा लगाव हो गया था। कह सकते हैं कि लोक संगीत के प्रति उनका यह लगाव नैसर्गिक था। डॉ. माधुरी बड़थ्वाल विगत 5 दशकों से लोक गीतों के संरक्षण और संवर्धन में बड़ी शिद्दत से जुटी हुई हैं। उन्होंने पिछले 50 सालों में उत्तराखंड के गाँव-गाँव में घूमकर लोक जीवन के असली कलाकारों को पहचाना और सैकड़ों लोगों को लोक संगीत का प्रशिक्षण दिया। साथ ही, पारम्परिक वाद्य यंत्रों में पुरुषों के एकाधिकार को चुनौती दी और महिलाओं की मांगल व ढोल वादन टीम बना कर एक नई नज़ीर पेश की।

आकाशवाणी की पहली महिला म्यूज़िक कम्पोजर डॉ. माधुरी बड़थ्वाल ने पारम्परिक वर्जनाओं को तोड़ और कई बाधाओं को पार कर लोक गीतों के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया। 

डॉ माधुरी बड़थ्वाल अपने शुरूआती दिनों में



19 मार्च, 1953 को जन्मी माधुरी ने अपनी ताई पार्वती देवी से लोक संगीत के बारे में जाना और पहली बार गीत गुनगुनाए। साथ ही, भुवना देवी और चंद्रमा बौ सहित गाँव की अन्य महिलाओं से भी लोक गीतों का ककहरा सीखा। लोक संगीत के प्रति उन्हें इतना जुनून था कि अक्सर छुट्टी के दिन वे गाँव के करीब जंगलों में चली जाती थीं और वहाँ गीत गाती थीं। उस जमाने में लड़कियों का गीत गाना अच्छा नहीं माना जाता था। लेकिन धुन की पक्की माधुरी ने अपनी मंज़िल खुद ही तय की। उनके गाने की वजह से माधुरी के माता-पिता को बहुत कुछ सुनना पड़ता था। माधुरी ने अपने गाँव के पास के दूसरे गाँव के शुभदास वादक, प्रख्यात ढोल सागर वादक और गब्बूदास से लोक-संगीत की बारीकियां सीखीं। माधुरी जब भी इनसे मिलतीं तो जय भैरवी गीत गुनगुनातीं।

लोकगायक चन्द्र सिंह राही के साथ

माधुरी की पढ़ाई-लिखाई लैंसडाउन में हुई। उनके पिताजी श्री चंद्रमणि उनियाल प्रख्यात गायक व सितारवादक थे। उन्होंने अपनी बेटी माधुरी को प्रयाग संगीत समिति से विधिवत संगीत की शिक्षा दिलाई। माधुरी ने 10वीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद संगीत प्रभाकर की डिग्री हासिल की। इसके बाद वे अपने ही विद्यालय राजकीय इंटर कालेज, लैंसडाउन मे संगीत अध्यापिका के रूप मे कार्य करने लगीं। माधुरी ने शास्त्रीय संगीत की विधिवत तालीम ली, लेकिन उनका मन पहाड़ के लोक गीतों में लगा रहता था। माधुरी को आकाशवाणी नजीबाबाद में प्रथम महिला म्यूज़िक कम्पोजर के रूप में अखिल भारतीय स्तर पर पहचान मिली। इस दौरान माधुरी ने सैकड़ों संगीत रचनाओं, नाटकों और रूपकों का कुशल निर्देशन, लेखन और निर्माण किया। जबकि गढ़वाली भाषा, मुहावरे, लोकोक्तियों, लोक गीतों, लोक गाथाओं व कथाओं का गूढ़ ज्ञान भी प्राप्त किया। उन्होंने हिन्दी में स्नातकोत्तर भी किया। इससे उनका संगीत और साहित्य से अनूठा रिश्ता बनता चला गया। पति डॉ. मनुराज शर्मा का भी माधुरी को हर कदम पर साथ मिला। उन्होंने मांगल टीम बनाई और ढोल वादन में महिलाओं को पारंगत कर पुरुषों के प्रभुत्व को चुनौती दी।

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वाद्य यंत्रो के साथ डॉ. माधुरी


