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हमारे देश में रोज़ाना ना जाने कितने ही हादसे होते रहते हैं, जो हमारे लिए टीवी की एक ख़बर या अख़बार की एक हेडलाइन से ज़्यादा कुछ नहीं होते। ऐसी ख़बरों को हम अगले ही दिन भूल जाते हैं। पर हमारे बीच कुछ लोग ऐसे भी हैं, ऐसे हादसे जिनके जीवन की दिशा को ही बदल देते हैं। कुछ साल पहले दिल्ली के गाज़ीपुर गार्बेज डम्पिंग ग्राउंड में एक विस्फोट हुआ था।इसमें कचरे के पहाड़ का एक हिस्सा सड़क पर आ गिरा था। इस हादसे में कई लोगों की जान चली गई थी और चारों तरफ अफरा-तफरी मच गई थी। छानबीन के बाद पता चला कि शहर के बाहर बने सुलगते कचरे के ये पहाड़ अधिक गर्मी में मीथेन जैसी कई खतरनाक गैस छोड़ते हैं। इन्हीं गैसों के कारण ही वह विस्फोट हुआ था।
दरअसल, बड़े शहरों और महानगरों में कचरा प्रबंधन की प्रणाली कुछ ऐसी है कि घरों से निकला कचरा शहर के बाहर एक जगह डाला जाता है।
साल-दर-साल कचरे का यह ढेर बढ़ता चला जाता है और एक पहाड़ में बदल जाता है। हम सब रोज़ाना इसके क़रीब से गुज़रते हैं और नाक पर रूमाल रख आगे बढ़ जाते हैं। हम इस सोच के साथ अपनी राह पकड़ लेते हैं कि हर बड़े शहर के बाहर ऐसे कचरे के ढेर होते ही हैं और इनका किया भी क्या जा सकता है। लेकिन हमारे बीच कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिनका नज़रिया अलग होता है। ऐसे ही एक व्यक्ति हैं प्रवीण नायक। पेशे से सॉफ्टवेयर इंजीनियर प्रवीण नायक जब एक बार कचरे के इस पहाड़ के पास से गुज़रे तो उन्होंने मन में ठान ली कि अपने देश को कचरे के इन बदनुमा पहाड़ों से निजात दिलानी है। प्रवीण को कचरे के ये ढेर बड़े काम के लगे। उन्होंने मल्टीनेशनल कंपनी की अपनी नौकरी छोड़ कर वेस्ट मैनेजमेंट को अपने जीवन का उद्देश्य बना लिया।
प्रवीण के पास न अनुभव था, न ही पैसा। अगर कुछ था तो बस एक मज़बूत इरादा।
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कहते हैं कि कोशिश करने वालों की हार नहीं होती। यह बात प्रवीण और उनकी पत्नी पर पूरी तरह सटीक बैठती है।
जिस समय प्रवीण के मित्र विदेश जाकर सॉफ्टवेयर इंजीनियर की नौकरी कर डॉलर कमा रहे थे, प्रवीण ने कम्प्यूटर की अपनी विशेषज्ञता को कचरा प्रबंधन को एक सही दिशा देने में लगाया।
शुरुआत में आई मुश्किलें
कहते हैं कि आप एक बार शुरू तो करें, राहें अपने-आप निकल आती हैं। नायक दंपत्ति ने कचरा प्रबंधन का एक नया तरीका ढूंढने की ठान तो ली थी, लेकिन यह काम होगा कैसे, यह मालूम न था। प्रवीण के पास विज़न था, पर उसका क्रियान्वयन कैसे होगा, इसका कोई मॉडल नहीं था। सबसे बड़ी समस्या यह थी कि ऐसे लोग कहाँ से मिलेंगे जो स्वेच्छा से कचरा प्रबंधन को अपना करियर बनाएं।
