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फीयरलेस नादिया: 40 के दशक में बॉलीवुड पर राज करने वाली ‘हंटरवाली’ स्टंट क्वीन!

फीयरलेस नादिया (8 जनवरी 1908- 9 जनवरी 1996)

तीस का दशक सारे विश्व में युद्ध की तबाही लेकर आया था। लोग भय, पराधीनता और जंग के बीच शारीरिक से ज्यादा मानसिक प्रताड़नाओं से जूझ रहे थे। ऐसे में ‘सिनेमा’ ने लोगों को काल्पनिक नायक और रक्षक, ख़ासकर सुपर हीरो दिए। असल ज़िन्दगी की मुश्किलों और परेशानियों से दूर ये एक ऐसी दुनिया थी, जहाँ उन्हें कुछ पल का सुकून मिल जाता था।  यहाँ के सुपर हीरो उन्हें कल्पना में ही सही पर हर मुश्किल से बचाते थे।

उसी दौर में जन्में सुपरमैन (1938 में डेब्यू), बैटमैन (1939 में डेब्यू) और वंडर वुमन (1941 में डेब्यू) जैसे सुपर हीरो हमारी दुनिया में ऐसे रच-बस गए कि आज भी वे हमारे साथ हैं।

उसी समय, भारत में भी सिनेमा के पर्दे पर एक लड़की को उतारा गया, जो कभी एक राजकुमारी बनी,तो कभी एक नकाबपोश नायिका, जो बिना डरे खुद तलवार और बन्दुक चलाती, और दुश्मनों से लड़ते हुए उन्हें पछाड़ देती।

यह साल था 1935 और वह लड़की थी, भारत की स्टंट क्वीन, फीयरलेस नादिया!

फीयरलेस नादिया

गोरी-चिट्टी, नीली आँखों वाली एक लड़की, जिसने अपनी पहली फ़िल्म में ही दर्शकों का दिल जीत लिया और फिर 40 के दशक में बॉलीवुड पर राज किया। अक्सर नादिया को सिनेमा के इतिहासकारों ने नज़रअंदाज किया है, क्योंकि वह स्टंट और एक्शन वाले किरदार निभाती थी। बहुत ही कम लोग इस दमदार नायिका के बारे में जानते होंगे।

8 जनवरी, 1908 को मैरी एन इवांस के रूप में नादिया का जन्म ऑस्ट्रेलिया के पर्थ में हुआ। उनके पिता स्कॉटिश थे और माँ ग्रीक। मैरी बहुत छोटी थीं, जब वे भारत आयी। उनके पिता, हर्बर्ट इवांस ब्रिटिश सेना के स्वयंसेवक थे और इसलिए मैरी का बचपन भारत में बीता।

बहुत कम उम्र से ही मैरी ने ठान लिया था कि वह एक अच्छी गायिका और डांसर बनेंगी। उन्होंने अपने पिता से स्कॉटिश डांस सीखा तो माँ से ग्रीक गाने। बचपन में मैरी बाकी बच्चों के साथ चर्च में प्रार्थना गीत भी गातीं थी। फिर भी उसमें कुछ ऐसा था, जो सबसे अलग था।

नादिया एक प्रोफेशनल डांसर थीं

बचपन में जब बाकी बच्चे खिलौने से खेलते तब मैरी ने अपना ज्यादातर समय एक छोटे घोड़े के साथ खेलकर बिताया जो बाद में उनका सबसे अच्छा दोस्त बन गया था। उन्होंने मछली पकड़ना, शिकार करना, और घुड़सवारी आदि करना भी सीखा। उस समय लड़कियों के लिए ऐसा करना बहुत बड़ी बात समझी जाती थी।

