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खुद किताबों के अभाव में बड़ा हुआ यह पत्रकार अब आपकी रद्दी को बना रहा है ग्रामीण बच्चों का साहित्य!

“किताबें झाँकती हैं बंद आलमारी के शीशों से
बड़ी हसरत से तकती हैं
महीनों अब मुलाकातें नहीं होती
जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं
अब अक्सर गुज़र जाती है कम्प्यूटर के पर्दों पर”

गुलज़ार की यह पंक्तियाँ हमारे वर्तमान समाज का आईना है। इस बात में कोई दो राय नहीं, कि आज तकनीकी की दुनिया में हम किताबों से दूर होते जा रहे हैं। हमारी दुनिया एक स्मार्ट फ़ोन में ही सिमट कर रह गयी हो जैसे। जहाँ एक तरफ पूरी दुनिया इस विषय की चिंता में है कि आने वाली पीढियां कहीं तकनीकी पर ही निर्भर न होकर रह जाएँ, तो वहीं बिहार के एक युवक की कोशिश है कि देश के हर उस कोने में लाइब्रेरी खुलें, जहां आज भी बच्चे किताबों के लिए तरसते हैं।

बिहार में गोपालगंज जिले के लुहसी गाँव से ताल्लुक रखने वाले जय प्रकाश मिश्र, साल 2007 से दिल्ली में रह रहे हैं। लेकिन आज भी उनका गाँव जैसे उनकी रूह में बसता है। सालों से मेट्रो सिटी में रहकर भी, वे हमेशा इसी प्रयास में रहे कि वे कैसे बिहार के गांवों में बदलाव लायें।

जय प्रकाश मिश्र

पत्रकारिता से मास्टर्स करने वाले जय प्रकाश ने बचपन से ही बहुत-सी मुश्किलों का सामना किया। उनके पिता गाँव के पास एक छोटे से कस्बे में जाकर अख़बार बेचते थे। उनकी आय से बहुत मुश्किल से उनके परिवार का निर्वाह हो पाता था। “लेकिन पापा को उस काम में भी संतुष्टि मिलती थी। अक्सर मैं उनके साथ जाया करता था और देखता था कि जो भी अख़बार बच जाते थे, उन्हें वे मुफ़्त में बच्चों और युवाओं को दे देते थे और उनसे पढ़ने के लिए कहते। शायद उनके मन में भी हमेशा से पढ़ने और पढ़ाने का भाव रहा होगा। उन्हीं से मुझे प्रेरणा मिली कि बच्चों को पढ़ने के लिए प्रेरित करें,” द बेटर इंडिया से बात करते हुए जय प्रकाश ने कहा।

किताबों और मूलभूत सुविधाओं के अभाव में जैसे-तैसे जय प्रकाश ने अपनी ग्रेजुएशन पूरी की। इसके बाद, उन्होंने पटना की नालंदा ओपन यूनिवर्सिटी से पत्रकारिता में मास्टर्स के लिए अप्लाई किया। “पापा के काम के चलते मेरा हमेशा ही अख़बारों से रिश्ता रहा। मैं अख़बार पढ़ता था, उनके साथ जाकर बेचता था, तो फिर सोचा कि क्यों न अख़बार के लिए ही लिखा जाये।”

इस सोच के साथ उन्होंने अपनी मास्टर्स शुरू की और पढ़ाई के साथ ही, उन्होंने ‘आज अख़बार’ और ‘राष्ट्रीय सहारा’ जैसे संगठनों के साथ काम भी किया। अपनी मास्टर्स की पढ़ाई पूरी होने तक उन्हें पत्रकारिता में अच्छा अनुभव भी हो गया था और साल 2007 में वे दिल्ली आ गये।

