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भारत की ऐतिहासिक विरासत को संभाल, बाँस व मिट्टी से मॉडर्न घर बनाता है यह आर्किटेक्ट

“आज हम अपनी आधी से अधिक ऐतिहासिक विरासतों को खो चुके हैं और एक आर्किटेक्ट होने के नाते, इसे पुर्नजीवित करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।“- अजीत अंदागेरे

किसी भी देश में ऐतिहासिक विरासतों के संरक्षण के लिए वास्तुकला की उपयोगिता उल्लेखनीय है। इसी विचार के साथ बेंगलुरू से 45 किमी दूर एक छोटे से गाँव, गोल्लापालय में रहने वाले आर्किटेक्ट अजीत अंदागेरे आगे बढ़े हैं। उनकी संरचनाओं में आधुनिक और परम्परागत स्थापत्य कलाओं का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।

कर्नाटक के हासन स्थित एक कॉलेज से आर्टिटेक्चर में इंजीनियरिंग करने वाले अजीत पिछले 18 वर्षों से आर्किटेक्चर से जुड़े हुए हैं। उन्होंने देश के अलग-अलग हिस्सों में भवन निर्माण के क्षेत्र में एक से बढ़कर प्रयोग किए हैं।

architect uses local resources
अजीत अंदागेरे

द बेटर इंडिया से खास बातचीत में अजीत कहते हैं, “मैं अपने काम में परंपरागत शैली को शामिल करता हूँ, जिसमें पर्यावरण और स्थानीय वास्तुकला का विशेष ध्यान रखा जाता है। दरअसल  भारत के हर राज्य में कई वास्तुकला शैलियाँ हैं, लेकिन आप ध्यान देंगे तो पता चलेगा कि हर जगह एक ही पैटर्न पर घर बन रहा है। वास्तविकता यह है कि हम अपनी आधी से अधिक ऐतिहासिक विरासतों को खो चुके हैं और एक आर्किटेक्ट होने के नाते, इसे पुर्नजीवित करना हमारी नैतिक जिम्मेदारी है।”

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आर्किटेक्ट बनने के पीछे क्या थी प्रेरणा

अजीत का हमेशा से ही मानना था कि रोटी, कपड़ा और मकान हर इंसान के लिए जरूरी है, इसके बिना हमारा कोई अस्तित्व नहीं है और उनके पिताजी ने भी उन्हें इसी में से किसी एक में अपना भविष्य बनाने का सुझाव दिया। इसीलिए उन्होंने वास्तुकला को चुना।

इस कड़ी में वह कहते हैं, “कॉलेज के 5 वर्षों के दौरान, मैंने सीखा कि वास्तुकला क्या है। वहाँ से बाहर निकलने के बाद, प्रोजेक्ट के दौरान कई गाँवों को घूमने के बाद अहसास हुआ कि संरचनाओं को किस विचार के साथ बनाना है। पहले ग्रामीण क्षेत्रों में लोग बिना किसी पढ़ाई के स्थानीय संसाधनों से काफी सुंदर घर बनाते थे और इसी से प्रेरित होकर मैंने अपने काम में मिट्टी, बांस, लकड़ी, पत्थर जैसे स्थानीय संसाधनों को शामिल किया।“

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शुरू की खुद की कंपनी

अजीत की कंपनी द्किवारा बनाया गया रबेल बीच हाउस, कुमटा (कर्नाटक)

शुरुआती दिनों में अजीत का ऑफिस साइट पर ही होता था और वह एक एक वन मैन आर्मी की तरह काम करते थे। यानी पूरे प्रोजेक्ट की देख-भाल वह अकेले करते थे। बाद में, काम बढ़ने पर उन्होंने साल 2002 में अंदागेरे आर्किटेक्ट्स  नाम की कंपनी शुरू की और बेंगलुरू, हम्पी जैसे सात अलग-अलग स्थानों पर ऑफिस चलाने के बाद अब वह गोल्लापालय गाँव में बस गए हैं, ताकि प्रकृति के नजदीक रह सकें। फिलहाल, उनकी कंपनी में 15 लोग काम करते हैं और इसके तहत उन्होंने कई फ्लैगशिप प्रोजेक्ट किए, जैसे- प्रोजेक्ट स्वर्ग, प्रोजेक्ट जलकारा, बंगलौर स्थित विज्ञान संग्रहालय, आदि।

