देखने में असमर्थ एक माँ नें जब अपने बेटे के आगे चारो धाम घूमने की इच्छा ज़ाहिर की, तब उस बेटे ने इस इच्छा को  आज्ञा माना और निकल पड़ा उन्हें ले कर चार धाम की यात्रा पर। नहीं, यह युगों पुरानी श्रवण कुमार की कहानी नहीं है। यह आज के उस सच्चे मातृभक्त की कहानी है जो पिछले 20 वर्षो से अपनी माँ को कंधे पर टांग विभिन्न धार्मिक स्थलों की सैर करवा रहा है। आइये मिलते हैं 50 वर्षीय जबलपुर, मध्य प्रदेश के निवासी कैलाश गिरी से।

ई सालो पहले जब गिरी मात्र 14 वर्ष का था, तब एक दुर्घटना में उसके पाँव की हड्डी टूट गयी थी। चिकित्सा में अच्छे खासे पैसे खर्च हो जाते जो इस गरीब परिवार के पास नहीं थे। दुखी होकर गिरी की माँ, कीर्ति देवी ने भगवान् से बेटे को स्वस्थ करने की मन्नत मांगी, जिसके बाद गिरी बिना किसी महंगे इलाज के, कुछ समय में ही अपने पाँव पर चलने लगा।

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Pic credit: 2013ritemail2014.blogspot.in

गिरी आज अपनी सलामती को अपनी माँ की दुआओं का असर ही मानता है और कहता है, ” मेरी माँ का मेरे अलावा है ही कौन। मेरे भाई बहन में से कोई भी आज जीवित नहीं है और जब मैं 10 वर्ष का था तभी मेरे पिता का देहांत हो गया था। मेरे अलावा इनकी इच्छा कौन पूरी करेगा?”

1996 फरवरी को शुरू हुई यह यात्रा काशी, अयोध्या, चित्रकूट, रामेश्वरम, तिरुपति, पूरी, जनक पुर( नेपाल), केदारनाथ, ऋषिकेश , हरिद्वार, द्वारका, महाबलेश्वर से होती हुई अब अपने अंतिम चरण पर है। जिसके बाद वे मध्यप्रदेश के जबलपुर इलाके में बसे अपने गाँव वार्गी पहुंचकर अपनी यात्रा समाप्त करेंगे।

92 वर्षीय अपनी माँ को कंधे से लटकी टोकरी में बैठा कर यह व्यक्ति 20 वर्ष में करीब 37000 कि.मी की दूरी पैदल चलकर पूरी कर चूका है।

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Pic credit: 2013ritemail2014.blogspot.in

टाइम्स ऑफ़ इंडिया को दिए साक्षात्कार में गिरी ने बयाता, ” भारत में घूमने का मेरा अनुभव काफी अच्छा रहा। यहाँ के लोग बहुत अच्छे हैं और निःस्वार्थ भाव से हमारी मदद करते हैं। इनसे मिले दान और भोजन से हमारा गुज़ारा होता आया है और वह हमारे लिए काफी रहता है।”

खुद को श्रवण कुमार से तुलना करवाना कैलाश को पसंद नहीं है। वे मानते हैं कि उन्हें बहुत लोग ऐसा कहते हैं पर वह इस से असहमत हैं। गिरी कहते हैं, “अगर आज के नौजवान मुझे देख कर अपने बूढ़े माँ बाप की थोड़ी इज्ज़त करने लगे तो ये ही मेरे लिए बहुत है।”

बुधवार को मथुरा पहुंचे गिरी की इच्छा अपनी माँ को ले कर ताज महल जाने की है। वे कहते हैं, ” यह जगह भी ज़रूरी है। मैं इसे अपने मंदिरों और तीर्थ की लम्बी सूची में डालना चाहता हूँ। ”

कैलाश और उनकी माँ की इस यात्रा की सफलता के लिए हमारी शुभकामनाएं!

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