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सरकारी स्कूल के इस शिक्षक ने पहले खुद अंग्रेज़ी सीखी, फिर अपने छात्रों को सिखाई फर्राटेदार इंग्लिश!

भी सरकारी स्कूल के जर्जर भवन में, तो कभी क्लासरूम न होने के कारण ग्राउंड में बैठकर पढाई करना, कभी तालाब पार कर या मीलो चल कर सरकारी स्कूल तक का रास्ता तय करना – इस तरह की अधिकांश बातें हमें अख़बार में पढ़ने को मिलती है। देश में सरकारी स्कूलों में शिक्षा की गुणवत्ता को लेकर हमेशा बहस छिड़ी होती है, लेकिन इन नकारात्मक ख़बरों के बीच छत्तीसगढ़ में रायगढ़ ज़िले के युवा शिक्षक शशि बैरागी सरकारी स्कूल के बच्चों के लिए फरिश्ता साबित हो रहे है।

 

सरकरी स्कूल के बच्चों को सिखाई फर्राटेदार अंग्रेजी

अंग्रेजी की कक्षा में बच्चे

शशि रायगढ़ के डोंगीपानी गांव में प्राइमरी स्कूल के शिक्षक हैं। उन्होंने स्कूल के बच्चों को अंग्रेजी बोलना, लिखना और पढ़ना सिखाया है और आज स्कूल के बच्चे फर्राटेदार अंग्रेजी में बात करते है। अंग्रेजी बोलने और लिखने के साथ-साथ ग्रामर भी बेहतर तरीके से समझते है। शुरुआत में गांव के बच्चे नियमित रूप से स्कूल नहीं आते थे। अंग्रेज़ी तो दूर, ये बच्चें ठीक से हिंदी बोल पाते थे। पर आज वही बच्चे रेगुलर स्कूल आते है और पूरे आत्मविश्वास के साथ अंग्रेजी और हिंदी बोलते है। अब बच्चे पढ़ाई के महत्व को समझने लगे है। जो बच्चे कभी अपने परिवार के साथ जंगल में तेंदूपत्ता तोड़ने जाते थे, आज वो डॉक्टर और सरकारी अधिकारी बनने की सोचने लगे है, और अंग्रेजी के साथ साथ बाकी विषयों को भी ध्यान से पढ़ने और समझने लगे है।

 

आसान नहीं थी राह, लेकिन हार नहीं मानी

बच्चो को स्कूल ले जाते शशि बैरागी

चारों तरफ घने जंगल के बीच डोंगीपानी गांव है जिसकी आबादी 250 है। यह गांव रायगढ़ जिले का एक मात्र वन ग्राम है जो रायगढ़ से 60 किलोमीटर दूर बरमकेला विकासखंड के अंतर्गत है।

शशि बताते है, “जब सबसे पहले मेरी पोस्टिंग गांव के प्राथमिक शाला में हुई, तो मैंने ब्लॉक मुख्यालय बरमकेला में इस गांव के बारे में पूछा। कोई भी ठीक से नहीं बता पा रहा था लेकिन जैसी तैसे गांव पहुंच ही गया। पहली बार गांव की स्थिति देखकर मैं सहम गया था,बच्चे स्कूल नहीं आते थे और कई प्रकार के नशे के आदि थे। गरीबी इतनी की बच्चे स्कूल छोड़कर अपने परिवार के साथ जंगल में काम करने जाते थे। यह सब देखकर लगा कि सबसे पहले तो इस गांव में जागरूकता की जरुरत है।”

बच्चों की खातिर शशि गांव में ही बने हुए वन विभाग के एक मकान में रहने लगे और उन्होंने बच्चों के माता -पिता से मिलना शुरू किया। शुरुआत में सबने एक स्वर में कह दिया कि अगर बच्चे रोज़ स्कूल जायेंगे तो जंगल में काम करने कौन जायेगा ? हम लोगों का घर कैसे चलेगा?

