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आईपीएस अर्चना रामासुंदरम: पैरामिलिट्री फ़ोर्स की पहली महिला चीफ़ बनकर रचा था इतिहास!

3 फरवरी 2016 को वरिष्ठ पुलिस अधिकारी अर्चना रामासुंदरम ने पैरा-मिलिट्री फाॅर्स का नेतृत्व करने का ज़िम्मा उठाया था। भारत के 60 सालों के इतिहास में, वे पहली महिला हैं, जो पैरा-मिलिट्री फाॅर्स की हेड बनी।

वे सशस्त्र सीमा बल (एसएसबी) की महानिदेशक नियुक्त हुई थीं। एसएसबी पर 1751 किमी तक भारत-नेपाल सीमा और 699 किमी तक भारत- भूटान सीमा की रक्षा की ज़िम्मेदारी है। एसएसबी चीफ होने के नाते, उन्हें न सिर्फ़ सीमा पर रह रहे लोगों के मन में सुरक्षा की भावना को बरक़रार रखना था, बल्कि सीमा पर होने वाले अपराधों पर भी लगाम कसनी थी।

हैदराबाद पुलिस अकादमी ज्वाइन करने पर, अपनी क्लास में वे इकलौती लड़की थीं और इसके सालों बाद, वे महिला अफ़सरों के लिए एक मार्गदर्शक और प्रेरणा बनीं; यह कहानी है आईपीएस अर्चना रामासुंदरम की!

आईपीएस अर्चना रामासुंदरम (फोटो साभार)

उत्तर प्रदेश में बलिया जिले के एक मध्यम- वर्गीय परिवार में पली-बढ़ी अर्चना ने दूरदर्शन के लोकप्रिय टॉक शो तेजस्विनी में एक साक्षात्कार के दौरान बताया था, “उस समय जब लड़कियों के लिए शिक्षा प्राप्त करना सपने जैसा हुआ करता था, तब मेरे पिताजी ने न सिर्फ़ मुझे पढ़ने के लिए प्रेरित किया; बल्कि लड़कियों के लिए असामान्य माने जाने वाले इस क्षेत्र में करियर बनाने में भी साथ दिया।”

उनके पिता एक जज के रूप में सेवानिवृत हुए और अक्सर उनका संपर्क पुलिस वालों से होता रहता था; ऐसे में, उनको भी पुलिस की वर्दी ने हमेशा आकर्षित किया और पुलिस के प्रति उनके इस लगाव का असर उनकी बेटी अर्चना पर भी पड़ा।

स्कूल के दिनों से ही पढ़ाई और अन्य गतिविधियों में आगे रहने वाली अर्चना को हमेशा से पता था कि आगे चल कर उन्हें आईएएस या आईपीएस अफ़सर बनना है।

तेजस्विनी के इंटरव्यू में उन्होंने कहा, “मैं चाहती थी कि मैं कोई ऐसी नौकरी करूँ, जिसमें मेरा मतलब सिर्फ़ महीने की तनख्वाह से न हो। मैं काम करते हुए एक बदलाव लाना चाहती थी।”

राजस्थान विश्वविद्यालय से इकोनॉमिक्स में पोस्ट- ग्रेजुएशन करने के बाद, उन्होंने कुछ समय के लिए लेक्चरर के रूप में काम किया और फिर यूपीएससी की परीक्षा पास की।

नौकरी के साथ- साथ परीक्षा की तैयारी करने के संघर्षभरे दिनों को वे आज भी याद करती हैं। परीक्षा पास करने के बाद उन्हें भारतीय पुलिस सेवा में नियुक्ति मिली और उन्हें सबसे पहले तमिलनाडू कैडर की पोस्टिंग मिली।

“जब मैं ट्रेनिंग के लिए हैदराबाद पुलिस अकादमी गयी, तब अपने बैच में मैं अकेली महिला थी। कभी- कभी मैं बहुत असहज और बेचैन हो जाती थी। पर मेरे बैचमेट्स और ट्रेनिंग स्टाफ के सहयोग से, धीरे- धीरे सभी मुश्किलें हल होती गयीं। आज ट्रेनिंग को तीन दशक से ज़्यादा बीत चुके हैं, पर आज भी हमारा बैच एक परिवार की तरह आपस से जुडा हुआ है।”

अपनी पढाई के लिए उन्होंने साल 1989-91 में नौकरी से दो साल का अवकाश लिया और अमेरिका की ‘यूनिवर्सिटी ऑफ़ साउथर्न कैलिफ़ोर्निया’ से क्रिमिनोलोजी विषय में एमएससी की।

उत्तर भारत में उनके घर से मीलों दूर, तमिलनाडू कैडर में काम करने के अपने अनुभव के बारे में उन्होंने बताया, “भाषा एक बहुत बड़ी चुनौती थी, क्योंकि तमिल सीखना बहुत ही मुश्किल है। पर मेरी ट्रेनिंग और अफ़सरों के लिए राज्य-भाषा में होने वाली परीक्षाओं के चलते, मैंने इस चुनौती को भी पार कर लिया।”