प्रथम विश्व-युद्ध के दौरान जब मैरी के पिता की मृत्यु हो गयी, तो वह अपनी माँ के साथ बॉम्बे (अब मुंबई) जाकर बस गयी। यहाँ, उन्होंने मैडम एस्ट्रोवा (एक रुसी डांसर) द्वारा संचालित एक बैले डांस स्कूल में दाखिला लिया। मैडम एस्ट्रोवा ने कहीं न कहीं मैरी की प्रतिभा को पहचान लिया था और इसलिए उन्होंने उसे अपनी यात्रा मंडली का हिस्सा बनाया।

इस मंडली के साथ मैरी ने बहुत-सी जगह यात्राएं की और इसी दौरान उनकी मुलाकात एक अमेरिकी ज्योतिषी से हुई। इस ज्योतिषी ने उन्हें सुझाव दिया कि मैरी को अपना नाम बदलकर ‘न’ अक्षर से रखना चाहिए। और ऐसे, मैरी एन इवांस बन गयी ‘नादिया’!

नादिया का मूल नाम मैरी एन इवांस था

यात्रा मंडली के साथ डांस के अलावा, नादिया ने कई अन्य नौकरियों में भी अपना हाथ आजमाया। सचिवालय की नौकरी से लेकर एक थिएटर आर्टिस्ट और सर्कस में एक ट्रेपेज़ कलाकार के तौर पर काम करने तक, सभी कुछ नादिया ने किया। नादिया ने खुद को एक बेहतर जिमनास्ट के तौर पर भी तैयार किया। लोग उनके साहसी कारनामे और स्टंट देखकर हैरान हो जाते थे।

पर अपने डांस के शौक को पूरा करने के लिए, नादिया ने ज़र्को सर्कस की नौकरी छोड़ दी और खुद को पूरी तरह से डांस के लिए समर्पित कर दिया। इस बार वे बॉलीवुड के गानों में डांस करने वाली थीं। लाहौर के एक सिनेमा मालिक इरुच कंगा ने जब उनकी परफॉरमेंस देखी तो वे तुरंत उससे प्रभावित हो गये। कंगा ने ही नादिया की मुलाकात ‘वाडिया मूवीटोन’ प्रोडक्शन हाउस के मालिक जे. बी. एच वाडिया और होमी वाडिया से करवाई।

नादिया की खुबसूरती और निडर स्वाभाव से प्रभावित होकर वाडिया ने उन्हें एक मौका देने का फैसला किया। इसके लिए शर्त थी कि नादिया को हिंदी बोलना सीखना होगा। वाडिया प्रोडक्शन हाउस की दो फ़िल्मों, देश दीपक और नूर-ए-यमन में नादिया को छोटी भूमिकाओं के लिए कास्ट किया गया। देश दीपक में नादिया ने एक गुलाम का किरदार निभाया तो नूर-ए-यमन में एक राजकुमारी का। दोनों ही फ़िल्मों में नादिया का किरदार दर्शकों के दिल में घर कर गया।

इसके बाद वाडिया प्रोडक्शन हाउस को नादिया की काबिलियत पर भरोसा हो गया और नादिया के करियर ने सबसे महत्वपूर्ण मोड़ लिया। वाडिया प्रोडक्शन हाउस ने नादिया को ‘हंटरवाली’ फिल्म में मुख्य नायिका के तौर पर बड़े परदे पर उतारने का फैसला किया।

फिल्म ‘हंटरवाली’ का एक पोस्टर

फिल्म में नादिया की निडर भूमिका और उनके स्टंट, दर्शकों के बीच हिट रहे। लोगों ने नादिया को शोहरत के साथ-साथ बेइंतिहा मोहब्बत भी दी। इसकी शायद एक और वजह यह भी थी कि नादिया यूरोपियन होने के बावजूद सही और गलत के बीच में सही के लिए लड़ रही थीं। यह वह समय था जब सभी के दिलोंदिमाग में भारत को आज़ादी दिलाने की धुन सवार थीं। ऐसे में कहीं न कहीं नादिया की भूमिका उनकी भावनाओं के साथ सटीक बैठ रही थी।