यहाँ कुछ दिनों तक उन्होंने ‘द संडे इंडियन मैगज़ीन’ के साथ काम किया और फिर महुआ न्यूज़ चैनल के साथ जुड़े। साल 2010 में उन्होंने हिंदुस्तान अख़बार के साथ काम करना शुरू किया। उनकी जॉब अच्छी चल रही थी, लेकिन फिर भी एक बात थी, जो रह-रहकर उनका दिल कचोटती थी। जय प्रकाश बताते हैं कि दिल्ली में ही आकर उन्हें सही मायनों में किताबें पढ़ने का मौका मिला था।

“इसलिए जब भी मैं किताबों को रद्दी के भाव बिकता देखता, या फिर कहीं भी घरों के बाहर पड़ी-पड़ी किताबें गल रही होती, तो मैं बैचेन हो जाता था। मुझे लगता कि मेरा पूरा बचपन किताबों से महरूम रहा और यहाँ लोग इतनी महंगी किताबों को भी कचरे वाले को पकड़ा देते हैं,” जय प्रकाश ने बताया।

उनके दिलो-दिमाग से यह बात जाती ही नहीं थी कि दिल्ली से कोसों दूर बहुत से गांवों में आज भी बच्चों को स्कूली पढ़ाई के लिए भी किताबें उपलब्ध नहीं हो पाती हैं। जय प्रकाश ऐसे दूरगामी क्षेत्रों के लिए कुछ करना चाहते थे, ताकि जो परेशानियाँ उन्होंने झेलीं, वह कोई और न देखे।

फरवरी 2014 में उन्होंने अपनी नौकरी से इस्तीफ़ा दे दिया और गाँव में पुस्तकालय खोलने के इरादे से, किताबें इकट्ठा करने का अभियान शुरू किया।

अपने इस अभियान को उन्होंने नवंबर 2014 में ही ‘फाउंडेशन ज़िंदगी’ के नाम से रजिस्टर करवाया। हालांकि, इस संगठन से उनका उद्देश्य ज़्यादा से ज़्यादा लोगों को अपने साथ जोड़कर ज़्यादा से ज़्यादा किताबें इकट्ठा करना था।

‘फाउंडेशन ज़िंदगी’ के बैनर तले, उन्होंने शहर भर से किताबें जमाना शुरू किया। सबसे पहले, दिल्ली में कई कबाड़ की जगहों पर उन्होंने निरीक्षण किया और इस कबाड़ में से उन्होंने हज़ारों की संख्या में किताबें इकट्ठा की।

इसके अलावा, वे घर-घर जाकर लोगों से किताबें इकट्ठा करते। हालांकि, यह काम इतना आसान नहीं था। उन्हें लोगों का भरोसा जीतने में वक़्त लगा। क्योंकि ये लोग अगर रद्दी वाले को किताबें बेचते थे, तो उन्हें बदले में कुछ पैसे मिलते थे। पर जय प्रकाश तो उनसे मुफ़्त में उनकी इस्तेमाल की हुई किताबें मांग रहे थे। ऐसे में, लोग उन्हें क्यों किताबें देते?

“बहुत जगह से मुझे निराशा हाथ लगी। पर बहुत से ऐसे लोग थे, जिन्होंने मेरे अभियान को समझा और मुझे न सिर्फ़ किताबें दीं, बल्कि बहुत ही आदर व सम्मान भी दिया। साल 2015 तक मैंने लगभग 25, 000 किताबें इकट्ठा कर ली थीं। जैसे-जैसे लोग मुझे पहचानने लगे, वे खुद मुझे फ़ोन करके अपने घर से किताबें ले जाने के लिए कहते थे। इसके अलावा, बहुत बार इस अभियान पर दूसरे लोग सोशल मीडिया पर भी पोस्ट करते हैं और इससे भी मुझे काफ़ी मदद मिली,” जय प्रकाश ने कहा।

