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एक्सक्लूसिव : 9 साल तक लगातार बैडमिंटन चैंपियनशिप जीतने वाली भारत की स्टार खिलाड़ी अपर्णा पोपट!

“मेरे 17 साल के करियर में सबसे अच्छी बात यह थी कि मैंने अपने खेल में स्थिरता बनाये रखी। हर बार चैंपियनशिप में दबाव होता ही था, क्योंकि नंबर एक से नीचे आना मेरे लिए कोई विकल्प नहीं था। पर मैं जानती थी कि इसके लिए मुझे किसी और को नीचे खींचने की जरूरत नहीं है; बल्कि मुझे बस ज्यादा से ज्यादा सीखना है और कड़ी मेहनत करनी है,” अपर्णा पोपट ने द बेटर इंडिया के साथ बात करते हुए कहा।

अपर्णा पोपट, भारत की पूर्व बैडमिंटन खिलाड़ी; जिन्हें अगर हम इस खेल में ‘अपराजिता’ भी कहें, तो शायद गलत नहीं होगा। अपने 17 साल के करियर में शायद ही ऐसा कोई टूर्नामेंट या चैंपियनशिप हो, जो उन्होंने नहीं जीता। अपर्णा के नाम लगातार 9 साल तक नेशनल चैंपियनशिप जीतने का ख़िताब दर्ज है। किसी भी खेल में इस तरह की स्थिरता विरले ही देखने को मिलती है।

द बेटर इंडिया के साथ खास बातचीत में अपर्णा ने कहा, “आज भारत में कोई भी खेल किसी लिंग-भेद या फिर जेंडर का मोहताज नहीं है। हर क्षेत्र में आपको बेहतर से बेहतर खिलाड़ी मिलेंगें फिर वो चाहे लड़के हों या लडकियाँ, पर सबसे पहले वो एक खिलाड़ी है। और आज के ज़माने की यह सबसे अच्छी बात है।”

एक गुजराती परिवार से ताल्लुक रखने वाली अपर्णा पोपट के लिए स्पोर्ट्स में करियर बनाना कभी भी आसान नहीं था। उन्हें हमेशा से खेलना पसंद था। अपर्णा ने बताया कि जब उन्होंने खेलना शुरू किया, तो यह आज के जैसे कोई ‘पैशन’ (जुनून) की बात नहीं थी। बल्कि उन्हें खेलना पसंद था क्योंकि इसकी वजह से वे घर से बाहर रहकर मस्ती कर सकती थीं।

“साथ ही, मैं स्पोर्ट्स के चलते बाहर रहती और घर में कम शरारत किया करती थी, तो मम्मी को भी थोड़ी शांति रहती थी। इसलिए ये मेरे और मम्मी, हम दोनों के लिए अच्छा था,” अपर्णा ने हंसते हुए कहा।

8 साल की उम्र में बैडमिंटन के साथ उनका रिश्ता जुड़ा और आज भी यह कायम है। अपर्णा ने जब बैडमिंटन खेलना शुरू किया, तब उन्हें प्रोफेशनल स्पोर्ट्स के बारे में कुछ ख़ास नहीं पता था। उस समय बैडमिंटन को नेशनल खेल के तौर पर बहुत से लोग जानते भी नहीं थे। साथ ही, इस खेल में प्रोफेशनल करियर बनाना तो बिल्कुल भी आम बात नहीं थी, क्योंकि बैडमिंटन काफ़ी महंगा स्पोर्ट्स है। रैकेट, शटल और भी बाकी ज़रूरी चीज़ें बहुत महँगी होती थी।

अपने कोच अनिल प्रधान के मार्गदर्शन में अपर्णा ने जब यह खेल खेलना शुरू किया, तो धीरे-धीरे वे इस खेल में और अच्छी होती गयीं। उनके कोच प्रधान को उनकी प्रतिभा पर पूरा भरोसा था और उन्हें यकीन था कि एक न एक दिन यह लड़की बैडमिंटन के वर्ल्ड मैप पर अपना नाम लिखेगी।

अपने कोच अनिल प्रधान और प्रकाश पादुकोण के साथ 11 वर्षीय अपर्णा पोपट

“मैंने अपना पहला नेशनल टूर्नामेंट साल 1989 में अंडर-12 केटेगरी में जीता। मैं पहली बार राष्ट्रीय स्तर पर खेल रही थी और मुझे बिल्कुल भी नहीं लगा था कि मैं जीत जाऊँगी,” अपर्णा ने बताया।

