दिव्यांगों के हौसले की समय-समय पर ऐसी कहानियां हमारे सामने आती रहती हैं जिनमें कुछ करने का जूनून कूट-कूट कर भरा होता है। और उनकी कहानियों से हमारे भीतर भी ऊर्जा भर जाती है।

रांची के बृजकिशोर नेत्रहीन विद्यालय की छात्राएं ऐसा ही इतिहास रचने को तैयार हैं। जल्द ही अब कॉल सेंटरों की बागडोर ये नेत्रहीन लड़कियां संभालेंगी। यह पूर्वी भारत का पहला और देश का दूसरा ऐसा नेत्रहीन बैच होगा जो कॉल सेंटर में आपकी मोबाइल सेवाओं संबंधी समस्याओं का समाधान करेगा। देश का पहला नेत्रहीन बैच पुणे से है।

नेत्रहीन लड़कियों को मोबाइल ऑपरेटर कंपनी वोडाफोन ने शुरूआत में प्रशिक्षित करने का जिम्मा उठाया, जिससे अब नेत्रहीन लड़कियां भी कॉल सेंटरों में अपना करियर बना सकेंगीं।

15 से 19 वर्ष की उम्र की 14 लड़कियों को ‘बृजकिशोर नेत्रहीन विद्यालय’ में प्रशिक्षण दिया जा रहा है।

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इन लड़कियों को वोडाफोन कंपनी ने कॉल सेंटर में काम करने की ट्रेनिंग के लिए पुणे स्थित ‘टेक्नीकल ट्रेनिंग संस्थान’ में शुरूआती ट्रेनिंग के लिए भेजा था। इस बैच की पुणे में हो चुकी ट्रेनिंग के बाद छात्राएं अब रांची के इस नेत्रहीन विद्यालय में आगे की ट्रेनिंग ले रही हैं।

गैरसरकारी संस्थान ‘बृजकिशोर नेत्रहीन विद्यालय’ की संस्थापक-ट्रस्टी नीलू वर्मा ने हिंदुस्तान टाइम्स को बताया कि , “अगले महीने से इसी केंद्र में कॉल सेंटर ट्रेनिंग विंग प्रारम्भ किया जायेगा। जहाँ अन्य छात्राएं भी ट्रेनिंग प्राप्त कर सकेंगीं। नेत्रहीन लड़कियों के लिए कंप्यूटर में टेक्स्ट-टू-स्पीच सॉफ्टवेयर लगाए जाएंगे ताकि छात्राएं कमांड को सुनकर कंप्यूटर चला सके।”

नीलू वर्मा इस ट्रेनिंग की शुरुआत की कहानी आगे बताती हैं कि, “जब मैंने पुणे केे ‘टेक्नीकल ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट’ में नेत्रहीन बच्चों को कॉल सेंटर ट्रेनिंग दिए जाने के बारे में सुना। तो ये विचार मेरे दिमाग में भी आया कि क्यों न हमारी बच्चियों को भी ऐसी ट्रेनिंग दी जाए, जिससे उनका करियर भी इस क्षेत्र में बनाया जाए।”

विद्यालय प्रशासन ने इन लड़कियों के प्लेसमेंट के लिए विभिन्न टेलीकॉम कंपनियों से बात की है और अगले महीने इनकी ट्रेनिंग पूरी होते ही इन्हें काम मिल जाने की पूरी सम्भावना है।

कॉल सेंटर विंग के इंचार्ज और ट्रेनर संजय कुमार सिन्हा बताते हैं, “जब इन लड़कियों को भी सीखने के अवसर दिए जाते हैं तो ये भी सामान्य बच्चों की तरह हर चुनौती का सामना करते हैं। क्लास में रेगुलर आने से लेकर सीखने का समर्पण देखते बनता है।”

ट्रेनिंग के बाद इन लड़कियों को टेलीकॉम कंपनियां नौकरी पर रख लेंगी। जहां इन्हें 3 हज़ार से 6 हज़ार प्रतिमाह की आमदनी होने लगेगी।

ट्रेनिंग कर रही 19 वर्षीय वंदना मंदी कहती हैं,”ये सुअवसर हमें सही वक़्त पर मिला है, इससे हासिल पैसों से हम अपनी आगे की पढाई भी कर लेंगे। आखिर हम सब भी तो आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होना चाहते हैं।”

सुनीता कुमारी दसवीं में पढ़ रही हैं और इस केंद्र में ही ट्रेनिंग ले रही हैं। सुनीता जन्म से ही आँखों से देख नहीं पातीं, लेकिन सपने देखने में जुनूनी हैं। सुनीता टेलीमार्केटिंग के क्षेत्र में बेहतर काम करना चाहती है, जिससे वे अपने जूनियर्स को भी इसे सीखने को प्रेरित कर सके।

बृजकिशोर नेत्रहीन विद्यालय की ये लड़कियां उन सबके लिए हौसले की मिसाल हैं, जो विशेष योग्यता के साथ जन्मे हैं। हमारी शुभकामनायें इनके साथ हैं, जीवन में और उत्साहित कदम उठाऐं और समाज को प्रेरित करती रहें।

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