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उड़ीसा : न स्कूल था न पैसे, फिर भी अपने बलबूते पर किसान की बेटी ने की सिविल सर्विस की परीक्षा पास!

“मैंने बस अनुभव के लिए इस बार परीक्षा दी थी। मुझे नहीं लगा था कि मैं इसे पास कर लुंगी, क्योंकि न तो मैंने इसके लिए कोई कोचिंग ली थी और न ही खुद ढंग से तैयारी कर पाई थी। पर इस उपलब्धि ने मेरी ज़िन्दगी में कई बदलाव ला दिए। जिन लोगों को पहले मेरा पढ़ना-लिखना व्यर्थ लगता था, आज उनकी भी उम्मीदें मुझसे बंध गयी हैं,” यह कहना है उड़ीसा सिविल सर्विस परीक्षा 2018 में 91वीं रैंक प्राप्त करने वाली संध्या समरत का।

रावेनशॉ यूनिवर्सिटी, कटक से भूगोल में पीएचडी कर रहीं संध्या समरत, उड़ीसा के मलकानगिरी जिले के एक छोटे से गाँव सालिमी से हैं। मलकानगिरी के इस आदिवासी गाँव से राज्य की प्रशासनिक सेवा में शामिल होने तक का संध्या का सफर बिल्कुल भी आसान नहीं था। पर संध्या ने कभी भी हार नहीं मानी बल्कि आगे बढ़ने के लिए उन्होंने शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।

मलकानगिरी में संध्या के गाँव की सीमा छत्तीसगढ़ के बस्तर को छूती है। एक दूरगामी आदिवासी इलाका और नक्सल प्रभावित क्षेत्र होने के कारण विकास की कोई भी योजना बहुत मुश्किल से गाँव तक पहुंचती है।

इस गाँव में न तो कोई अच्छा स्कूल है और न ही कॉलेज, जहाँ बच्चे आगे की पढ़ाई कर सकें।

संध्या समरत

गाँव के लोग भी ज्यादातर कृषि पर निर्भर हैं, इसलिए बहुत बार बच्चों की पढ़ाई का खर्च उठाना उनके लिए मुमकिन नहीं हो पाता है।

द बेटर इंडिया से बात करते हुए संध्या ने बताया, “मेरा पूरा परिवार खेती से जुड़ा हुआ है। मुझे बचपन में कभी भी नहीं लगा था, कि मैं इतना आगे तक आ पाऊँगी। मेरे परिवार और शायद मेरे गाँव से भी मैं पहली लड़की हूँ, जो आज ऐसे बाहर पढ़-लिख रही है।”

आज संध्या अपने गाँव में ही नहीं बल्कि पूरे देश की लड़कियों के लिए प्रेरणास्त्रोत हैं। पर एक वक़्त था जब उन्हें अपनी आगे की पढ़ाई के लिए हर कदम पर संघर्ष करना पड़ा।

“गाँव में बस एक सरकारी प्राथमिक स्कूल था और वहाँ भी कोई ख़ास सुविधा नहीं थी। क्योंकि इतने पिछड़े गांवों में टीचर भी आना पसंद नहीं करते हैं। पर मुझे हमेशा से पढ़ना था, इसलिए मैंने हर मुमकिन कोशिश कर, अपनी पढ़ाई जारी रखी।”

पाँचवी कक्षा तक जैसे-तैसे गाँव के स्कूल से पढ़ने के बाद संध्या ने जवाहर नवोदय स्कूल की परीक्षा पास कर स्कॉलरशिप हासिल की। इसके बाद उन्होंने अपनी 12वीं तक की पढ़ाई मलकानगिरी में जवाहर नवोदय स्कूल से की। स्कूल के दौरान वे हमेशा अपनी क्लास में टोपर रहीं और साथ ही अन्य गतिविधियों में भी बढ़-चढ़ कर हिस्सा लेतीं।

एक बार एक डिबेट कम्पटीशन जीतने पर उन्हें मुख्यमंत्री द्वारा सम्मानित किया गया था, जिसके बाद पूरे जिले में लोगों को संध्या के बारे में पता चला।

वाद-विवाद प्रतियोगिता में मुख्यमंत्री ने किया था संध्या को सम्मानित (फोटो साभार: संध्या समरत)

उनकी इसी उपलब्धि ने उनके लिए आगे की राह बनाई। संध्या कहती हैं, “बारहवीं कक्षा तक तो स्कॉलरशिप पर पढ़ाई हो गयी। लेकिन आगे की पढ़ाई को लेकर मैं बहुत चिंता में थी क्योंकि उसके लिए भुवनेश्वर जाकर पढ़ना था। पहले तो लगा ही नहीं कि घरवाले मानेंगे और अगर मान भी गये, तो आगे की पढ़ाई का खर्चा कैसे आएगा,” संध्या ने बताया।