प्रवीण दंपत्ति ने सोचा कि क्यों न कचरे के प्रबंधन में ऐसे लोग लगाए जाएं, जिनकी अहमियत समाज के बहुतायत लोगों की नज़रों में कचरे से ज़्यादा नहीं है। हमारे देश में हज़ारों लोग सड़कों पर रहते हैंऔर उनकी हालत कचरे जैसी ही है। भिखारी, अकेली और बेसहारा महिलाएं और कचरा बीनने वाले लोग ऐसे ही हैं। प्रवीण और उनकी पत्नी ने सोचा कि क्यों न इन लोगों को इस काम में लगाया जाए। फिर उन्होंने दिल्ली में घूम- घूम कर ऐसे लोगों का एक डाटा तैयार किया और उनसे बात की। इन सब की व्यथा कथा एक जैसी ही थी। उनका कहना था कि हम भी इज़्ज़त से जीना चाहते हैं, लेकिन हमें काम देगा कौन।
अब प्रवीण के पास इरादा और उस पर अमल करने वाले, दोनों थे। बस अब ज़रूरत थी एक मॉडल की, जिसे अपना कर यह काम शुरू किया जा सके।
जब प्रवीण दिल्ली में ये सारी तैयारी कर रहे थे, उसी समय छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर में वहां की तत्कालीन कलेक्टर ऋतु सेन छत्तीसगढ़ की आदिवासी महिलाओं को स्वयं सहायता समूह से जोड़ कर कचरा प्रबंधन का सफल प्रयोग कर रही थीं। प्रवीण की पत्नी प्रगति ने एक साल अंबिकापुर में आदिवासी महिलाओं के बीच रह कर उस मॉडल का अध्ययन किया।
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प्रवीण की मेहनत और लगन से प्रभावित होकर धीरे-धीरे कई बड़े नाम इस काम के साथ जुड़ने लगे। कचरा प्रबंधन के लिए तकनीक और मशीनें तैयार करने में नेशनल फिज़िकल लैब, एनर्जी रिसोर्सेस इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया, पाइपलाइन, दिल्ली आईआईटीएल्यूमिनी आदि शामिल हैं।
एक नज़र डालते हैं प्रवीण के स्वच्छता मॉडल पर :
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प्रवीण कहते हैं कि स्वच्छ भारत मिशन केवल हरे और नीले रंग के कूड़ेदान लगाने से सफल नहीं होगा। इसका क्या फायदा कि हम लोगों को तो जागरूक कर, उनसे गीला और सूखा कचरा अलग-अलग इकट्ठा करवाएं, लेकिन जब म्यूनिसिपैलिटी की कचरा जमा करने वाली गाड़ी आए तो उसमें गीला और सूखा कचरा एक जगह मिला दिया जाए। आज पूरे भारत में यही हो रहा है। कचरा प्रबंधन केवल सरकार की ज़िम्मेदारी ही नहीं है। एक शोध के अनुसार, हर व्यक्ति प्रतिदिन 500 ग्राम कचरा पैदा करता है।
"हम घरों में ही सूखे और गीले कचरे को अलग-अलग करते हैं। इसके बाद कचरा गार्बेज क्लिनिक में लाया जाता है। यहाँ गीला कचरा खाद बनाने के लिए मशीनों में चला जाता है, वहीं सूखा कचरा 150 श्रेणियों में अलग किया जाता है, जिसे शाम होने से पहले स्क्रेप विक्रेता को बेच दिया जाता है। इस मॉडल को अपना कर नगरपालिका या नगर निगम अपने नगर के कचरा प्रबंधन में लगने वाले बजट का 80 प्रतिशत तक बचा सकते हैं," प्रवीण ने बताया।
प्रवीण का मानना है कि कचरा कहीं भी डंप नहीं होना चाहिए। इसका निस्तारण तत्काल किया जाना ज़रूरी है। इसीलिए प्रवीण ने इसे गार्बेज क्लिनिक का नाम दिया है। घरों से लाए गए कचरे का यहाँ सही तरीके से निस्तारण किया जाता है।