फोटो साभार: जय प्रकाश मिश्र

किताबें तो इकट्ठा हो रही थीं, लेकिन उनकी निजी ज़िंदगी की जद्दोज़हद अभी भी जारी थी। जय प्रकाश पर अपनी पत्नी और बच्चों की भी ज़िम्मेदारी थी, जो उन्हें पूरी करनी थी। शुरुआत में तो उन्होंने अपनी बचत के पैसों पर निर्भर किया और फिर धीरे-धीरे वे अलग-अलग लेखन के प्रोजेक्ट करने लगे।

“पर फिर भी, आय पहले से काफ़ी कम हो गयी थी। इसलिए मेरे इस फ़ैसले पर मेरी पत्नी और बाकी परिवार को भी एतराज़ था। पर फिर भी मेरी पत्नी ने हर कदम पर मेरा साथ दिया। दिल्ली में रहते हुए, मैंने अपने रहन-सहन की शैली में काफ़ी बदलाव किये। आज भी दिक्कतें होती हैं, लेकिन अब हम सब मिलकर संभाल लेते हैं। अब मेरी पत्नी भी इस अभियान में मदद कर रही हैं,” उन्होंने बताया।

लगभग 2 सालों में ही, उन्होंने इतनी किताबें इकट्ठी कर लीं, कि वे कई स्थानों पर लाइब्रेरी खोल सकते थे। लेकिन अब और भी कई चुनौतियाँ थीं, जिनसे उन्हें निपटना था। एक चुनौती थी कि आख़िर कैसे इन किताबों को गाँव तक पहुँचाया जाये और फिर गाँव में लाइब्रेरी खोलने के लिए जगह मिलना भी बहुत मुश्किल था।

साल 2016 में, वे अपने गाँव पहुंचे और वहां उन्होंने गाँववालों से बात करना शुरू किया। जब उन्हें अपने खुद के गाँव में लाइब्रेरी के लिए कोई ख़ास जगह नहीं मिली, तो उन्होंने आस-पास के गांवों का दौरा किया और वहां के लोगों से मदद मांगी।

उनकी दिन-रात की मेहनत रंग लायी और सदर प्रखंड के जादोपुर दुखहरण गाँव में उन्हें उनकी पहली ‘सामुदायिक लाइब्रेरी’ खोलने की जगह मिली। यह दरअसल, गाँव का सामुदायिक हॉल था, जिसे किसी अच्छे काम में इस्तेमाल न करके जुआ, ताश आदि खेलने का अड्डा बनाया हुआ था। जब गाँव के कुछ बौद्धिक लोगों को जय प्रकाश के उद्देश्य के बारे में पता चला, तो उन्होंने ख़ुशी-ख़ुशी इसी सामुदायिक जगह को लाइब्रेरी के लिए समर्पित करने का निश्चय किया।

“इस हॉल को लाइब्रेरी की शक्ल देना भी चुनौतीपूर्ण था। किताबों को रखने के लिए रैक, टेबल, चेयर आदि की ज़रूरत तो थी ही। ऐसे में, हम लोगों ने मिलकर फेसबुक पर ही एक अभियान चलाया और लोगों से मदद की अपील की और मुझे ख़ुशी है कि बहुत से नेकदिल लोग हमारी मदद के लिए आगे आये। किसी ने अपने घरों से कुर्सियां आदि दीं, तो कुछ ने पुराने फर्नीचर को हमारे लिए भेजा,” जय प्रकाश ने बताया।

इसके अलावा, आईटीआई में पढ़ने वाले बच्चों ने उन्हें किताबों के लिए रैक बनाकर दिए।

इस तरह पूरे समुदाय के प्रयासों से, फाउंडेशन ज़िंदगी के बैनर तले लगभग दो-ढाई हज़ार किताबों के साथ, 17 जून 2017 को इस गाँव में पहली सामुदायिक लाइब्रेरी शुरू हुई। 

फोटो साभार: जय प्रकाश मिश्र

इस लाइब्रेरी में आपको भारतीय संविधान के प्रथम संस्करण, नागरी प्रचारिणी सभा वाराणसी की हस्तलिखित ग्रन्थ, प्रतियोगी परीक्षाओं की किताबें, नामचीन लेखक-कवियों के उपन्यास, काव्य-संग्रह, बच्चों के स्कूल की पाठ्यक्रम पुस्तकें आदि मिल जाएंगी।

