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सुरैया आपा – वे कारीगरों की उंगलियों में पिरोती हैं जादुई तिलिस्‍म!

निज़ामों के शहर में मेरी दौड़ उस रोज़ न गोलकुंडा के उस किले तक थी, जिसने कभी बेशकीमती कोहिनूर हीरा उगला था और न ही चारमीनार में मेरी कोई दिलचस्‍पी थी। लाड बाज़ार की रौनकों को पीछे छोड़, मैं जल्‍द-से-जल्‍द पहुंचना चाहती थी सुरैया आपा की उस अलबेली दुनिया में, जहाँ पैंठणी, जामावार, हिमरू और मशरू जैसी दुर्लभ बुनकरी को आज भी जिंदा रखा गया है।

हैदराबाद की शहरी हदों से बाहर रायदुर्गम में दरगाह हुसैन शाह वली से फर्लांग भर की दूरी पर बॉटल ब्रश, आम, अमरक जैसे पुराने दरख्‍तों और मोगरे की लताओं से घिरा है सुरैया आपा (प्‍यार से उन्‍हें सब यही पुकारते हैं) का फार्म हाउस। इस ठिकाने में सुरैया हसन बोस मुस्लिम विधवाओं को उस बुनाई का ककहरा सिखाती हैं, जिसकी जड़ें दक्‍कन से ईरान तक फैली हैं। 

 

इतालवी घुमक्‍कड़ मार्को पोलो को भेंट में मिली थी हिमरू की शॉल

मार्को पोलो जब एशिया में मीलों लंबे फ़ासले पार कर दक्कन पहुंचा था, तो स्वागत में उसे हिमरू की शॉल भेंट की गई थी। उस शॉल की नफासत का जिक्र करते हुए मार्को पोलो ने अपने संस्मरण में लिखा है, वो शॉल इतनी नाजुक बुनाई वाली थी, मानो मकड़ी का महीन जाला हो। कोई भी अपने कलेक्शन में उसे रखना चाहेगा।यह जिक्र तेरहवीं सदी के दक्कन का है जिसमें हिमरू, यकीनन अपने शबाब पर थी।

 

करघों पर बुनाई की इस उम्दा तकनीक के बारे में कहा जाता है कि मुहम्मद बिन तुगलक जब दिल्ली से दौलताबाद अपनी राजधानी ले गया, तो साथ ही उन तमाम बुनकरों को भी ले गया, जिनकी उंगलियां जादुई ख्वाब बुना करती थीं। इस तरह अगली कुछ सदियों तक फारस का हुनर दक्कनी ज़मीन पर आबाद होता रहा। फिर राजेरजवाड़ों के सिमटने, नवाबों के दौर पलटने के साथ जो हश्र दूसरी कई कलाओं-शिल्‍पों का हुआ, वैसे ही हिमरू की परंपरा भी तारतार हो गई। कद्रदान सिमटते रहे और देखते ही देखते कारीगर खस्‍ताहाल हो चले।

 

वक़्त ने बिसरा दी जो विरासत, उसे संभाला सुरैया आपा ने

इस भूली-बिसरी परंपरा में फिर से जान डालने का श्रेय हासिल है सुरैया आपा को। उनके आशियाने में ही उनकी वर्कशॉप भी है, जिसमें करीब पंद्रहबीस हथकरघे लगे हैं। वे इन पर मुस्लिम विधवाओं को उम्दा और कीमती वीव्स (बुनाई) का ककहरा सिखाती हैं।

 

इन बेसहारा औरतों को करघों पर तालीम दी जाने लगी, तो इनके बच्चों की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी भी आपा ने खुद ओढ़ ली और वर्कशॉप के बाजू में ही अंग्रेज़ी मीडियम का साफरानी स्कूल खोला। अब माँएं दिनभर करघों पर काम करती हैं और निश्चिंत भी हो गई हैं कि उनके बच्चों का भविष्य स्कूल की दीवारों के बीच संवर रहा है।

 

आपा कहती हैं, ‘’जब आप कारीगरों के साथ काम करते हैं, तो उनकी परेशानियों को दूर करने की ज़िम्मेदारी आपकी होती है।”

सुरैया आपा का संबंध गांधीवादी मुस्लिम परिवार से है। उनके पिता बदरुल हसन ने करीमनगर में पहली खादी यूनिट लगायी थी और जब अंग्रेज़ों को देश से बाहर खदेड़ने का आंदोलन तेज़ हुआ, तो गांधी जी ने उनके घर के सामने ही विदेशी वस्त्रों की होली जलायी थी।

 

सुरैया उस दौर को याद करते हुए बताती हैं, ”उस घटना के बाद हमारे परिवार की औरतों ने चरखे खरीदे और उन पर कताई भी सीखी। शायद चरखे, करघे और ताने-बाने के साथ मेरे आजीवन जुड़ाव की जड़ें उसी दौर में पड़ चुकी थीं।”