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प्रवीण ने अपने इस महत्वाकांक्षी प्रोजेक्ट की शुरुआत दिल्ली के शाहदरा स्थित एक म्यूनिसिपल वार्ड से की थी, जहाँ प्रतिदिन 25 मीट्रिक टन कचरा निकलता था। अपने विज़न और समुदाय के सहयोग से प्रवीण ने इस कचरे से 18 लाख रुपए कमा कर निगम को दिए। आज गार्बेज क्लिनिक कई जगहों पर सफलतापूर्वक चल रहे हैं, जैसे महाराष्ट्र के बीड, छत्तीसगढ़ के अंबिकापुर और नोएडा में सेक्टर -47 आदि में।
गार्बेज क्लिनिक 500 से 550 लोगों को सीधा रोज़गार देता है।
प्रवीण का कहना है कि हमने शहरों के भिखारियों,अकेली बेसहारा महिलाओं और कचरा बीनने वाले लोगों को एक महीने की ट्रेनिंग देकर उन्हें कचरा प्रबंधन में एक प्रोफेशनल के रूप में विकसित किया।
प्रवीण कचरे को सोने जैसा मूल्यवान मानते हैं और इस क्षेत्र में अपार संभावनाए देखते हैं। उन्होंने मेरठ स्थित चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी में वेस्ट मैनेजमेंट पर वोकेशनल कोर्सेस भी तैयार किए हैं। आने वाले महीनों में चौधरी चरण सिंह यूनिवर्सिटी देश की पहली यूनिवर्सिटी होगी, जो न सिर्फ वेस्ट मैनेजमेंट के लिए प्रोफेशनल तैयार करेगी, बल्कि स्वयं भी ज़ीरो वेस्ट पॉलिसी को अपनाएगी।
आजकल नायक दंपत्ति एक वेस्ट मैनेजमेंट एप्प को विकसित करने में जी-जान से जुटे हुए हैं। अगले कुछ माह में यह एप्प बाज़ार में उपलब्ध होगा। प्रवीण का दावा है कि यह एप्प कचरा संबंधी हर समस्या का वन स्टॉप सॉल्यूशन होगा। इसे जीपीएस से भी मॉनिटर किया जा सकेगा। प्रवीण की भविष्य की योजना वेस्ट मैनेजमेंट को सस्टेनेबिलिटी से जोड़ने की है। साथ ही, गीले कचरे से तैयार खाद को किसान तक और किसान द्वारा उपजाई गई ऑर्गेनिक सब्ज़ियों को आपके घरों तक पहुँचाने की है।
कैसे जुड़ा जा सकता है गार्बेज क्लिनिक के साथ
गार्बेज क्लिनिक के साथ जुड़ना बहुत ही आसान है। यह कम्युनिटी बेस्ड प्रोग्राम है, जो घरों से शुरू होकर गली-मुहल्ले और सोसाइटी से होता हुआ शहर भर को एक सूत्र में बांधता है। हम जहाँ भी गार्बेज क्लिनिक की स्थापना करते हैं, वहाँ के स्थानीय लोगों को ही प्रशिक्षित करते हैं। जिन सोसाइटियों में ऑर्गेनिक खाद बनाने के उपकरण लगाने की जगह होती है, हम उनके गीले कचरे का निस्तारण वहीं कर देते हैं। ये उपकरण इतने सरल और छोटे होते हैं कि उनके लिए ज्यादा जगह की ज़रूरत भी नहीं पड़ती है। जहाँ स्थान की कमी होती है, वहाँ से हम कचरे को गार्बेज क्लिनिक तक उठा कर लाते हैं और फिर उसका निस्तारण किया जाता है। अपनी भविष्य की योजनाओं को लेकर प्रवीण बहुत आशान्वित हैं। वह कहते हैं कि हम सस्टेनेबिलिटी का एक ऐसा मॉडल लेकर आ रहे हैं, जिसमें आपके दरवाजे से उठाया गया कचरा ऑर्गेनिक खाद के रूप में किसान तक पहुँचेगा और किसान द्वारा उगाई गई केमिकल रहित सब्जियां आप की रसोई तक पहुँचेंगी। इसे नाम दिया गया है फार्मर्स क्लिनिक।
लेखक - कायनात क़ाज़ी
संपादन - मनोज झा
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