यह लाइब्रेरी, आज सभी गाँव वालों के लिए एक अच्छा गतिविधि केंद्र बन गया है। शाम को, गाँव की महिलाएँ और बड़े-बुजूर्ग भी यहाँ आकर बच्चों से किताबें पढ़वा कर सुनते हैं। जय प्रकाश बताते हैं कि एक स्थानीय युवा, विजेंद्र कुमार प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं और साथ ही, यहाँ की देख-रेख भी करते हैं।

आज इस एक पुस्तकालय से इस गाँव के और इस गाँव के आस-पास से लगभग 35,000 लोग लाभान्वित हो रहे हैं।

फोटो साभार: जय प्रकाश मिश्र

जय प्रकाश की यह पहल जादोपुर से होते हुए और भी गांवों में पहुँच चुकी है। इन गांवों की फ़ेहरिस्त में, सिरिपुर गाँव, हातामठिया गाँव, भरतपुरा गाँव, महिलौंग गाँव आदि शामिल हैं। साथ ही, जय प्रकाश की किताबें इकट्ठा करने की मुहीम भी लगातार आगे बढ़ रही है।

“पिछले चार सालों में इतना हुआ है कि पहले मैं लोगों के घर जाता था, लेकिन अब खुद लोग मुझे फ़ोन करके घर बुलाते हैं और किताबें देते हैं,” उन्होंने गर्व से कहा।

इस बारे में उन्होंने कई दिल छू जाने वाली घटनाओं के बारे में भी बताया, “एक बार, मुझे नोएडा से एक बुज़ुर्ग का फ़ोन आया और उन्होंने ख़ास तौर पर मुझे किताबें लेने के लिए अपने घर बुलाया। जब मैं उनके घर पहुंचा, तो अपने प्रति उनका प्यार और सम्मान देखकर मैं दंग रह गया।”

आगे वे बताते हैं, “ऐसे ही नेकदिल और किताब-प्रेमी लोगों के साथ के कारण, मैं अपने अभियान में आगे बढ़ रहा हूँ। बाहर के लोगों का साथ तो हमेशा से ही रहा, लेकिन अब मझे ख़ुशी है कि मेरे परिवार को भी मुझ पर विश्वास होने लगा है। अब मेरे पापा ने भी गाँव के घर में ही एक कमरा पुस्तकालय खोलने के लिए दिया है और जल्द ही, मेरे अपने गाँव में भी सामुदायिक लाइब्रेरी होगी।”

जय प्रकाश से प्रभावित होकर अलग-अलग शहरों में बहुत से लोग ‘किताब दान’ का अभियान चला रहे हैं। 

फोटो साभार: जय प्रकाश मिश्र

आख़िर में, जय प्रकाश द बेटर इंडिया के माध्यम से लोगों से सिर्फ़ यही अपील करते हैं, “जिनके पास किताबें हैं, वे पुरानी किताबों को रद्दी में न जाने दें। किताबों से अपने घर में लाइब्रेरी बनाएं, अपने घर में नहीं बना सकते हैं, तो खुद अपने गाँव, अपने शहर में लाइब्रेरी बनाएं और यदि वे यह नहीं कर सकते, तो मुझे याद करें। मैं उनके गाँव, उनके घर में लाइब्रेरी बनाऊंगा। ताकि, वे किताबें किसी ज़रूरतमंद के हाथों में जाएँ और उसका जीवन संवर जाये।”

यदि आपके पास भी पुरानी किताबें हैं, जो आप दान करना चाहते हैं; तो जय प्रकाश मिश्र से 9811687600 पर संपर्क करें। आप उनके फेसबुक पेज पर भी उन्हें संपर्क कर सकते हैं।

संपादन – मानबी कटोच 


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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