अगले एक दशक में, नादिया ने लगभग 50 फ़िल्मों में मुख्य भूमिका निभाई और सभी में उन्होंने खुद ही सारे स्टंट किये। झूमर से झूलने, पहाड़ों से कूदने से लेकर चलती ट्रेन पर लड़ना और शेर-चीतों से दोस्ती, यह सब नादिया ने बहुत ही आसानी किया। जबकि उस समय पुरुष कलाकार भी इस तरह के स्टंट नहीं कर पाते थे।

फोटो साभार

अपने काम के दौरान उन्होंने कई बार अपनी जान जोखिम में डाली। एक बार, एक फाइट सीन की शूटिंग के दौरान, वह काफ़ी ऊंचाई से अपने चेहरे के बल गिरीं, तो एक बार पानी के तेज बहाव में बह जाने से मुश्किल से बचीं। अपने हर एक किरदार में नादिया ने सच और न्याय की लड़ाई लड़ी और साथ ही उनके खतरनाक स्टंट और विदेशी कॉस्टयूम ने भारतीय दर्शकों को प्रभावित किया।

उस समय नादिया को इतना स्टारडम मिला कि वे एक वक़्त पर हिंदी फ़िल्मों की सबसे महंगी हीरोइन थीं। वे इतनी मशहूर थीं, कि उस समय के बेल्ट, बैग, जूते और कपड़े के कई ब्रांड के साथ उनके उपनाम ‘हंटरवाली’ का इस्तेमाल किया जाता।

उस समय भारतीय महिला धीरे-धीरे एक्टिंग को एक पेशे के रूप में अपना रहीं थीं और ऐसे में नादिया उनके लिए एक प्रेरणा के तौर पर उभरीं। उन्होंने पुरुषवादी समाज को अपने शब्दों में चुनौती दी,

“इस गलतफ़हमी में बिल्कुल मत रहना कि तुम आज की औरत के ऊपर राज कर सकते हो। यदि इस राष्ट्र को स्वतंत्रता चाहिए तो सबसे पहले यहाँ की औरतों को आज़ादी देनी होगी।”

फिल्म ‘जंगल प्रिंसेस’ का पोस्टर

एक शूटिंग के दौरान नादिया एक स्टूडियो सेट की छत से कूद गई थीं और इसके बाद होमी वाडिया ने उन्हें ‘फीयरलेस नादिया’ नाम दिया। साल 1961 में नादिया ने होमी वाडिया से शादी की।

साल 1968 में, 60 वर्ष की उम्र में नादिया ने होमी वाडिया की फिल्म ‘खिलाड़ी’ में एक जासूस की भूमिका निभाई। लेकिन जैसे-जैसे वक़्त बीता, इस दमदार नायिका की विरासत कहीं धुंधली पड़ गयी। साल 1993 में ‘फीयरलेस: द हंटरवाली स्टोरी’ डॉक्युमेंट्री के जरिये एक बार फिर हंटरवाली पर्दे पर दिखी।

‘खिलाड़ी’ फिल्म में नादिया ने एक जासूस की भूमिका निभाई थी

जे. बी. एच वाडिया के पोते और रॉय वाडिया के भाई, रियाद ने इस डॉक्युमेंट्री को बनाया है और इसे कई अंतर्राष्ट्रीय फ़िल्म उत्सवों में दिखाया गया, जिससे भारत के साथ-साथ उनके जन्म-स्थान ऑस्ट्रेलिया में भी लोगों को उनके बारे में पता चला।

आज एक तरफ नादिया की विरासत को भारतीय फिल्म इंडस्ट्री में शायद ही याद किया जाता है, तो दूसरी तरफ उनके काम को कई देशों के सिनेमा विशेषज्ञों द्वारा फ़िल्म-स्टडीज़ के छात्रों को पढ़ाया जाता है। इन संस्थानों में ब्रिटेन का स्कूल ऑफ ओरिएंटल और अफ्रीकन स्टडीज़ भी शामिल है।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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