“इसके बाद मेरे साथ-साथ मेरे परिवार का भी आत्म-विश्वास काफ़ी बढ़ा और मैंने इस खेल को और भी फोकस के साथ खेलना शुरू किया,” उन्होंने आगे कहा।

अपर्णा ने इस चैंपियनशिप के बाद अंडर-15 में दो बार नेशनल जीता और चार बार अंडर-19 चैंपियनशिप जीतीं। हालांकि, चुनौतियाँ उनके लिए कभी भी कम नहीं रहीं। उनके साथ-साथ उनके परिवार ने भी बहुत मेहनत की। उनके टूर्नामेंट के लिए उनकी मम्मी हर जगह उनके साथ जाती थीं। उनके पापा हर संभव कोशिश करते कि किसी भी परेशानी का असर अपर्णा के खेल पर न पड़े।

“आसान बिल्कुल भी नहीं था कि एक गुजराती लड़की बैडमिंटन में करियर बनाये। उस समय लोगों को प्रोफेशनल खेलों के बारे में ज्यादा जानकारी भी नहीं होती थी। इसके अलावा अगर आप मिडिल-क्लास फैमिली से हैं, तो आपको सरकारी स्कॉलरशिप और स्पोंसरशिप पर भी निर्भर होना पड़ता था। आज जिस तरह के मौके खिलाड़ियों के लिए हैं, वैसे उस समय पर नहीं हुआ करते थे,” अपर्णा ने कहा।

उनके लिए किसी एक जगह भी हारना कोई विकल्प नहीं था। किसी भी चैंपियनशिप से पहले उन पर काफ़ी दबाव होता था। न सिर्फ़ उनके परिवार, उनके कोच और साथी खिलाड़ियों की, बल्कि और भी लोगों की नज़रें उन पर होती थीं कि जो लड़की इतने सालों से सिर्फ़ जीत रही है, वह इस बार क्या करेगी। अपर्णा कहती हैं कि नंबर एक पर पहुंचना शायद आसान है, पर उस पर बने रहना, बहुत मुश्किल।

लेकिन उन्होंने अपनी इस नंबर एक पोजीशन को अपने करियर में बरक़रार रखा। उन्होंने हर तरीके के दबाव और परेशानी से उभरना सीख लिया था। अपने करियर में उतार-चढ़ाव के बारे में बात करते हुए अपर्णा ने द बेटर इंडिया को बताया, “जब मैंने साल 1996 में डेनमार्क में वर्ल्ड चैंपियनशिप टूर्नामेंट में सिल्वर मेडल जीता तो यह मेरे करियर का सबसे महत्वपूर्ण दौर था।”

इसके बाद अपर्णा ने कई राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय टूर्नामेंट में भारत का नाम रौशन किया। साल 1998 में अपर्णा ने फ्रेंच ओपन ख़िताब जीतने वाली पहली भारतीय महिला खिलाड़ी बनकर एक नया रिकॉर्ड बनाया। अपनी अंतर्राष्ट्रीय उपलब्धियों के अलावा अपर्णा को जिस बात के लिए सबसे ज्यादा सराहा जाता है, वह है खेल में उनकी स्थिरता।

साल 1997 से लेकर साल 2006 तक लगातार 9 बार राष्ट्रीय सीनियर महिला बैडमिंटन खिताब जीतने का रिकॉर्ड भी अपर्णा पोपट के नाम दर्ज है।

साल 2006 के बाद अपर्णा ने खेल से संन्यास ले लिया। हालांकि, यह फैसला उनके लिए बहुत मुश्किल था। उनकी कलाई में चोट आ गयी थी और कोई भी डॉक्टर चोट का पता नहीं लगा पा रहा था। उन्होंने बताया, “मेरे करियर का आख़िरी एक-डेढ़ साल मेरे लिए बहुत तनाव भरा था। मेरी कलाई की चोट किसी भी मेडिकल टेस्ट में नहीं दिख रही थी, पर मैं दर्द में थी। जिस तरह के स्ट्रोक मैं कोर्ट में खेलती थी, वैसे खेल का आधा भी मैं नहीं कर पा रही थी। इस वजह से न सिर्फ़ फिजिकल, पर मुझे काफ़ी मानसिक तनाव भी था।”

