उदयपुर की ‘धरोहर’: इस इवनिंग शो को देखने के लिए देश-विदेश से पहुँचते हैं पर्यटक यहाँ!

धरोहर का एक ही सपना है, कि लोक कलाकारों को एक मंच मिले और पूरा सम्मान भी। साथ ही उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो।

राजस्थान का नाम सुनते ही, प्रकृति के नजारे, मानवीय रचनाओं से समृद्ध हवेलियां, महल, संस्कृति, लोक गीत, लोक-नृत्य, रंग-बिरंगे पहनावे और उत्सव आंखों के सामने उतरने लगता हैं। राजस्थान की लोक परंपराएं, नृत्य, गाजे-बाजे सदियों से एक बड़े तबके का रोजगार-साधन रहे हैं। लेकिन जब से मनोरंजन के नए-नए साधन आने लगे हैं तब से यहां के लोक कलाकार बेरोजगारी की मार झेल रहे हैं, जिनके साथ यहां की लोक-कलाएं भी धुंधली होती जा रही हैं। लोक कलाओं और कलाकारों की विरासत को बचाने के लिए राजस्थान के झीलों वाले शहर उदयपुर में ‘धरोहर’ नाम की एक संस्था काम कर रही है।

धरोहर की नींव दीपक दीक्षित द्वारा 28 अक्टूबर 2000 में रखी गई थी। तब से लेकर आज तक उदयपुर की ‘बागोड़ की हवेली’ में रोजाना लोक नृत्यों का एक अत्यंत खूबसूरत कार्यक्रम होता है। जिसके द्वारा सैंकड़ों कलाकारों को रोज़गार तो मिला ही है, साथ ही, कलाकारों में अपनी लोक कला के प्रति प्रेम पहले से दोगुना हो गया है। लोकप्रियता ऐसी कि देश तो क्या विदेश से भी लोग आ कर इसे देखते हैं।

धरोहर की सबसे पुरानी कलाकारों में से एक – जया

द बेटर इंडिया हिंदी से बातचीत में दीपक ने बताया कि इन सब की शुरुआत कुछ यूं हुई कि वह एक थिएटर आर्टिस्ट थे। इसी के साथ दीपक वेस्ट जॉन कल्चर सेंटर (जिसका ऑफिस ऐतिहासिक गंगोर की हवेली में था।) में काम भी करते थे। यही कारण था कि उनका मिलना जुलना दूसरे कलाकारों के साथ लगा ही रहता था। 1986 से पहले कई सरकारी कर्मचारी वहां रहा करते थे, जिनमें से एक दीपक दीक्षित के दोस्त भी थे। इनके पास उनका आना जाना लगा ही रहता था। दीपक नॉस्टैल्जिक होकर बताते हैं कि उन्हें आज भी वो दिन याद हैं, जब वह घंटों उस महल को निहारा करते थे और सोचते थे कि पहले कैसे राजा महाराजा यहां ठाठ से जीया करते होंगे।

कुछ सालों बाद दीपक दीक्षित ने महसूस किया कि उदयपुर के टूरिज्म में काफी गिरावट आने लगी है। शाम के समय पर्यटकों के पास देखने के लिए कुछ होता ही नहीं। जिससे उदयपुर की शाम नीरस बनती जा रही है। तब दीपक को एक आईडिया आया। उन्होंने सोचा कि क्यों न उदयपुर घूमने आए पर्यटकों के लिए लोक नृत्यों के रंगारंग कार्यक्रम का इंतजाम करवाया जाए। इस योजना में उनका साथ दिया उस समय के WZCC के डायरेक्टर विश्वास मेहता (IAS) ने। उनके पूर्ण सहयोग के साथ 28 अक्टूबर 2000 में धरोहर की नींव रखी गई।

शुरुआत में सफ़र आसान न था। लोगों को जा-जा कर धरोहर द्वारा आयोजित लोक नृत्य प्रोग्राम के बारे में बताया जाता था। जिससे केवल 1-7 पर्यटक ही जुट पाते थे। लेकिन जब इरादे नेक हों और काम करने का जज्बा अमिट, तो सफलता ज्यादा देर आपसे दूर नहीं रह पाती है। धरोहर कार्यक्रम की लोकप्रियता का अब तो आलम यह है कि कई बार डबल शो तक करवाने पड़ते है। सुविधा के लिए ऑनलाइन भी टिकटें उपलब्ध कराई जाने लगीं हैं। भारतीय पर्यटकों के साथ-साथ विदेशी पर्यटकों के बीच भी इसका बोलबाला हो गया।

