किस्मत ने उसका दायिना हाथ और पैर छिनकर उसे हरा दिया था पर अभिषेक ठावरे नसीब को मात देकर भारत का दातों से कमान खिचनेवाला पहला तीरंदाज (टीथ आर्चर) बन गया।

जुलाई २०१५ में आर्चरी एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया (AAI) द्वारा आयोजित पैरा-आर्चरी वर्ल्ड चैंपियनशिप में अभिषेक ठावरे ने अपना हुनर दिखाया। उसके बाद अगस्त २०१५ में बरोड़ा में दिव्यांग के लिये आयोजित ऑल इंडिया आर्चरी मीत  में उसने सिल्वर मेडल जीता। सितम्बर २०१५ में नागपुर डिस्ट्रिक्ट एसोसिएशन द्वारा आयोजित राज्य स्तरीय मिट में भी उसने कमाल दिखाया।अक्टूबर २०१५ में सोलापुर में स्टेट आर्चरी मिट में उसने २७वा स्थान प्राप्त किया।जनवरी २०१६ में नागपुर यूनिवर्सिटी के इंटरकॉलेज  मिट में उसने ७२० पॉइंट्स में ६३७ पॉइंट्स प्राप्त किया।

इंटर-यूनिवर्सिटी मीट, पटियाला में उसने अपना हुनर दिखाया और २०० सहभागियों में ६९वा स्थान प्राप्त किया।

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अभिषेक ठावरे

 

अब आप जान चुके होंगे कि इस तीरंदाज ने पैर- ओलंपिक्स  में अपना कमाल दिखाया है। अभिषेक भारत का पहला टीथ- आर्चर है। जी हाँ, आपने सही सुना, अभिषेक दातों से बाण छोड़कर निशाना लगाता है!

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सुनील ठावरे एक प्राइवेट ट्रान्सपोर्ट फर्म में काम करते थे। एक दिन उनके एक साल के बेटे को बुखार हुआ। उसे अस्पताल ले जाया गया। डॉक्टर ने उसके दायिने हाथ पर एक इंजेक्शन दिया। बुखार तो उतर गया पर इन्फेक्शन की वजह से उसके दायिने हाथ को पोलियो हो गया।

अभिषेक कहता है, “मेरे अभिभावको ने मुझे कभी अपंग नहीं समझा। मैंने सामान्य स्कूल में ही अपनी पढाई की और शायद उनका यही निर्णय सही साबित हुआ।”

अभिषेक हमेशा स्पोर्ट्स में भाग लेता था। जब वो आठवी कक्षा में था तब उसने राज्य और राष्ट्र स्तर पर एथलेटिक्स में भाग लिया था। लॉन्ग डिस्टेंस रनिंग में उसने कई सारे मेडल्स हासिल किये। १५०० मीटर और ५००० मीटर की रेस में उसे दिलचस्पी थी। ताज्जुब की बात ये है कि वो हमेशा सामान्य केटेगरी में भाग लेता था।

जब वो दसवी कक्षा में था तब वो श्री राजेन्द्र खंडाल से मिला जो आदर्श विद्या मंदिर नामक स्पोर्टस क्लब चलाते थे। खंडाल ने उसे क्रॉस रनिंग के बारे में जानकारी दी। यही, अभिषेक का MSPA(महाराष्ट्र स्टेट पैरालिम्पिक्स एसोसिएशन, नागपुर) से भी संपर्क हुआ।

पिछले ९ सालों से अभिषेक पैरा-एथलीट है। उसे कभी भी अपने दायिने हाथ की कमी महसूस नहीं हुयी। पर शायद नसीब उस पर मेहरबान नहीं था।

२६ अक्टूबर २०१० में प्रैक्टिस करते वक्त अभिषेक के घुटने में चोट लग गयी। जखम बहुत ही गहरा था इसलिये ऑपरेशन करना पड़ा। डॉक्टर ने सलाह दी कि उसे अब दौड़ने की प्रतियोगिता में हिस्सा नहीं लेना चाहिये। पर उसने राज्य स्तरीय प्रतियोगिता में भाग लिया और कांस्य पदक हासिल किया। इसके बाद घुटने का दर्द बढ़ा इसलिये वो कभी दौड़ नहीं पाया।

अभिषेक बताता है, “जब मेरे साथ ये दुर्घटना हुयी तब ऐसा लगा जैसे मेरे पैरो तले जमींन खिसक गयी हो। डॉक्टर ने मुझे आराम करने की सलाह दी। मुझे आशा थी कि मैं ठीक होकर दौड़ने लगूंगा पर दो साल बाद डॉक्टर ने बताया कि अब मैं कभी भी दौड़ नहीं सकूँगा।”

कहते है जो होता है अच्छे के लिए होता है। और अभिषेक के जीवन की ये दुखद घटना भले ही उस वक़्त एक श्राप की भाँती लग रहा हो पर आगे अभिषेक के साथ कुछ बहुत अच्छा होने वाला था।

अभिषेक का भाई संदीप गवई एक तिरंदाज था। उसने अभिषेक को तिरंदाजी सिखने के लिये प्रोत्साहित किया।