क्या है प्रोजेक्ट स्वर्ग

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बेंगलुरू के एक ग्रेनाइट खदान के मालिक शिव प्रकाश ने साल 2017 में, अजीत से मुख्य शहर से लगभग 70 किमी दूर दोबस्पेट में एक फार्म हाउस बनाने की इच्छा जताई थी।

बेंगलुरु से 70 किमी दूर दोबस्पेट में बना प्रोजेक्ट स्वर्ग

इसके बारे में अजीत कहते हैं, “इस क्षेत्र में काफी गर्मी पड़ती है। शिवप्रकाश को ऐसा घर चाहिए था, जो स्थानीय शैली का हो। इसके लिए मैंने उनके खेत में एक चेक डेम बनाया और मिट्टी की ईंटें बनाकर उसे पूर्णतः धूप में सुखाया। इन ईंटों से घर की दीवारें बनाई गईं। हमने आधार बनाने के लिए खदान के पत्थर, फर्श के लिए कडप्पा पत्थर और लेपन के लिए बालू और चूने का इस्तेमाल किया। छत का निर्माण नारियल के पेड़ों और हाथ से बनाए गए टाइलों से किया गया। घरेलू चीजों को नीलगिरी के पेड़ों से बनाने के साथ ही लैंडस्केपिंग के तहत कई प्रकार के पेड़-पौधे लगाए गए।”

फलस्वरूप, यह घर अपेक्षाकृत 4-5 डिग्री ठंडा रहता है और यहाँ एसी चलाने की जरूरत नहीं पड़ती है। खास बात यह है कि 3,500 वर्ग फुट में बने इस घर के हर कमरे से एक अलग परिदृश्य देखने के लिए मिलते हैं। इन्हीं कारणों से शिव ने जिस घर को कभी-कभी रहने के लिए बनवाया था, अब वह वहाँ हफ्ते में 5-6 दिन रहते हैं।

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प्रोजेक्ट जलकारा, अंडमान

अजीत ने अंडमान स्थित प्रोजेक्ट जलकारा के तहत साल 2015 में एक बुटीक रिसोर्ट बनाया था। इस प्रोजेक्ट में एक ब्रिटिश नागरिक ने निवेश किया था और उनकी इच्छा थी कि इसकी संरचना में समकालीन भारतीय वास्तुकला की झलक हो और इसे वैश्विक स्तर पर एक पहचान मिले।

अजीत ने अंडमान स्थित जलकारा बुटीक रिसोर्ट को 2015 में बनाया था।

इसके बारे में अजीत कहते हैं, “अंडमान में बीच के किनारे सौ से अधिक रिजॉर्ट बने हुए हैं और हमारा विचार कुछ अलग करने का था। इसलिए हमने जंगल के पास एक एकड़ जमीन ली। इसमें 7 कमरे हैं और हर एक की अलग-अलग विशेषताएं हैं।”

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वह आगे बताते हैं, “प्रोजेक्ट जलकारा में बांस की चटाई और लकड़ी का उपयोग किया है। यहाँ काफी बारिश होती है और निर्माण स्थल ऊंचाई होने की वजह से काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ा। लेकिन, हमारी मेहनत रंग लाई और 2 साल पहले इसे सात सबसे बेहतरीन होटलों में एक चुना गया।”

आदिवासियों को सिखा रहे घर बनाना

अजीत ने देश के स्थानीय वास्तुकला के अध्ययन के लिए संरक्षण इंडिया नाम के एक गैर सरकारी संगठन की भी नींव रखी है। इसी के तहत वह फिलहाल तमिलनाडु के गुदालुर के जंगलों में रहने वाले आदिवासियों के लिए घर बना रहे हैं।