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शुरू में उनके परिवार के मन में डर था, क्योंकि गाँव से कोई लड़की इस तरह बाहर नहीं गयी थी। लेकिन संध्या के परिवार को उन पर यकीन भी था कि जब संध्या अपनी मेहनत के दम पर यहाँ तक पहुंची है, तो आगे भी जाएँगी। उनके परिवार ने उनसे कहा कि तुम्हें अपना रास्ता खुद तय करना है और अगर तुम्हें लगता है कि तुम भुवनेश्वर जैसे शहर में  जाकर पढ़ सकती हो, तो ठीक है। यह सुन कर संध्या के सपनों को तो जैसे पर मिल गये थे।

संध्या के लिए एक छोटे से गाँव से निकलकर भुवनेश्वर जाकर रहना आसान नहीं था। वहाँ कॉलेज में उन्हें एडमिशन तो मिल गया, लेकिन कॉलेज का हॉस्टल न होने के कारण उन्हें काफ़ी दिक्कतें झेलनी पड़ीं। ऐसे में जिला प्रशासन ने उनकी मदद की, क्योंकि संध्या का रिकॉर्ड उनके स्कूल में काफ़ी अच्छा था।

संध्या के माता-पिता (फोटो साभार: संध्या समरत)

संध्या कहती हैं, “एक साथ इतनी परेशानियां खड़ी हो जाती थीं, कि मैं बहुत टूट जाती थी। लगता था कि अब आगे नहीं हो पायेगा। पर मैं यह भी जानती थी कि हार मानना मेरे लिए कोई विकल्प नहीं है। मैं बचपन से ही बहुत आशावादी रही। मैं हमेशा सकारात्मक ही सोचती, कि सब कुछ ठीक हो जायेगा।”

संध्या हमेशा अपने कॉलेज में अव्वल आतीं और इसीलिए उन्हें कॉलेज से व सरकार से भी स्कॉलरशिप मिलती रहीं, जिससे उनकी पढ़ाई का खर्च निकलता। अपनी मास्टर्स डिग्री के दौरान ही उन्होंने यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन के अंतर्गत राष्ट्रीय योग्यता परीक्षा (NET) और जूनियर रिसर्च फ़ेलोशिप (JRF) की परीक्षा पास की।

उनके परिवार का साथ भी उन्हें हर कदम पर मिला। आज उनके भाई-बहन भी अच्छी जगह पर पढ़ रहे हैं। हालाँकि, गाँव में हालात अभी भी नहीं बदले थे। बहुत बार गाँव के लोग उनके माता-पिता को कहते कि अपनी बेटी को इतना पढ़ा-लिखा कर उन्हें कुछ नहीं मिलेगा, क्योंकि बेटियाँ तो पराया धन होती हैं। पर संध्या के पिता को अपनी बेटी की मेहनत और लगन पर पूरा भरोसा था और संध्या हर कदम पर उनके भरोसे पर खरी उतरी।

सिविल सर्विस के बारे में पूछने पर संध्या ने बताया, “जैसे-जैसे मैं आगे बढ़ी और बाहर निकली, तो मैंने समझा कि अगर मुझे अपने गाँव और अपने लोगों के लिए कुछ करना है, तो प्रशासन में रहकर ही कर सकती हूँ। आज भी हमारे गाँव में मूलभूत सुविधाओं के लिए लोगों को संघर्ष करना पड़ता है। बिजली, साफ़ पानी, पक्की सड़कें, बच्चों के लिए अच्छी शिक्षा, इन सब ज़रूरी मुद्दों पर कभी काम नहीं हुआ। इसलिए मैंने अपनी पढ़ाई के साथ सिविल सर्विस की परीक्षा देने का निर्णय किया।”

उनके यह परीक्षा पास करने के बाद उनके जिले और ख़ासकर, उनके गाँव के लोगों में एक उम्मीद जगी है। संध्या कहती हैं, कि अब उनके गाँववालों को विश्वास है कि उनका कोई अपना प्रशासन में होगा तो उनकी सुध लेगा। परीक्षा का परिणाम आने के बाद जब वे गाँव गयी, तो उनके परिवार के साथ अन्य गाँववालों ने भी उनका जोरदार स्वागत किया।

सालिमी गाँव के बारे में शायद ही किसी ने सुना हो, पर अपनी कड़ी मेहनत और मजबूत इरादों के दम पर आज संध्या समरत ने इस गाँव को एक पहचान दे दी है। कुछ वक़्त में संध्या की बाकी सभी चुने गये प्रतिभागियों के साथ ट्रेनिंग शुरू हो जाएगी और ट्रेनिंग के बाद उन्हें पोस्टिंग मिलेगी। पर संध्या चाहती हैं कि उन्हें मलकानगिरी में ही कहीं पोस्टिंग मिले ताकि वे इस जिले के विकास के लिए काम कर सकें।

(संपादन – मानबी कटोच)


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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