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गुजरात के इस गाँव में हो रही है ‘सोलर’ खेती, न डीज़ल का खर्च और न ही सूखा पड़ने का डर!

मारे देश में साल के 365 दिनों में से लगभग 300 दिन सूरज निकलता है। इसे अगर ऊर्जा के संदर्भ में देखा जाये तो इतने दिनों में सिर्फ़ सूर्य की किरणों से भारत लगभग 5, 000 खरब किलोवाट ऊर्जा उत्पन्न कर सकता है।

भारत में सौर ऊर्जा उत्पन्न करने और उसके इस्तेमाल की क्षमता को देखते हुए; पिछले कुछ सालों में सौर ऊर्जा के क्षेत्र में काफ़ी काम शुरू हुआ है। आज भारत के 15 राज्यों में सोलर ऊर्जा की पॉलिसी हैं। सबसे पहले साल 2009 में गुजरात ने अपनी सोलर पॉलिसी लॉन्च की थी।

गुजरात की सोलर पॉलिसी कई राज्यों के लिए मॉडल बनी और अब गुजरात का एक गाँव और यहाँ के किसान, देश के अन्य सभी गाँवों और किसानों के लिए सौर ऊर्जा के सही इस्तेमाल पर एक अनोखा मॉडल दे रहे हैं।

गुजरात के खेड़ा जिले में स्थित ढूंडी गाँव में विश्व की पहली ‘सौर सिंचाई सहकारी समिति’ का गठन किया गया है। इस समिति का नाम है ‘ढूंडी सौर ऊर्जा उत्पादक सहकारी मंडली’ (DSUUSM)!

फोटो साभार: प्रवीण परमार

“साल 2016 में ढूंडी गाँव के छह किसानों ने मिलकर इस मंडली का गठन किया और आज इस मंडली में 9 किसान हैं। इस सहकारी समिति को अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान (IWMI) की मदद से शुरू किया गया,” एक किसान और इस सहकारी मंडली के सेक्रेटरी प्रवीण परमार ने बताया।

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इन सभी 9 किसानों के खेतों में 8 किलोवाट से लेकर 10.8 किलोवाट तक के सोलर पैनल और पंप लगाये गये हैं। सोलर पंप की मदद से किसान समय पर अपने खेतों की सिंचाई कर पाते हैं और सिंचाई के बाद इन सोलर पैनल से जो भी ऊर्जा उत्पादित होती है; उसे मध्य गुजरात विज कंपनी लिमिटेड (बिजली वितरण कंपनी) इन किसानों से खरीदती है।

परमार ने बताया कि सोलर ऊर्जा के इस सही इस्तेमाल से अब किसानों को पहले से कहीं ज्यादा फायदा हो रहा है। इन किसानों को अब सिंचाई के लिए डीज़ल वाले पंप पर पैसा खर्च करने की जरूरत नहीं है। इससे खेती में लागत काफ़ी कम हो गयी है और साथ ही, कंपनी जो बिजली इनसे खरीदती है, उसके लिए किसानों को 7 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से हर महीने पैसा मिला रहा है। जिस वजह से अब किसानों की अतिरिक्त आय भी हो रही है।

फोटो साभार

साल 2016 में गुजरात के आनंद में स्थित ‘अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान’ ने यह प्रोजेक्ट शुरू किया था। इनका मुख्य सेंटर कोलंबो में है और भारत में इसके दो केंद्र हैं, एक दिल्ली और दूसरा आनंद। इनका मुख्य काम कृषि क्षेत्र में जल प्रबंधन और भू-जल (ग्राउंड वाटर) के घटते स्तर पर शोधकार्य करना है। शोध के बाद ऐसे प्रोजेक्ट और पॉलिसी तैयार करवाना, जिसमें पानी भी बचाया जा सके और जो किसानों के लिए भी हितकारी हो।

आईडब्ल्यूएमआई, आनंद में कार्यरत सलाहकार राहुल राठोड़ ने बताया कि अपने शोध कार्यों से उन्हें पता चला कि कृषि में किसान अक्सर जरूरत से ज्यादा भू-जल का उपयोग करते हैं। जहाँ उन्हें सिर्फ़ 3 घंटे पानी चलाना है, वहां वे 4-5 घंटे चलाते हैं। इसके चलते धीरे-धीरे भू-जल का स्तर काफ़ी कम होता जा रहा है।

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इसके अलावा अगर कहीं सुखा पड़ जाये या फिर कहीं बाढ़ के चलते किसानों की फसल बर्बाद हो जाये, तो उनके पास कमाई का कोई और साधन नहीं होता। ऐसे में किसान बैंकों या साहूकारों के कर्ज तले दब जाते हैं। राठोड़ ने कहा,

“आईडब्ल्यूएमआई का उद्देश्य कुछ ऐसा करना था जिससे किसान अत्याधिक पानी भी ना बर्बाद करें और साथ ही, उनके लिए एक अतिरिक्त कमाई का भी साधन हो।”

