निवार की दोपहर झमाझम बारिश के बीच पुणे के तिलक स्मारक मंदिर नाट्यगृह में लोग जुट रहे हैं। 12 बजे तक एक लंबी लाइन हाथों में टिकट लिए नाट्यगृह में कौतूहल के साथ प्रवेश करती है। लोग लगातार आ रहे हैं इसलिए नाट्य प्रस्तुति अपने निर्धारित समय दोपहर 12 बजे की बजाय1 बजे शुरू हो पाती है।

खचाखच भरे हॉल में घोषणा होती है, ‘ 19 नेत्रहीन कलाकार प्रस्तुत करते हैं नाटक ‘मेघदूत’।

 

…और तालियों की गड़गड़ाहट पर्दे के पीछे तैयार खड़े कलाकारों में आत्मविश्वास भर देती है।

मंच पर अभिनय, संवाद, गायन, नृत्य और दृश्य संयोजन देखकर दर्शक अपनी कुर्सियों से उछल पड़ते हैं। ऐसे कम्पोजिशन कि देखने वाले न बना पाएं।

नाटक ऐसी विधा है जिसमें सारी विधाएँ समाहित होती हैं। अभिनय के साथ साथ गीत-संगीत और नृत्य के द्वारा कहानी कही जाती है। सावी फाउंडेशन के सहयोग से 19 अंध कलाकारों ने महाकवि कालिदास के काव्य नाटक ‘मेघदूत’ का मंचन किया। स्वागत थोराट के निर्देशन में नेत्रहीन कलाकारों ने अपनी प्रस्तुति से दर्शकों को अभिभूत कर दिया।
नाटक के लेखक और अनुवादक गणेश दिघे प्रस्तुति के दौरान मौजूद रहे। वे कहते हैं कि,

“जब मैंने लिखा था तब मैं इन दृश्यों में नाटक नहीं सोच पाया था जैसे इन कलाकारों ने प्रस्तुत किये हैं। मेरे लिए एकदम नया मेघदूत मेरे सामने मंचित हो रहा था।”

नाटक में नृत्य भी था और तलवारों का युद्ध भी.. बिना देखे एक-दूसरे के साथ इतना बेहतर तालमेल देखते ही बनता है।

नाटक के निर्देशक स्वागत कहते हैं, “हमें नजरिया बदलने की जरूरत है। आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि नेत्रहीन भी ऐसा कर सकते हैं, मैं तो कहता हूँ वे सबसे सुंदर कर सकते हैं। मैं नेत्रहीन प्रतिभाओं के प्रति समाज का नजरिया बदलना चाहता हूँ। और मैं इन्हें जितना सिखा रहा हूँ उससे कहीं अधिक सीख रहा हूँ। कलाकारों की मेहनत और उत्साह देखकर मुझे ऊर्जा मिलती है।”

पुणे के अंध कलाकारों की नाट्य प्रस्तुतियाँ देखकर आप चौंक जायेंगे। कालिदास का क्लासिक नाटक ‘मेघदूत’ के मंचन की जिम्मेदारी कई बार समर्थ नाट्य संस्थाएं भी नहीं लेतीं लेकिन नेत्रहीन कलाकारों की प्रस्तुति निःशब्द कर देती है। सावी फाउंडेशन की मदद से निर्देशक स्वागत थोराट की अटूट मेहनत से 19 नेत्रहीन कलाकार मंच पर अपनी प्रतिभा प्रस्तुत करते हैं तो नाटक के नए अर्थ सामने आते हैं।

पुणे की सावी फाउंडेशन ने नाटक का निर्माण और इन कलाकारों को तैयार किया है। इस संस्था को शहर की महिलाएं मिलकर समाज कार्य के लिए चलाती हैं। संस्था की संस्थापक सदस्य रश्मि जी बताती हैं,

“नाटक में भूमिकाएं निभाने वाले कलाकार विभिन्न संस्थाओं से जुड़े हैं। कोई बैंक में नौकरी करता है तो कोई अपनी उच्च शिक्षा पूरी कर रहा है। महाराष्ट्र के कई शहरों से इन्हें चुना गया है। 80 दिनों की दिन रात मेहनत का परिणाम है कि इन्हें मंच पर उतारा गया तो शानदार प्रस्तुति सामने आई।”

कलाकारों के लिए भी ये अनुभव सपने पुरे होने से कहीं ऊपर है। पुणे में ही बैंक में काम करने वाले और नाटक में मुख्य भूमिका निभाने वाले गौरव कहते हैं,

“मैं जब भी फिल्मों या नाटकों के बारे में सुनता था तो मन ही मन सोचता था कि काश मैं भी अभिनय करूँ लेकिन लगता था कि आँखें होतीं तो मैं जरूर अभिनेता ही बनता।
अब जबकि मुझे नाटक में मुख्य भूमिका मिली तो मैं उछल पड़ा। मेरे लिए ये सपने से भी ऊपर की बात है।”

कालिदास रचित मेघदूत क्लासिक नाटक है जिसमें नाटक का पात्र यक्ष जिसे एक साल तक अपनी प्रेयसी से दूर पर्वत पर रहने की सजा मिलती है। तब आषाढ़ के पहले दिन वह मेघों के जरिए अपनी प्रेयसी को सन्देश भेजता है। मेघों को रास्ता बताते हुए कालिदास जो लिखते हैं विश्व साहित्य में प्रकृति का ऐसा अनूठा वर्णन कहीं नहीं मिलता।

नाटक में दामिनी की भूमिका निभाने वाली तेजस्विनी भालेकर मेघदूत को महसूसते हुए बताती हैं,

“मुझे घूमने का बहुत शौक है, अपना देश, पहाड़, नदियां, समन्दर… लेकिन देख न पाने के कारण ये सपना ही रह जाता है। मुझे कालिदास के मेघदूत में भूमिका मिली जिसके कारण मैंने नाटक के संवादों और गीतों से पूरा देश घूम लिया। कालिदास ने मेघों से संवाद के जरिए नदियां, पर्वत, और गांवों का ऐसा विवरण किया है कि सब स्पष्ट चित्र बन जाते हैं। मैं सौभाग्यशाली हूँ कि मुझे मेघदूत करने को मिला.”

तेजस्विनी भालेकर

नाटक ऐसी विधा है जो सबको सींचती है। मानव की अनन्त सम्भावनाओं को उजागर करती है, इसमें कलाकार भी और दर्शक भी भावों से भर जाता है।

सावी फाउंडेशन Team with Writer and Director

सावी फाउंडेशन नेत्रहीन दिव्यांगों के लिए ब्रेल लाइब्रेरी से लेकर वोकेशनल ट्रेनिंग के कई कार्यक्रम चलाती है। महिलाओं के सामूहिक प्रयास से एक नई सामाजिक चेतना का रास्ता बन रहा है। पुणे की व्यावसायिक महिलाएं मिलकर सावी फाउंडेशन का कार्य आगे बढ़ा रही हैं। अगर आओ भी इनसे जुड़ना चाहते हैं तो इस लिंक पर जाकर जुड़ सकते हैं।

और अंत में हेलन केलर की कविता की पंक्तियाँ-:

“क्या तुमने अंधेरों के खजाने में घुसकर देखा है

अपने अंधेपन को खोजो

उसमें अनगिनत मोती हैं जीवन के..”

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