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अभिषेक बताते है,“मैं हमेशा अपने देश के लिये कुछ करना चाहता था। अगर मैं अपाहिज न होता तो सेना में भर्ती हो जाता। पर शायद अब ये मुमकिन नहीं था। स्पोर्ट्स ही एकमात्र क्षेत्र था जिसमे मैं देश का नाम रोशन करके खुद को साबित कर सकता था। इसलिये संदीप भैय्या के कहने के मुताबिक मैंने तिरंदाजी सीखना शुरू किया।”

पर ये सब अभिषेक के लिये आसान नहीं था। अपने बाये हाथ से वो धनुष तो पकड़ लेता था पर दाये हाथ में ताकत नहीं थी जिससे तीर चला पाता था।

संदीप गवई बताते है, “जिन लोगो का सिर्फ एक ही हाथ होता है वो कन्धो की मदद से क्लिप का इस्तेमाल करके तिर चलाते है। अभिषेक के कन्धे में ताकत नहीं थी इसलिये मैंने उसे दातों का इस्तेमाल करने की सलाह दी।”

और अभिषेक अपने दातो से तीर चलाने में सफल हुआ।

पर उसकी आर्थिक परिस्थति ठीक नहीं थी इसलिये वो स्पोर्ट्स में भाग नहीं ले पा रहा था। धनुष और तीर  खरीदने के लिये उसके पास पैसे नहीं थे। अपने सपने को साकार करने के लिये अभिषेक को पुरे दो साल तक इंतजार करना पड़ा।

साल २०१४ में अभिषेक की माँ ने अपने गहने गिरवी रखकर कर्ज लिया जिससे अभिषेक ने एक पुराना आर्चरी सेट ख़रीदा।

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इस दौरान उसकी मुलाकात कोच, श्री चंद्रकांत ईलग से हुयी जो महाराष्ट्र पुलिस में कांस्टेबल है। श्री ईलग, द्रोणाचार्य अकादमी, बुलदाना में बच्चो को मुफ्त में तिरंदाजी सिखाते है। अभिषेक की इस खेल में रूचि को देखकर उन्होंने गर्मी की छुट्टियों में उसे पुरा एक महिना ट्रेनिंग दी। उन्होंने बुल्दना में अभिषेक के रहने की भी व्यवस्था की। इस ट्रेनिंग से अभिषेक को अपनी तिरंदाजी और अच्छी तरह से सीखने का मौका मिला। ट्रेनिंग के बाद भी वो हमेशा श्री. ईलग से मिलकर सिखता था जिसकी वजह से वो भारत का पहला टीथ- आर्चर बना।

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चंद्रकांत ईलग – अभिषेक के कोच

 

आज अभिषेक ने अपनी प्रबल इच्छा शक्ति और दृढ़ संकल्प से अपना लक्ष्य प्राप्त कर लिया है। उसके फिसिओथेरफीस्ट, डॉ. आशीष अग्रवाल ने अभिषेक को स्वास्थ ठीक रखने के लिये मदद की एवम दोस्त विपिन, मोहनीश और तुषार ने  समय समय पर आर्थिक सहायता दी। वहीँ ‘जय हिंद एकता सांस्कृतिक क्रीडा मंडल’ ने अपने मैदान में बिना किसी शुल्क के प्रैक्टिस करने के लिये अभिषेक को अनुमति दी। पर इन सबकी मदद के बाद भी इस खेल से जुड़े कई ऐसी चुनौतियां है जिनसे आये दिन अभिषेक को जूझना पड़ता है।

अभिषेक कहते है, “तिरंदाजी महंगा खेल है। मेरे माता-पिता को ट्रेनिंग, डाइट और इक्विपमेंट खरीदने के लिये बड़ी मुश्किल होती है। मेरे दोस्त मेरी मदद करते है पर कोई हमेशा तो किसीको पैसे नहीं दे सकता ना। टीबीआई के माध्यम से मैं सभी लोगो को मेरी मदद करने की गुज़ारिश करता हूँ। मुझे लगता है कि बड़ी कम्पनियों को खिलाडियो की मदद करनी चाहिये। हम खिलाड़ी,उनके लिये खेलेंगे और उन्हें गौरान्वित करेंगे। इतना ही नहीं, रिटायर होने के बाद हम उनकी कंपनी में काम भी कर सकते है।”

अभिषेक सिर्फ २५ साल का है और DNC कॉलेज, नागपुर में MA(Social Science) पढ़ रहा है। आगे चलकर वो MSW(Masters in Social Work) पढना चाहता है।

अभिषेक कहता है, “आज हमारे देश में पोलियो की बीमारी खत्म हो गयी है , ये अपने आप में एक बहुत बड़ी उपलब्धि  है। देश हमारे लिये बहुत कुछ करता है पर हम उसे नज़रंदाज़ कर देते है। मैं  भी देश के लिए कुछ करना चाहता हूँ । मैं अंतर्राष्ट्रीय खेलो में भारत का नाम रौशन करना चाहता हूँ , यही मेरा सपना है और मैं इसके लिए जी तोड़ मेहनत करूँगा । ”

 

मूल लेख मानबी कटोच द्वारा लिखित।

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