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फोटो साभार: प्रवीण परमार

इस विचार के साथ आईडब्ल्यूएमआई ने यह प्रोजेक्ट शुरू किया। अब इस प्रोजेक्ट के चलते किसान निर्धारित समय में ही पानी निकालते हैं और बाकी समय में उत्पादित होने वाली ऊर्जा से उनकी अतिरिक्त कमाई हो रही है। परमार कहते हैं कि गाँव में सहकारी मंडली शुरू हुए दो साल हुए हैं। लेकिन इन दो सालों में ही किसानों के जीवन में काफ़ी बदलाव आया है। ये सभी किसान आज अपने आप में सोलर उद्यमी बन गये हैं।

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अपने फायदे के साथ-साथ ये सभी ‘सोलर किसान’ ऐसे किसानों की मदद भी कर रहे हैं; जो अपने खेतों में पंप नहीं लगवा सकते हैं। पहले ऐसे छोटे-गरीब किसानों को उन लोगों से सिंचाई के लिए पानी खरीदना पड़ता था जिनके यहाँ डीज़ल वाले पंप हैं। इसके लिए उन्हें प्रति घंटे के हिसाब से 450 से 500 रुपये देने पड़ते थे।

पर अब सोलर पंप से पानी खरीदने के लिए उन्हें 200 रुपये से 250 रुपये ही खर्च करने पड़ते हैं। साथ ही, अब वे दिन में कभी भी सिंचाई कर सकते हैं क्योंकि अब उन्हें पंप के इंजन में बार-बार डीज़ल भरवाने की समस्या नहीं है।

परमार ने द बेटर इंडिया से बात करते हुए बताया,

“गाँव के जिस भी किसान ने दो साल पहले सोलर पैनल, पंप और माइक्रो ग्रिड लगवाने के लिए लगभग 55, 000 रुपये खर्च किये थे, आज उन किसानों की वार्षिक आय में लगभग 30, 000 रुपये का इज़ाफा हुआ है। अब उन्हें खेतों की सिंचाई के लिए किसी अतिरिक्त साधन पर खर्च करने की जरूरत नहीं है।”

इस विषय पर परमार ‘टेड टॉक’ में भी बात कर चुके हैं

जब धीरे-धीरे इन किसानों को मुनाफ़ा होने लगा और इनके खेतों में काफ़ी सौर ऊर्जा उत्पादित होने लगी, तो अंतर्राष्ट्रीय जल प्रबंधन संस्थान की मदद से सहकारी मंडली ने गुजरात में बिजली वितरण करने वाली कंपनी के साथ एक एग्रीमेंट किया।

ढूंडी गाँव के किसानों के इस सफल सोलर मॉडल के बारे में जानकर गुजरात के ऊर्जा मंत्री सौरभ पटेल भी ‘ढूंडी सौर ऊर्जा उत्पादक सहकारी मंडली’ के किसानों और सेक्रेटरी प्रवीण परमार से मिलने आये। उन्होंने इस पूरे मॉडल पर चर्चा की।

अब गुजरात सरकार ने ढूंडी गाँव के इस सफल प्रयास के आधार पर ‘सुर्यशक्ति किसान योजना’ शुरू की है। इस योजना के पायलट प्रोजेक्ट को अभी गुजरात के 33 जिलों में शुरू किया गया है। इस योजना के मुताबिक, इन जिलों में किसान अपने खेतों में सोलर ऊर्जा उत्पादित कर; उसे 7 रुपये प्रति यूनिट के हिसाब से सात साल तक सरकारी बिजली कंपनियों को बेच सकते हैं। इसके अंतर्गत लगभग 12, 500 किसानों को लाभ पहुँचाने का उद्देश्य है।

फोटो साभार: प्रवीण परमार

इस योजना का उद्देश्य न सिर्फ़ किसानों को सोलर उद्यमी बना कर उनकी सिंचाई संबंधित परेशानियों को दूर करना है। बल्कि उनके लिए एक अतिरिक्त आय का साधन भी प्रदान करना है। ढूंडी के बाद, आईडब्ल्यूएमआई ने गुजरात के ही एक दुसरे गाँव, मुजकुआ में भी 11 किसानों की सहकारी मंडली के साथ काम शुरू किया है।

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राठोड़ ने बताया कि अगर सरकार पूरे देश में इस तरह छोटी-छोटी सहकारी मंडली बनाकर काम करे तो, हम यक़ीनन किसानों की आय दुगुनी करने में सफल रहेंगे। पूरे भारत में लगभग 21 मिलियन डीज़ल-पंप की जगह सोलर पंप लग सकते हैं। यदि ऐसा होता है तो कृषि के लिए बिजली की सब्सिडी का बोझ हट जायेगा, किसानों की आय बढ़ेगी, देश में ऊर्जा उत्पादन ज्यादा होगा और साथ ही, भू-जल की खपत को नियंत्रित किया जा सकेगा।

आप यहाँ ‘ढूंडी सौर उर्जा उत्पादक सहकारी मंडली’ का फेसबुक पेज देख सकते हैं। इसके अलावा आईडब्ल्यूएमआई से सम्पर्क करने के लिए यहाँ क्लिक करें।


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है. निशा की कविताएँ आप https://kahakasha.blogspot.com/ पर पढ़ सकते हैं!

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