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अजीत ने तमिलनाडु के आदिवासियों को मिट्टी और बांस से सिखाया घर बनाना।

इसके बारे में अजीत कहते हैं, “सुविधाविहीन लोगों के लिए एक छत बनाना मेरी एक नैतिक जिम्मेदारी है और इससे मुझे खुशी मिलती है। हमने आदिवासियों को मिट्टी से ईंट बनाना सिखाया और एक बांस ट्रीटमेंट प्लांट की भी स्थापना की। आज वे मिट्टी के ईंट और बाँस से अपना घर खुद ही बना रहे हैं। जिसे सीमेंट से बनाने में आमतौर पर 3-4 लाख रुपए खर्च होते हैं।”

विज्ञान संग्रहालय, बेंगलुरू

बेंगलुरू से 50 किमी दूर गौरीबिदानूर में स्थित विज्ञान संग्रहालय को भी अजीत ने ही तैयार किया है। अगस्त, 2019 में बने इस योजना में परंपरागत और आधुनिक, दोनों शैलियों को अपनाया गया है।

गौरीबिदानुर में मिट्टी से बना एचएन विज्ञान संग्रहालय।

इसके बारे में वह कहते हैं, “हमारे देश में सभी सरकारी भवनों के निर्माण सामान्यतः एक जैसा होता है। इसलिए हमने 16 हजार वर्ग फीट में बने इस म्यूजियम को कुछ अलग बनाने का विचार किया। यह काफी सूखा क्षेत्र है और यहाँ औसतन 45 डिग्री गर्मी पड़ती है। इसी के मद्देनजर हमने इसकी बाहरी दीवार को मिट्टी से  से बनाया। इस तकनीक का इस्तेमाल भूटान, मैक्सिको और अफ्रीकी देशों के अलावा भारत के कई हिस्से में भी किया जाता है। यह तकनीक इतना आसान है कि इसकी दीवारों को बनाने के लिए किसी कुशल राजमिस्त्री की जरूरत नहीं होती है।”

परंपरागत कारीगरों को दे रहे रोजगार

परम्परागत संसाधनों का उपयोग कर लोगों को घर बनाना सीखाते अजीत

अजीत कहते हैं कि आज के दौर में सिर्फ प्लायवुड और एलुमिनियम पर काम करने वाले कारीगर मिल रहे हैं और यह चिंताजनक है। इसी मकसद से उन्होंने कइकलई  फर्नीचर कंपनी की शुरुआत की, जिसके तहत कुम्हार, लोहार, बढ़ई आदि जैसे कारीगर परंपरागत शैली के आधुनिक फर्नीचर बनाते हैं।

क्या है भविष्य की योजना

अपनी भविष्य की योजनाओं को लेकर अजीत कहते हैं, “आने वाले 20-30 वर्षों में, निर्माण क्षेत्र में काफी गति आएगी और मैं सिर्फ ऐसी योजनाओं पर काम करता हूँ, जो चुनौतीपूर्ण हो और कुछ सीखने के लिए मिले। ऐसे प्रोजेक्ट के लिए मैं दुनिया के किसी भी हिस्से में जा सकता हूँ।“

वह आगे बताते हैं, “आने वाले वर्षों में, मेरी इच्छा एक ट्रेनिंग सेंटर खोलने की है। जहाँ छात्रों को वास्तुकला के विषय में हर चीज सिखाई जाएगी। इसके अलावा, हम जल्द ही एक पोर्टल लॉन्च करने वाले हैं, जहाँ हर किसी को वास्तुकला के बारे में निःशुल्क जानकारी मिलेगी।”

अंत में, अजीत कहते हैं कि आधुनिक सूचना तकनीक की वजह से हमें यह पता है कि दुनिया के किस कोने में क्या हो रहा है, लेकिन देश में क्या हो रहा है इसकी चिंता नहीं है। ऐसी स्थिति में हमें, इस तकनीक का उपयोग स्थानीय वास्तुकला को पुर्नजीवित करने के लिए करना होगा, अन्यथा हमारी हजारों वर्षों की विरासत नष्ट हो जाएगी।

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