धरोहर अकेला ही नहीं बढ़ा। उसने अपने साथ जुड़े कलाकारों को भी बढ़ाया। जिन कलाकारों को हफ्ते में एक या दो बार परफॉर्मेंस करने को मिलता था, धरोहर से जुड़ने के बाद रोजाना पर्फार्मेंस करने का मौका मिलने लगा। इसका असर उनकी आमदनी में भी दिखने लगा। अब उनके जीवन का स्तर पहले से बेहतर हो रहा है। साथ ही उनमें अपनी कला के प्रति प्रेम बढ़ गया है। अब वे दिल से चाहते हैं कि उनकी कला को देश क्या विदेशों तक फैलाएं।

दीपक संग कीर्ति

धरोहर को खड़ा करने में दीपक की पत्नी कीर्ति का बड़ा योगदान रहा है। इस काम में आईं चुनौतियों के बारे में दीपक की पत्नी बताती हैं, “दिक्कतें काफी आईं लेकिन हमें अपना लक्ष्य साफ पता था। हम काम करते गए, कलाकारों को जोड़ते गए. मेरी जिंदगी धरोहर को सार्थक बनाने के इर्दगिर्द ही घूमती है। मैं क्वालिटी में बिल्कुल भी कोम्प्रोमाईज नहीं करती। महिला कलाकारों का जुझारूपन भी काबिल-ए-तारीफ है। वे अपनी घरेलू जिम्मेदारियां निभाने के साथ-साथ अपनी कला को भी बखूबी बढ़ा रही हैं। ये बहुत ही दिलेर महिलाएं हैं। इन महिलाओं के जीवनस्तर में भी बहुत परिवर्तन आया है, हर लिहाज से, सामाजिक, आर्थिक और भावनात्मक भी। वो हर चरण में मजबूत ही हुई हैं।”

गाँव में घूंघट प्रथा होती है। अंधविश्वास के साए में से इन कलाकारों को निकालकर एक भीड़ के सामने प्रदर्शन करने के लिए तैयार करना एक बड़ा टास्क था। इसमें काफी मुश्किलें आईं। पर इस दम्पति का मुख्य उद्देश्य है कि ज्यादा से ज्यादा लोगों को राजस्थानी संस्कृति से परिचित कराया जाए। जानकारी भी मिले और मनोरंजन भी हो।

धरोहर की सबसे पुरानी कलाकारों में से एक, जया से भी हमने बात की। वह बताती हैं, “मुझे धरोहर से जुड़े तकरीबन बीस साल हो गए हैं। मैं खुद मटका भवाई डांस में एक्सपर्ट बनीं और अब मैं नई लड़कियों को भी सिखाती हूँ। अब तो विदेशी बच्चियों को भी सिखाने लगी हूँ। धरोहर से जुड़ने से पहले मेरी कोई कमाई नहीं होती थी पर यहां से जुड़ने के बाद मैंने देश भर में काफी यात्राएं कीं, वहां पर परफॉर्म किया, विदेश भी गई। इस प्लैटफॉर्म के लिए मैं धरोहर की आभारी हूँ।”

धरोहर का एक ही सपना है कि लोक कलाकारों को एक मंच मिले और पूरा सम्मान भी। साथ ही उनकी आर्थिक स्थिति भी मजबूत हो।

एक और पुरानी कलाकार सीमा बताती हैं, ” मुझे यहाँ बीस साल हो गए हैं। मैं फ्रांस भी गई, ब्राजील भी गई अपना डांस करने। मैं भी यहां परफॉर्म करती हूँ, मेरी माँ भी करती हैं, मेरी बच्ची भी यहां परफॉर्म करती है। मैं पहले होटलों में डांस करके पैसे कमाती थी लेकिन धरोहर से जुड़ने के बाद हमें हमारे काम के लिए काफी सम्मान मिलने लगा। देश-विदेश से लोग हमारा प्रोग्राम देखने आते हैं। इससे बढ़कर हम कलाकारों के लिए क्या हो सकता है।”

सीमा यहाँ बीस साल से परफॉर्म कर रहीं हैं

जाते जाते दीक्षित कहते हैं, “भारत कई अद्भुत लोककलाओं और कलाकारों से भरा पड़ा है। उन सभी को एक मंच देने की जरूरत है, ताकि वे अपने जीवन का स्तर बढ़ा सकें। जिसके लिए हमें उन्हें बस शिक्षित करने की जरूरत है।”

तो अगली बार आप या आपके परिवार-दोस्त, जब भी उदयपुर घूमने जाएं तो धरोहर का यह कार्यक्रम देखने जरूर जाएं। न केवल आपका मनोरंजन होगा, बल्कि आप पश्चिमी भारत की इन महान और पुरातन लोककलाओं से रूबरू भी हो पाएंगे। धरोहर की वेबसाइट पर जाने के लिए यहां क्लिक करें।

संपादन – मानबी कटोच 


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर व्हाट्सएप कर सकते हैं।

We at The Better India want to showcase everything that is working in this country. By using the power of constructive journalism, we want to change India – one story at a time. If you read us, like us and want this positive movement to grow, then do consider supporting us via the following buttons.

Please read these FAQs before contributing.

X