 

आगे चलकर विवाह की डोर ने उन्‍हें सुभाषचंद्र बोस के परिवार से जोड़ा। सुभाषचंद्र बोस के भतीजे अरबिंदो बोस की ब्‍याहता के तौर पर वे दिल्‍ली चली आयी। चूंकि विवाह से पहले ही वे हैंडलूम और हैंडीक्राफ्ट की डगर पर बढ़ चली थी, तो यहां आकर कॉटेज इंडस्‍ट्रीज़ एंपोरियम में काम करने लगीं। पति की मृत्यु के बाद वे हैदराबाद लौट गईं, अपने चाचा के फार्म हाउस की विरासत को संभालने। 1985 में उन्‍होंने यहां अपनी हथकरघा यूनिट चालू की और खुद सिखाने लगी वो भूले-बिसरे सबक, जिन्‍हें परंपराओं ने कभी का बिसरा दिया था। इस बीच, दो मास्‍टर कारीगर भी उनके काम में मदद देने के लिए इस यूनिट से जुड़ चुके थे। फिर तो कारीगरों, ग्रामीणों, गरीबों, बेवाओं, बेसहारा हाथों को बुनाई का तिलिस्‍म सिखाने की मुहिम तेज़ हो गई।

 

हिमरू के डिजाइनों की प्रेरणा हैं ऐतिहासिक धरोहर, यानी कभी अजंता के मंदिर और उनके मूर्ति शिल्प तो कभी कोई मकबरा और गुंबज। एक धरोहर का दूसरी धरोहर से ​यह मिलन वाकई दिलचस्प है। इसी तरह, मशरू या जामदाणी और पैंठणी में ज्‍यामितीय पैटर्न से लेकर कैरी के डिजाइन, फूल-पत्तियां, मोर, बेल-बूटों के खूबसूरत मोटिफ जब तानों-बानों से गुज़रकर साकार होते हैं, तो देखने वाले दांतों तले उंगलियां दबा लेते हैं। सुरैया आपा का हस्‍तक्षेप न होता, तो यह हुनर शायद संग्रहालयों तक सिमट चुका होता। अब तेलंगाना, आंध्रप्रदेश के अलावा महाराष्‍ट्र के कुछ हिस्‍सों में भी हिमरू की कारीगरी जिंदा है।

 

हिंदुस्‍तान की इस सदियों पुरानी धरोहर को आज उम्र के नब्‍बे बसंत देख चुकने के बावजूद पूरी शिद्दत के साथ अगली पीढ़ी को सौंपने में जुटी हैं सुरैया आपा।

 

इक्‍कत और कलमकारी के हुनर भी उनकी वर्कशॉप में जिंदा हैं। तेलंगाना और आंध्र प्रदेश के कितने ही गाँव-देहातों के हुनरमंद हाथों को रोज़गार देने की गरज से वे अपनी हैदराबाद वर्कशॉप में ही एक रिटेल यूनिट भी चलाती हैं। यहां साड़ि‍यां, स्‍टोल, दरियां, वॉल हैंगिंग, डेकोरेटिव आइटम, बैग से लेकर तख्‍तपोश, मेजपोश बिकते हैं।

सुरैया आपा की रंगीन तानों-बानों की दिलफ़रेब दुनिया में इस बात का सुकून है कि वो हुनर जो ज़ालिम वक़्त की भेंट चढ़ चुके होते कभी के, आज पूरी ठसक के साथ जिंदा हैं। वे प्‍यार से मिलती हैं, अपनी करघा यूनिट दिखाती हैं, उम्र के तकाज़े के बावजूद देर तक बतियाती हैं और इस बीच, उनके सफ़र के बहाने आप जी लेते हैं वो लंबा वक्‍फ़ा, जिसमें रेशे हैं, ताने-बाने हैं, कताई है, बुनाई है, रंग हैं और उम्‍मीदें हैं।


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Written by अलका कौशिक

अलका कौशिक की यात्राओं का फलक तिब्बत से बस्तर तक, भूमध्यसागर से अटलांटिक तट पर हिलोरें लेतीं लहरों से लेकर जाने कहां-कहां तक फैला है। अपने सफर के इस बिखराव को घुमक्कड़ साहित्य में बांधना अब उनका प्रिय शगल बन चुका है। दिल्ली में जन्मी, पली-पढ़ी यह पत्रकार, ब्लॉगर, अनुवादक अपनी यात्राओं का स्वाद हिंदी में पाठकों तक पहुंचाने की जिद पाले हैं। फिलहाल दिल्ली-एनसीआर में निवास।

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