पुणे: इस आइएएस अफ़सर की पहल से आज अपने शौचालय से लाखों में कमा रहे हैं गाँववाले!

महाराष्ट्र के पुणे की खेड़ तालुका के गांवों में खुले में शौच की समस्या थी, क्योंकि बहुत से लोग सरकार के बनाये हुए शौचालयों का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे। इस समस्या को हल करने के लिए यहाँ के आइएएस ऑफिसर आयुष प्रसाद ने एक पहल शुरू की। आज उनके प्रोजेक्ट के जरिये गांववाले अच्छी आमदनी कमा रहे हैं।

हाराष्ट्र के पुणे की खेड़ तालुका के गांवों में खुले में शौच की समस्या थी, क्योंकि बहुत से लोग सरकार के बनाये हुए शौचालयों का इस्तेमाल नहीं कर रहे थे। बाकी जो लोग शौचालयों का इस्तेमाल कर रहे थे उन्हें उसके पिट (गड्ढे) के भरने के बाद बहुत दिक्कत होती। क्योंकि उसे खाली करने वाला कोई नहीं था।

इसके बाद गड्ढों में इकट्ठी हुई यह गुणवत्ता वाली मिट्टी भी बेकार हो जाती। क्योंकि मानव मल को उर्वरक के रूप में भी इस्तेमाल किया जा सकता है।

ऐसे में इन तीनों समस्याओं को हल करने के लिए आइएएस ऑफिसर आयुष प्रसाद ने एक पहल की। उन्होंने गांववालों को इस नाईट-सॉइल (मानव मल) का इस्तेमाल कर कुछ पैसे कमाने के तरीके सिखाये। दरअसल, इन गाँवों में लोगों को खुले में शौच जाने से रोकने से भी ज्यादा मुश्किल काम था इन गड्ढों को खाली करवाना।

हम सबके दिमाग में मानव मल को हाथों से छूने को लेकर एक धारणा बनी हुई है। इसलिए सबसे पहले आइएएस प्रसाद ने इस नाईट-सोइल की गुणवत्ता चेक करायी और जब यह बात सिद्ध हो गयी कि इस मिट्टी की उर्वरक क्षमता रासायनिक उर्वरकों से कहीं ज्यादा है तो उन्होंने गांववालों को इसका महत्व समझाने के लिए प्रोजेक्ट शुरू किया।

आइएएस प्रसाद ने इस काम में दुसरे आइएएस ऑफिसर इंदिरा असवर और सोनाली अव्चत की मदद ली। असवर ब्लॉक विकास अधिकारी हैं, और महाराष्ट्र राज्य ग्रामीण जीवन मिशन (एमएसआरएलएम) की हेड हैं और अव्चत एमएसआरएलएम की ब्लॉक कोर्डिनेटर हैं।

अव्चत ने बताया कि गाँव में महिलाएं रोजगार के लिए उत्साहित थीं पर मानव मल को हाथ से छूने को लेकर उनके दिमाग में एक घृणित अहसास बना हुआ था। ऐसे में हम उन्हें कुछ टॉयलेट पिट्स के पास लेकर गये, जो काफी दिनों से इस्तेमाल में नहीं था। यहाँ जब गड्ढे का ढक्कन हटाया तो देखा कि कोई मल नही है बल्कि वही मल एक चायपत्ती जैसे पदार्थ में तब्दील हो गया है।

गांववालों का हौंसला बढ़ाने के लिए इन अफसरों ने खुद ये गड्ढे उन्हें खाली करके दिखाए। प्रोजेक्ट के शुरू में लोगों ने विरोध किया। साफ-सफाई को लेकर काफी मुद्दे थे। पर समय-समय पर सरकारी कर्मचारियों ने आकर लोगों को समझाया।

पर धीरे-धीरे लोग जागरूक हुए और वे सभी अपने-अपने यहाँ टॉयलेट पिट साफ़ करने लगे ,ऐसे में आइएएस प्रसाद ने महिंद्रा-महिंद्रा कॉर्पोरेट से बात करके इन गांववालों से इस जैविक उर्वरक को खरीदने का प्रस्ताव भी पास करवा दिया।

हर एक गड्ढे से लगभग 80 किलोग्राम खाद इकट्ठी होती है। इसे 20 रूपये प्रति किलोग्राम के मूल्य से बेचा जाता है। अब गांववालों की इस प्रोजेक्ट से एक बेहतर आमदनी हो रही है।

मूल लेख: तन्वी पटेल


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ बांटना चाहते हो तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखे, या Facebook और Twitter पर संपर्क करे। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर भेज सकते हैं।

We at The Better India want to showcase everything that is working in this country. By using the power of constructive journalism, we want to change India – one story at a time. If you read us, like us and want this positive movement to grow, then do consider supporting us via the following buttons.

Please read these FAQs before contributing.

X