आकाशवाणी में 32 साल कार्य करने के उपरांत सेवानिवृत्त होने के बाद माधुरी बड़थ्वाल ने लोक संस्कृति और लोक गीतों को आने वाली पीढ़ी तक पहुँचाने और इसके संरक्षण-संवर्धन के लिए महिलाओं की मांगल टीम बनाकर उन्हें ढोल वादन में पारंगत किया। महिलाओं को ढोल वादन के क्षेत्र में लाना रूढ़िवादी परम्परा के पैरोकारों को चुनौती देना था। लेकिन माधुरी ने हार नहीं मानी और आज उनका महिलाओं का ढोल बैंड लोगों के लिए एक नज़ीर है। 


लोकगीतों का संरक्षण और संवर्धन जरूरी — माधुरी बड़थ्वाल

“लोक गीतों के मूल को ढूंढना व पहचानना होगा। लोक संस्कृति को बचाने की ज़िम्मेदारी हर व्यक्ति की है। हमारी पहचान, हमारी लोक संस्कृति इन्हीं लोक गीतों में समाहित है। लोक में लोक गीतों का असीमित भंडार मौजूद है। लोक गीतों में जीवन के सभी संस्कार, लोक जीवन, तीज-त्योहार, ऋतु और परम्पराएँ रची-बसी हैं। आज सैकड़ों लोक गीत विलुप्त हो चुके हैं, इसलिए इनके संरक्षण और संवर्धन को लेकर ठोस प्रयास किए जाने चाहिए। उत्तराखंड में जन्म लेना सौभाग्य है। जीवनपर्यंत बदरी-केदार का आशीर्वाद मिला, तभी जाकर मैं कुछ कर पाई। मेरे लिए लोक गीत महत्वपूर्ण हैं, जिनमें मेरी सांसें रची-बसी हैं। शायद मेरा जन्म भी ज़माने की बेतुकी रूढ़ियों को तोड़ने के लिए ही हुआ है। इतनी सारी बहनों को लोक-संगीत की नि:शुल्क तालीम देना आज ऐसा रंग लाया कि सरकारी और गैर सरकारी महकमों के कार्यक्रमों का माँगल गायन से ही शुभारम्भ हो रहा है। घर-घर शादियों में माँगल गायन हो रहा है। देखा-देखी अच्छी बात की है। ऐसा ही चाहती थी मैं अब देहरादून से बाहर भी जा रही हूँ सिखाने के लिए। अब तक हजारों लोग सीख चुके हैं। बच्चे, युवा, प्रौढ्, स्त्री, पुरुष तन-मन-धन से सशक्त हो रहे हैं और लोक संस्कृति का संवर्द्धन भी हो रहा है।”

अपने आप में हैं लोकगीतों का शोध संस्थान  


लोक संगीत और लोक गीतों पर 50 साल का शोध और अनुभव से माधुरी अपने आप में एक शोध संस्थान कहलाने के लिए काफी हैं। वे विभिन्न स्कूलों के छात्रों से लेकर कॉलेज, यूनिवर्सिटी और संगीत पर शोध करने वाले देश और विदेशों के शोध छात्रों का मार्गदर्शन करती हैं और उन्हे लोक संगीत की शिक्षा देती हैं। उन्होंने लोक संगीत के साथ भारतीय शास्त्रीय संगीत को मिश्रित किया है। संस्कृति विभाग में लोक कलाकारों को सूचीबद्ध करने में भी डॉ. माधुरी ने निर्णायक भूमिका निभाई है। 

 सभी तस्वीरे साभार 

संपादन: मनोज झा


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Written by Sanjay Chauhan

संजय चौहान, उत्तराखंड राज्य के सीमांत जनपद चमोली के पीपलकोटी के निवासी हैं। ये विगत 16 बरसों से पत्रकारिता के क्षेत्र में है। पत्रकारिता के लिए इन्हें 2016 का उमेश डोभाल पत्रकारिता पुरस्कार (सोशल मीडिया) सहित कई सम्मान मिल चुके हैं। उत्तराखंड में जनसरोकारों की पत्रकारिता के ये मजबूत स्तम्भ हैं। पत्रकारिता, समाजशास्त्र, राजनीति विज्ञान में डिग्री हासिल करने वाले संजय चौहान नें लेखनी के जरिए कई गुमनाम प्रतिभाओं को पहचान दिलाई है। ग्राउंड जीरो से उत्तराखंड की लोकसंस्कृति और जनसरोकारों पर इनके द्वारा लिखे जाने वाले आर्टिकल का हर किसी को इंतजार रहता है। पहाड़ में रहकर इन्होंने पत्रकारिता को नयी पहचान दिलाई है। ये वर्तमान में फ़्री लांस जर्नलिस्ट्स के रूप में कार्य करते हैं।

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