आगे वे तमिलनाडू के लोगों से मिले प्यार, सम्मान और साथ के बारे में बात करते हुए कहती हैं, “मदुरई, वेल्लौर, निलगिरिस के ग्रामीण इलाकों में ट्रेनिंग के दौरान, मैं गांवों में लोगों द्वारा महिलाओं को मिलने वाले आदर-सम्मान से काफ़ी प्रभावित थी। यहाँ मेरा एक औरत होना, काफ़ी फायदेमंद साबित हुआ। जब भी कानून व्यवस्था को ले कर यहाँ परिस्थितियां बिगड़ती थीं, तो बहुत अधिक सम्भावना रहती कि गाँववाले मेरे पुरुष सहकर्मियों की तुलना में मेरी बात अच्छे से सुनेंगे।”

जब उनसे पूछा गया कि नौकरी मिलने के बाद, क्या उन्हें किसी तरह के भेदभाव का सामना करना पड़ा, तो इस पर उन्होंने कहा, “मुझे लगता है कि जब आपकी नई- नई पोस्टिंग होती है, तो चाहे आप स्त्री हो या पुरुष, आपके सीनियर अफ़सर का, किसी भी ज़िम्मेदारी के लिए आप पर विश्वास करना मुश्किल होता है। पर समय के साथ, अपने काम से आप यह विश्वास हासिल कर सकते हैं। मैं ये मानती हूँ कि यहाँ स्त्री या पुरुष होने से अधिक आवश्यक है, नेतृत्व की क्षमता। और पुलिस में टीम वर्क के साथ काम करना पड़ता है।”

अगर आप इस वरिष्ठ पुलिस अधिकारी से बात करेंगे, तो आपको पता चलेगा कि वे बहुत ही सौम्य स्वभाव की हैं। उनसे जब ये पूछा गया कि क्या उन्हें कभी किसी ने कहा है कि वे पुलिस की ‘दबंग’ छवि पर खरी नहीं उतरती, तो उन्होंने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, “हमारे करियर से हमारी अपनी पहचान नहीं बदलती। जहाँ तक मेरे सौम्य स्वभाव की बात है, तो मुझे नहीं लगता कि इस वजह से कभी भी मेरे काम और मेरी ज़िम्मेदारी निभाने में कोई समस्या आई है। जब परिस्थिति के हिसाब से हमें सख्त होना पड़ता है, तो हम हो जाते हैं।”

वेल्लौर की एसपी के रूप में तस्करों और अपराधियों को रोकने से लेकर, 20,000 करोड़ रुपये के अब्दुल करीम तेल्गी फर्जी स्टाम्प पेपर घोटाले की जाँच करने वाली टीम का नेतृत्व करने तक, अपनी ज़िम्मेदारी अच्छे से निभाने के लिए साल 1995 में उन्हें पुलिस पदक और साल 2005 में अपने विशिष्ट कार्यों के लिए उन्हें राष्ट्रपति पदक से नवाज़ा गया।

साल 1999 से 2006 तक, उन्होंने नई दिल्ली में केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) में पूरी क्षमता से अपनी सेवाएं दी और कई महत्वपूर्ण केस भी सम्भाले।

मई 2014 में सीबीआई की प्रमुख के रूप में उनकी नियुक्ति को लेकर काफ़ी विवाद हुआ। दरअसल, तमिलनाडू सरकार ने उन्हें यह कह कर निलंबित कर दिया था कि उन्होंने सीबीआई का पद, राज्य सरकार के पदभार से इस्तीफ़ा दिए बिना ग्रहण किया है। यह मामला सुप्रीम कोर्ट में गया और उनकी ड्यूटी पर रोक लगा दी गयी।

यह उनके लिए बहुत मुश्किल समय था, क्योंकि वे सीबीआई चीफ होते हुए भी अपनी ड्यूटी नहीं कर पा रही थीं। बाद में, उन्हें राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो का प्रमुख नियुक्त किया गया।

फिर भी, केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल का नेतृत्व करने वाली पहली महिला अधिकारी बनकर, उन्होंने महिलाओं के लिए एक मिसाल कायम की है। केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल में केंद्रीय रिज़र्व पुलिस बल, सीमा सुरक्षा बल, भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस, केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल और सशस्त्र सीमा बल शामिल होते है। हालांकि, जब उनसे अपने इस पद के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि जैसे ही उनकी पोस्टिंग आई, तो ख़बरों में सबसे ज़्यादा उनके जेंडर पर बात हुई।

एनडीटीवी के शो एजेंडा में एक साक्षात्कार के दौरान उन्होंने पूछा,

“इससे (जेंडर से) कोई फर्क नहीं पड़ना चाहिए, पर फिर भी पड़ा। मुझसे पहले यह पद मेरे सहपाठी बी. डी शर्मा संभाल रहे थे, और फिर तीन साल बाद यह पद मुझे मिला, तो इसमें अजीब क्या है?”