शशि बताते हैं, “एक बार तो एक माँ ने कहा ‘हमर लइका ये हमन स्कूल भेजी की नई भेजी तुंहर का जात हे’ (हमारे बच्चे को स्कूल भेजे या न भेजे इसमें तुम्हारा क्या जाता है?) यह सब सुनकर बुरा तो लगता था, लेकिन मेरी लड़ाई इन बच्चों के अधिकार के लिए थी। मैंने सभी गांव वालो को समझाना शुरू किया कि ‘आप क्या चाहते है कि आपके बच्चे बड़े होकर आप के जैसे महुआ बीनने जाए ,जंगल से लकड़ी काट के बेचे, दूसरे की मजदूरी करे, गुलामी करे, क्या आप नहीं चाहते कि आप का बच्चा पढ़ लिखकर सफल आदमी बने, अफसर बने, डॉक्टर, इंजीनियर बने और काफी समझाइश के बाद गांव वाले समझने लगे।”

अब बच्चे स्कूल आने लगे थे, धीरे-धीरे पढ़ाई के प्रति सजग भी होने लगे और अधिकांश बच्चे और उनके माता पिता पढ़ाई की अहमियत को समझने लगे थे। लेकिन अब भी एक बड़ी समस्या यह थी कि बच्चों को हिंदी और अंग्रेजी न लिखनी आती थी और न बोलनी आती थी।

“मैंने खेल के माध्यम से इन बच्चों को हिंदी बोलना और लिखना सिखाया, सोचता था इन्हें अंग्रज़ी भी सिखाऊंगा लेकिन समझ नहीं आ रहा था कैसे सिखाया जाए,” शशि कहते हैं।

पहले खुद सीखी अंग्रेज़ी

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एक दिन फिल्म देखने के लिए शशि रायगढ़ शहर गए थे। उन्होंने फिल्म में एक गांव का दृश्य देखा, जिसमें बच्चों को अंग्रेजी बोलनी नहीं आती थी और जिसके कारण उन बच्चों को जगह-जगह अपमानित होना पड़ता था। गांव के इन बच्चों को शहर में रोजगार भी नहीं मिल रहा था, क्योंकि वो अंग्रेजी में बात करना नहीं जानते थे। फिल्म के इस दृश्य ने शशि को भीतर तक झकझोर कर रख दिया। फिल्म के बच्चों में शशि को अपने छात्र दिखने लगे और उस दिन से शशि ने बच्चो को अंग्रेजी पढ़ाने की ठान ली। उनका मानना था कि यदि बड़े शहरों के प्राइवेट स्कूल में पढ़ने वाले बच्चे इंग्लिश बोल सकते है, तो हमारे गांव के सरकारी स्कूल के बच्चे क्यों नही बोल सकते। पर समस्या यह थी कि शशि स्वयं हिंदी माध्यम में पढ़े थे और उन्हें ही ठीक से अंग्रेजी नहीं आती थी।

पर शशि ने हार नहीं मानी और बच्चों को अंग्रेजी सिखाने के लिए स्वयं पहले अंग्रेजी सीखने के लिए टयूशन लिया और स्वयं सीखकर बच्चों को सिखाना शुरू किया। प्रारम्भ में बच्चों को सिंपल सेन्टेन्सेस पढ़ना-लिखना सिखाया, इसके बाद उन्हें ग्रामर सिखाया, अंग्रेजी सीखने के साथ साथ उनका आत्मविश्वास बढ़ सके इसलिए क्लास में बातचीत भी अंग्रेजी में होने लगी और साथ ही साथ बच्चों को सामान्य ज्ञान की पढ़ाई भी कराने लगे।

अब पढ़ाते है सरकारी शिक्षकों को

शशि चाहते हैं कि सभी स्कूलों में ऐसे ही बच्चे अच्छे से अंग्रेजी पढ़े और बोले। परंतु यह संभव नहीं है कि वो सभी स्कूलों में जाकर बच्चों को अंग्रेजी सीखा सके। इसलिए उन्होंने सरकारी स्कूल के शिक्षकों को ही अंग्रेजी पढ़ाने का सोचा, ताकि वे इंग्लिश में परिपक्व होकर अपने-अपने स्कूल में जाकर महंगे प्राइवेट स्कूलों के बच्चों की तरह जानकार बना सकें। इस मुहीम को वहाँ के संकुल समन्वयक प्रेमसागर नायक ने सराहते हुए उनके मार्गदर्शन में संकुल भवन में ही अंग्रेजी की कक्षा लगानी शुरू की, जिसमें आस-पास के गांव के शिक्षक अंग्रेजी पढ़ने आने लगे है ताकि वे गांव जाकर अपने छात्रों को पढ़ा सके। अब तक 20 स्कूलों के शिक्षकों को शशि अंग्रेजी पढ़ा चुके है।

