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सईद साबरी की राम-नाम-रस-भीनी चदरिया!

ब मोरी चादर बन घर आई,
रंगरेज को दीन्हि।
ऐसा रंग रंगा रंगरे ने,
(के) लालो लाल कर दीन्हि, चदरिया..

सईद साबरी हमारी धरोहर हैं. संगीत नाटक अकादमी से पुरस्कृत यह नाम क़व्वाली की दुनिया का एक अज़ीम नाम है. एक ज़माना था जब आम आदमी और शौक़ीन सभी साल में 2-4 क़व्वाली मुक़ाबले देख ही लेते थे. हर दूसरी फ़िल्म में क़व्वाली होती थी. मन्ना डे और रफ़ी का तो क्या कहना – लता जी और किशोर कुमार ने भी क़व्वालियाँ गायी हैं. फिर जानी बाबू क़व्वाल, हबीब पेंटल, अज़ीज़ मियाँ, बहादुर शाह ज़फ़र बदायूँनी जैसे मशहूरे-ज़माना कलाकार वो समाँ बाँधते थे कि पान की पीकों में अटी वाहवाहियों से आसमान गूँज उठता था.

अमीर ख़ुसरो, जो खड़ी बोली के जन्मदाता और आज की हिन्दी के पितामह हैं, को क़व्वाली शुरू करने का भी श्रेय जाता है. और यह परम्परा लगभग हज़ार साल की है. इसी शताब्दी में नुसरत फ़तेह अली ख़ान साहब ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर क़व्वाली दुनिया के कोने-कोने में पहुँचाया है. इन सबके बीच सईद साबरी की अपनी पहचान है. जो उन्हें नहीं जानते उनके लिए सईद साबरी साहब वो हैं जिन्होंने राज कपूर साहब की हिना फ़िल्म का गाना ‘देर न हो जाए कहीं देर न हो जाए गाया था.

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कुछ सालों पहले जब उन्हें ढूँढ़ते हुए पुराने जयपुर की तंग गलियों में पहुँचे तो बुरी ख़बर मिली कि उन्हें पिछले साल लकवा मार गया है. आधा शरीर सुन्न रहता है. आधा चेहरा भी. अब वे ठीक से बोल नहीं पाते हैं. बोलते हैं तो आधा ही मुँह ठीक से खुलता है दूसरी तरफ़ से लार बहने लगती है. अब जहाँ वे रहते हैं वहाँ नीचे अँधेरा था तो उन्हें दो मंज़िलें ऊपर छत पर ले गए. उनके दोनों बेटों फ़रीद साबरी और अमीन साबरी, जो माशाअल्लाह ख़ुद भी सधे गले के मालिक हैं और एक बड़ी फ़ैन फ़ॉलोइंग रखते हैं, की मदद से ऊपर पहुँचे और सईद साहब ने गुनगुनाना शुरू किया. अगर कभी आपको लगा है कि संगीत दुनयावी इल्म नहीं है तो आप शायद सही ही होंगे. नीचे, संकरी गलियों में बच्चों के खेल की चीखें, गाड़ियों के बेतहाशा हॉर्न पर हॉर्न, लकवा – लेकिन ये सब एक तरफ़ बैठ गए और हम सब सईद साहब को सुनने लगे.

कई नायाब मोती मिले उस दिन. गायन में गायकी की तिकड़म नहीं थी. कबीर जुलाहे की बुनी हुई उनकी चदरिया राम नाम के रस में डूबी थी.

दास कबीर ने ऐसी ओढ़ी,
ज्यूँ की त्यूँ धर दीन्हि ॥

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अष्ट-कमल का चरखा बनाया,
पाँच तत्व की पूनी ।
नौ-दस मास बुनन को लागे,
मूरख मैली किन्ही ॥
चदरिया झीनी रे झीनी…

वे गाते गाते बीच में फ़फ़क उठते हैं और फिर गाने लगते हैं. कबीर को तो बहुत सुना होगा आप लोगों ने लेकिन अंतरतम के अंदरूनी कोनों से आने वाली ऐसी आवाज़ शायद ही सुनी हो. पेश है हिन्दी कविता के ख़ज़ाने का एक बेशक़ीमती हीरा:

आपने सुना इसे?
देखा?
अब यह बतायें कि कबीर आख़िर क्या बला हैं?
उनका हमारे जीवन में क्या काम है?

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वही कबीर जो कहते हैं:
सुखिया सब संसार है, खावे और सोए
दुखिया दास कबीर है, जागे और रोए ||

वही कबीर जो न हिन्दू थे न मुसलमान. जो ‘पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ पंडित भया न कोय’ भी कहते थे और ‘काँकड़-पाथर जोड़ कर मस्जिद लई बनाय’ भी. उन्हीं की दुनिया है जहाँ एक मुसलमान बिना किसी भेद के राम नाम के रस की चुनरिया में डूब सकता है. जाहिल लोग अपने-अपने भगवान में डूबने की बजाय एक दूसरे को सबक सिखाने में व्यस्त रहते हैं (तभी तो जन्नत मिलेगी कमबख़्तों को.

बहरहाल, एक तरफ़ कबीर आपकी चुनरिया झीनी होने अर्थात जीवन के आवागमन को न भूलने की हिदायत देते हैं ताकि आप मुक्त रह सकें रोज़मर्रा के विलापों से. वहीं अंतिम मुक्ति प्राप्त करने की जद्दोजहद में लगे रहने की बातें भी हैं. धर्म के पाखण्ड के प्रति गुस्सा भी है, वहीं भक्ति में डूबने के आनंद का चर्चा भी है. कबीर पर मैं क्या नया कह सकता हूँ उनके बारे में आप बहुत कुछ स्वयं जानते हैं – उसे गुनें. जीवन के ढर्रे पर बेख़बर चलते न जाएँ, आपका जीवन है, आपकी चादर है, जुलाहा कह रहा है कि आप अपने विवेक से इसे बुनें.

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कबीर आपके जीवन में आयें/बने रहें, इस भावना के साथ अभी के लिए विदा:)

लेखक –  मनीष गुप्ता

फिल्म निर्माता निर्देशक मनीष गुप्ता कई साल विदेश में रहने के बाद भारत केवल हिंदी साहित्य का प्रचार प्रसार करने हेतु लौट आये! आप ने अपने यूट्यूब चैनल ‘हिंदी कविता’ के ज़रिये हिंदी साहित्य को एक नयी पहचान प्रदान की हैं!

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