एक अन्य साक्षात्कार में उन्होंने कहा कि पुलिस में उन्होंने आदमी और औरत को कभी भी अलग नज़र से नहीं देखा और उनकी नियुक्ति उनकी कड़ी मेहनत, प्रदर्शन और हुनर का नतीजा है।

वरिष्ठ पुलिस अधिकारी आर.के. मिश्रा ने नई दिल्ली में IPS अर्चना रामासुंदरम से एसएसबी के डीजी के रूप में पदभार संभाला। 

इंडिया टुडे की एक रिपोर्ट के अनुसार, जब वे एस. एस. बी की प्रमुख थीं, तो उनके नेतृत्व में फाॅर्स ने साल 2016 में 503 पीड़ितों को बचाया और 147 तस्करों को गिरफ्तार किया गया; वहीं 2017 में 472 पीड़ितों को बचाया और 132 तस्करों को हिरासत में लिया गया।

इसके अलावा, 2016- 2017 के बीच फाॅर्स ने 51 नक्सालियों से आत्मसमर्पण करवाया और उनसे 125 हथियार, 1372 गोला बारूद, 135 किलो विस्फोटक और 64 किलो आईईडी ( इम्प्रोवाइज्ड एक्स्प्लोसिव डिवाइस) जब्त किया।

इंडिया टुडे को उन्होंने बताया कि उनका प्रयास सीमा पर लोगों के लिए शांति बनाये रखने का है, पर साथ ही उन्हें ये भी सुनिश्चित करना है कि कोई भी सीमा का गलत फायदा न उठाये। ट्रांस-बॉर्डर अपराध एक चुनौती है, और फाॅर्स ने बड़े पैमाने पर बचाव कार्य किये हैं। “हम पीड़ितों से बात करते हैं, जिनसे तस्करों के बारे में काफ़ी जानकारी हासिल होती है।हम बच्चों के द्वारा ही अन्य बच्चों के लिए थिएटर सेशन (परामर्श और जागरूकता के लिए) आयोजित करवाते हैं।”

वे आगे बताती हैं कि किस प्रकार पुलिस की ड्यूटी में परिवार का सहयोग आवश्यक हो जाता है। “हमारी सर्विस बाकी सर्विस से अलग है, क्योंकि हमारी सर्विस का कोई तय समय नहीं होता, तो ऐसे में परिवार का सहयोग बहुत ही महत्त्वपूर्ण हो जाता है। और ऐसे किसी भी कार्य में, चाहे वो जिला एसपी का कोई काम हो, या रेंज डीआईजी के रूप में कोई काम हो, मुझे अपने पति का पूरा सहयोग मिला है।”

साथ ही, वे इस बात पर भी जोर डालती हैं कि 78, 000 के मज़बूत पुलिस बल में महिलाओं की भागीदारी केवल 3 प्रतिशत ही है। पर उन्हें उम्मीद है कि भर्ती की बदलती नीति और साथ ही, बदलते माहौल से भविष्य में ये आंकड़े बढ़ सकते है।

तेजस्विनी टॉक शो में उनसे महिलाओं पर हो रहे अत्याचारों के बारे में पुछा गया और जानने की कोशिश की गयी कि महिलाओं को एक सुरक्षित माहौल देने में पुलिस कहाँ चूक जाती है? इस विषय पर उनका जवाब हमें सोचने पर मजबूर कर देता है।

उनका मानना है, “महिलाओं को अभी भी वस्तु ही समझा जाता है। लोगों की सोच अभी भी नहीं बदली है। और जबकि मैं यह समझती हूँ कि यह पुलिस की ज़िम्मेदारी है कि वह ऐसा माहौल बनाएं, जहाँ न सिर्फ़ महिलाएँ बल्कि पुरुष भी खुद को सुरक्षित महसूस करें, लेकिन फिर भी पूरी तरह से इसे पुलिस प्रशासन का मुद्दा कहना गलत होगा। इस तरह देखने का यह बहुत ही छोटा नज़रिया है। न सिर्फ़ एक अफ़सर के तौर पर, लेकिन एक महिला होने के नाते भी, मुझे लगता है कि यह समाज के तौर पर हमारी ज़िम्मेदारी है कि हम औरतों के लिए एक सुरक्षित माहौल बनाएं।”

अपने 37 वर्ष के शानदार करियर से उन्होंने 31 सितम्बर, 2017 को रिटायरमेंट ली और सशस्त्र सीमा बल की कमान आईपीएस अफ़सर रजनीकांत मिश्र को सौंप दी।

मूल लेख: जोविटा अरान्हा
संपादन: निशा डागर


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Written by निधि निहार दत्ता

निधि निहार दत्ता राँची के एक कोचिंग सेंटर, 'स्टडी लाइन' की संचालिका रह चुकी है. हिन्दी साहित्य मे उनकी ख़ास रूचि रही है. एक बेहतरीन लेखिका होने के साथ साथ वे एक कुशल गृहणी भी है तथा पाक कला मे भी परिपक्व है.

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