हर जगह से मिल रही है मदद

शशि के इस अनूठी पहल की चर्चा भारत के साथ ही विदेशों में भी हो रही है। विदेश में बैठे लोगों ने जब बच्चों को अंग्रेजी बोलते देखा, तो मदद किए बिना नहीं रह पाए। लंदन के नरेंद्र फांसे नामक व्यक्ति ने 10 हजार रुपए का चेक, कनाडा के गौरव अरोरा ने 15 स्कूल बैग, यूपी के एक बिजनेसमैन त्रिलोचन सिंह ने 20 स्कूल बैग भेजे। वहीं स्थानीय स्तर पर रामदास द्रोपदी फाउंडेशन की ओर से स्कूल के बच्चों को दरी, जूता, टाई बेल्ट, पुस्तक कॉपी व सारंगढ़ की मानवता नामक एक संस्था ने बच्चों को कॉपी, पेन, दरी व खेलकूद का सामान,धरम वस्त्रालय ने बच्चों को स्वेटर, और उनके सहयोगी टीचर रघुराम पैकरा, मुकेश चौहान, अभिषेक मनहर ने वॉटर प्यूरीफायर भेंट की है।

शशि कहते है, “एक शिक्षक का पद बहुत गरिमामयी पद होता है। एक अच्छा शिक्षक यदि कोयले को छुए, तो उसे सोना बना सकता है। वैसे तो सभी सरकारी स्कूलों में कुछ संसाधनों की कमी रहती ही है और वर्तमान परिदृश्य में सरकार चाह कर भी इन कमियों को दूर नहीं कर सकती, पर मैंने अनुभव किया है कि यदि शिक्षक चाहे तो कुछ भी कर सकता है। यह कमी कोई मायने नहीं रखती और आज बहुत से ऐसे टीचर भी है, जो इन सब कमियों के बावजूद भी बहुत अच्छे से अध्यापन कार्य करा रहे हैं। उनके बच्चे भी किसी प्राइवेट स्कूल के बच्चों से कम नहीं हैं और समय के साथ हम शिक्षकों को भी बदलना आवश्यक है और अपने कार्य को पूरी ईमानदारी से करना है।”

शशि बैरागी स्वयं सरकारी स्कूल से पढ़े हुए। वे जब कहते थे कि मैं बच्चों को पढ़ना सिखाऊंगा,अच्छी अंग्रेजी बोलना सिखाऊंगा और सपने देखना सिखाऊँगा, तो बहुत लोग कहते कि इन बच्चों का वर्तमान और भविष्य जंगल में ही है, इनकी यही नियति है। यह सुनकर शशि नाराज़ जरूर हुए लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी और अपनी निरंतर मेहनत और लगन से यह साबित कर दिया कि बदलाव के लिए आवश्यकता है, तो जूनून की।

लोगों के ताने, संसाधनों का अभाव और कठिन से कठिन परिस्थिति भी इस शिक्षक को नहीं हरा पाए। आज देश में शशि जैसे शिक्षकों की जरुरत है, जो अपनी ज़िम्मेदारियों को बखूबी निभाते है।

इस शानदार पहल के लिए शिक्षक शशि बैरागी को सलाम I

इन बच्चो के भविष्य को दिशा देने हेतु या शिक्षा में किसी भी तरह का योगदान हेतु आप शशि बैरागी से skbairagi1989@gmail.com या 9644129040 पर संपर्क कर सकते है I

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by जिनेन्द्र पारख

जिनेन्द्र पारख हिदायतुल्लाह राष्ट्रीय विधि विश्वविद्यालय, रायपुर के छात्र हैं. छत्तीसगढ़ के राजनांदगांव से आते हैं. इनकी रुचियों में शुमार है – समकालीन विषयों पर पढ़ना, लिखना जीवन के हर हिस्से को सकारात्मक रूप से देखना , इतिहास पढ़ना एवं समझना.

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