एक तरफ अपर्णा जहाँ अपने करियर में इस तरह के तनाव से गुजर रहीं थीं, तो वहीं उन पर उनके परिवार की भी जिम्मेदारियाँ थीं। साल 2006 की नेशनल चैंपियनशिप में अपर्णा की चोट और तनाव को देखते हुए बहुत से लोगों को लगा था कि वे इस बार नहीं जीत पाएंगी।

“सब यही सोच रहे थे कि मैं नहीं जीत पाऊँगी। पर मेरे दिमाग में बस एक बात थी कि हो सकता है कि यह मेरा आख़िरी टूर्नामेंट हो, और इसलिए मैं इसे जीतकर ही जाऊँगी। जब टूर्नामेंट शुरू हुआ, तो मैं अपने गेम का 50% भी नहीं खेल पा रही थी। किसी भी खिलाड़ी के लिए यह सबसे ज्यादा निराशाजनक होता है कि उसे पता है वह अच्छे से अच्छा कर सकता है, लेकिन बस एक चोट उसका रास्ता रोक दे। लेकिन जब मैं टूर्नामेंट के फाइनल में पहुंच गयी, तो मुझे पता था कि अब कोई भी चोट मुझे यह जीतने से नहीं रोक सकती,” अपर्णा ने कहा।

साल 2006 की चैंपियनशिप की जीत अपर्णा पोपट के खाते में ही आई। उन्होंने अपने प्रोफेशनल खेल के इस आख़िरी टूर्नामेंट को पूरी गरिमा और आत्म-विश्वास के साथ खेला। और आज हम कह सकते हैं कि अपर्णा इस खेल में ‘अपराजिता’ रहीं।

प्रोफेशनल खेल से संन्यास लेने के बाद अपर्णा बैडमिंटन कोच के तौर पर खेल से जुड़ी रहीं हैं।

वर्तमान में, एक कोच होने के साथ-साथ अपर्णा एक बेहतरीन कमेंटेटर भी हैं और इसके अलावा वे इंडियन आयल कॉर्पोरेशन के साथ काम कर रही हैं।

आज के युवा खिलाड़ियों के लिए अपर्णा कहती हैं कि आज के समय में डिजिटल तकनीक और इंटरनेट के ज़रिये खिलाड़ियों के लिए अच्छे प्लेटफार्म और मौके हैं। इसलिए उन्हें हर एक मौके का सही इस्तेमाल करना चाहिए। सबसे जरुरी बात है खेल में प्रतिस्पर्धा की भावना रखते हुए, हर बार कुछ नया सीखने की ललक रखना।

“पहले से लेकर अब तक बहुत बदलाव आये हैं। आज जितने भी बैडमिंटन खिलाड़ी देश का प्रतिनिधित्व कर रहे हैं, वे सभी बहुत उम्दा हैं। उन्होंने हर बार खुद को साबित किया है और सबसे अच्छी बात है कि वे कुछ भी नया सीखने से पीछे नहीं हट रहे हैं। बाकी आगे बढ़ने के लिए कड़ी मेहनत के साथ-साथ होशियारी की भी जरूरत होती है। आपको दूसरों को नीचे नहीं गिराना है बल्कि खुद ऊपर उठना है।”

भारत में बैडमिंटन के इतिहास में अपर्णा पोपट ने अपनी एक अलग ही छाप छोड़ी है। जब भी बैडमिंटन के बारे में चर्चा होती है तो अपर्णा की इस खेल पर पकड़ और ख़ास तौर पर जिस स्थिरता और अनुभव के साथ वे खेलती थीं, उसके बारे में ज़रुर बात होती है। हो सकता है कि भारत के बहुत से आम लोगों को अपर्णा पोपट का नाम नहीं पता हो; लेकिन अपर्णा उन खिलाड़ियों में से रहीं, जिन्होंने देश में बैडमिंटन को एक मुकाम तक पहुँचने में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया है। ये अपर्णा पोपट जैसे ही खिलाड़ियों की मेहनत है कि आज भारत में बैडमिंटन सबसे ज्यादा खेले और सराहे जाने वाले खेलों में से एक है।

(संपादन – मानबी कटोच)


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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