पुणे जिले के वाब्लेवादी गाँव में एक ऐसा सरकारी विद्यालय है, जो देश के अन्य विद्यालयों से भिन्न है। हालाँकि अब यह पुरानी बात हो गयी है, फिर भी इसकी गूँज दूसरों तक पहुंचना बाकी है।

इस विद्यालय ने खुद में बहुत से बदलाव किये हैं, चाहे वह संरचना के रूप में हो या पढाई के तरीके के रूप में।

वर्ष 2012 में जब दत्तात्रेय वारे नें प्राचार्य का पद संभाला, तब उन्होंने यह पाया कि यहाँ के बच्चों को स्कूल आने में कुछ ख़ास रूचि नहीं है। उस वक्त केवल 30 ही ऐसे छात्र थे जो नियमित रूप से विद्यालय आते थे। इस से दुखी हो कर दत्तात्रेय ने अभिभावकों से बात कर हल निकालने का सोचा।

वे बताते हैं, ” मैंने उन्हें समझाया कि इन बच्चो के लिए अच्छी शिक्षा कितनी महत्त्वपूर्ण है, और इसके लिए एक अच्छे माहौल का होना भी उतना ही आवश्यक है। हम इस निष्कर्ष पर पहुंचे कि इस के लिए हमें विद्यालय में उचित बदलाव लाने होंगे।”

इस मीटिंग के दौरान अभिभावकों ने यह निर्णय लिया कि वे किसी भी रूप में बाहरी मदद नहीं लेंगे। इन सबने आपस में मिलकर करीब 17 लाख की राशि एकत्रित की। 66 परिवारों की कोशिशो से 1 साल के भीतर ही यह प्रोजेक्ट पूरा हो गया जिसमे अभिभावकों ने किसी भी मजदूर की मदद नहीं ली, बल्कि खुद की मेहनत से इसे अंजाम तक पहुँचाया।

आज यह विद्यालय वातानुकूलित होने के साथ ही सौर्य उर्जा पर चलने वाला संस्थान है। छात्रों की संख्या भी बढ़ कर 90 से अधिक हो गयी ।

दत्तात्रेय बताते हैं, ” अब यहाँ का पूरा वातावरण ही बदल चूका है। बच्चे अब सुबह 8 बजे से ही आने लगते हैं और शाम के सात बजे तक रहते हैं.. जिसके बाद भी हमे ही उन्हें जाने को कहना पड़ता है।”

कैंपस में वाई फाई की सुविधा होने के साथ ही सारे छात्रो के पास एक निजी टेबलेट भी है। विद्यालय परिसर में ही एक वनस्पति उद्यान भी है।

दत्तात्रेय को मिला कर इस विद्यालय में कुल 4 शिक्षक हैं और यह दत्तात्रेय की ही सोच रही, जिससे यह विद्यालय आज इस मुकाम पर पहुँच पाया है।

dattatrey

दत्तात्रेय

विद्यालय में गणित, विज्ञान, भाषा के अलावा क्राफ्ट लैब और स्पोर्ट्स रूम भी हैं। एक आम स्कूल से यहाँ पर दी जाने वाली शिक्षा बिलकुल अलग है। यहाँ बच्चो को उनकी रूचि के आधार पर ही पढाया जाता है। जैसे कुछ छात्र आज सिर्फ गणित की पढाई कर सकते हैं और किसी और दिन अंग्रेजी पढ़ सकते हैं। क्लास का समय भी यहाँ नियमित नहीं होता।

अंत में अगर इन्हें कोई भी विषय समझ नहीं आया तो यह इंटरनेट की मदद लेते हैं।

दत्तात्रेय बताते हैं, ” चूँकि यह विद्यालय महाराष्ट्र राज्य बोर्ड के अधीन आता है, यहाँ के छात्र साल के अंत में परीक्षा में सम्मिलित होते हैं। पर हम सभी को लगता है कि हमे किसी भी छात्र को पढाई में आ रही परेशानी को अंको के आधार पर नहीं मापना चाहिए। यही कारण है कि हम साल के बीच में किसी भी तरह की परीक्षा नहीं लेते। हमारी यह कोशिश रहती है कि हम हर एक छात्र को अच्छे से पढाये और अंत में यह परीक्षा हमारी कोशिशो की सफलता को मापने के लिए होनी चाहिए। “

2013 में भारतीय वैज्ञानिक विजय भाटकर इस विद्यालय में आये थे और उन्होंने भी माना कि यह विद्यालय उनके सपनो के विद्यालय के जैसा ही है।

वाब्लेवादी जिला परिषद् विद्यालय I SO 9001-2008 द्वारा सर्टिफाइड है।

अंत में दत्तात्रेय कहते हैं, ” हम चाहते हैं कि पढाई एक उत्साह के साथ हो। हम उम्मीद करते हैं कि महाराष्ट्र के अन्य विद्यालय भी इस तरीके को अपनाये ताकि अधिक से अधिक बच्चों की रचि पढाई में हो और वे विद्यालय की ओर खुद चल कर आये।”

मूल लेख मेरील गार्सिया द्वारा लिखित !

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