मैं कलेक्टर बनना चाहता हूँ; इस छात्र को छोड़ना पड़ सकता है स्कूल

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सरकारी स्कूल के छात्र राकेश, जो एक सिविल सेवक बनने का सपना देखते हैं, एक कठोर वास्तविकता का सामना कर रहे हैं। उन्हें और उनके जैसे अन्य लोगों को स्कूल में बने रहने के लिए आपकी सहायता की जरूरत है।

“मैं बड़ा होकर कलेक्टर बनना चाहता हूँ और अपने जैसे लोगों की मदद करना चाहता हूँ। मैं उन लोगों के लिए कुछ करना चाहता हूँ, जो आज भी रोटी, कपड़ा, मकान जैसी बुनियादी जरूरतों से कोसों दूर हैं। ऐसे लोग, जिनका अधिकार है स्वास्थ्य व शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाएं, लेकिन उन्हें मिलता कुछ नहीं। मैं ऐसे लोगों को उनका अधिकार दिलाना चाहता हूँ। मैं अपने दादा-दादी की देखभाल करना चाहता हूँ और चाहता हूँ कि उन्हें मुझ पर गर्व हो।”

ये सपने हैं, 14 वर्षीय राकेश के। पर वह, फिलहाल अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने और अपने लक्ष्य को पाने में कई मुश्किलों का सामना कर रहा है।

छोटी उम्र, बड़े सपने

राकेश ने एक साल की उम्र में अपने पिता को खो दिया था। उन्होंने द बेटर इंडिया को बताया, “पिता की मृत्यु के बाद, मेरी माँ की सारी आशाएं टूट गईं और मुझसे मेरी माँ का साथ। मैं तब से अपने दादा-दादी के साथ ही रहता हूँ।”
मेहनती और भावनात्मक तौर पर मजबूत होने के कारण, राकेश उस दौर से बाहर निकल पाए। उनके दिन की शुरुआत कपड़े धोने और पानी भरने जैसे घर के कामों से होती थी। इन सबके बीच, वह इंतजार करते रहते थे कि किसी तरह थोड़ा समय मिले और वह स्कूल जाएं।

राकेश बेंगलुरु के एक सरकारी स्कूल में पढ़ते हैं। अक्सर उन्हें अपने विषयों के बेसिक्स याद रखने में काफी मुश्किल होती थी। लेकिन ये परेशानियां, उनके हौसले को कम नहीं कर पाईं। उन्होंने हर बार कड़ी मेहनत करके, खुद को बेहतर बनाने का प्रयास किया है।

महामारी ने फेर दिया उम्मीदों पर पानी

राकेश के दादा दिहाड़ी मज़दूरी का काम करते हैं। एक दिन, राकेश ने अपनी दादी को भी स्कूल में छोटे-मोटे काम करते देखा, ताकि वह राकेश को पाल सके।

वंचित जीवन की ढेरों परेशानियों और इन जटिल वास्तविकताओं से, राकेश को जिस चीज़ ने बाहर निकलने में मदद की, वह है बदलाव लाने की उनकी दृढ़ इच्छा। वह किसी भी हालत में हार मानने वाले नहीं थे। वह अपनी पढ़ाई पर पूरा ध्यान देते थे, ताकि पढ़-लिखकर अपने और अपने आस-पास के लोगों का जीवन बेहतर बनाने के लिए कुछ कर सके।

लेकिन अचानक आई इस महामारी ने, धीरे-धीरे उनकी उम्मीदों पर पानी फेर दिया। हज़ारों लोगों की तरह, राकेश के दादा-दादी की भी नौकरी चली गई। आज वे दुबारा अपने पैरों पर खड़े होने के लिए संघर्ष कर रहे हैं। फिलहाल, राकेश ही उनका एकमात्र सहारा हैं। जून 2021 से, राकेश के मन में पढ़ाई छोड़कर, नौकरी ढूंढने के विचार आ रहे हैं, ताकि वह अपने दादा-दादी की मदद कर सके। सिर्फ 14 साल के इस बच्चे को लगता है कि चीजों को ठीक करने और जिंदगी को आसान बनाने का यही एक तरीका है।


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क्या टूट जाएंगे इनके सपने?

उनकी तरह ऐसे कई बच्चे हैं, जो अभाव, मजबूरी और लाचारी के एक अजीब से जाल में फंसे हुए हैं।

ऐसी ही एक और युवा छात्रा हैं मधुमिता। वह, किसी भी तरह का फॉर्मल एजुकेशन प्राप्त करने वाली अपने परिवार की पहली लड़की हैं। उनके पिता, एक दिहाड़ी मजदूर और माँ घरेलू सहायिका हैं। मधुमिता का सपना है कि वह एक टीचर बने और लोगों को ज्ञान का उपहार दे।

लेकिन कभी-कभी जब परिवार, एक दिन के खाने के लिए भी संघर्ष करते हैं, तो उन परिवारों के बच्चों को बहुत-सी इच्छाओं का दम घोटना पड़ता है। मेधावी और होशियार होने के बाद भी, उनकी पढ़ने की चाह, एक अधूरे सपने सा लगने लगता है और टूटकर बिखर जाती हैं, उनकी सारी आकांक्षाएं।

प्रोजेक्ट ड्रीम स्कूल

पिछले साल से, ड्रीम स्कूल फाउंडेशन के साथ साझेदारी में द बेटर इंडिया #projectdreamschool के साथ बेंगलुरु के सरकारी, अर्ध सरकारी-सहायता प्राप्त और निजी स्कूलों में पढ़ने वाले ऐसे बच्चों की मदद कर रहा है। इस अभियान के तहत आपके योगदान से, इन बच्चों ने अपने सपनों को साकार करने की दिशा में एक और कदम बढ़ाया है।

आज, इनमें से 30 छात्र ऐसे हैं, जो 10वीं कक्षा में पढ़ाई शुरू करने के लिए तैयार हैं। लेकिन वे हमारे समर्थन के बिना ऐसा नहीं कर सकते। हम, आपसे एक बार फिर आगे आकर, उन्हें स्कूल में रहने और उनकी शिक्षा पूरी करने में मदद करने का आग्रह करते हैं।

एक कदम शिक्षा की ओर। यहां करें दान (https://milaap.org/fundraisers/support-students-at-dream-school-foundation)

इस कहानी को अंग्रेजी में पढ़ें – ‘I Dream Of Becoming a Collector’: Why This Teen Might Drop Out of School

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संपादन – मानबी कटोच

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