Search Icon
Nav Arrow

‘गाँधी बूढ़ी’: तीन गोली खाने के बाद भी नहीं रुके थे इस 71 वर्षिया सेनानी के कदम!

अपने आख़िरी पलों में भी देश की इस महान बेटी ने झंडे को गिरने नहीं दिया और उनकी जुबां पर दो ही शब्द थे, ‘वन्दे मातरम’!

हात्मा गाँधी और स्वतंत्रता के लिए उनके संघर्ष से भारतीय तो क्या बल्कि विदेशों में रहने वाले लोग भी भली-भांति परिचित हैं। बचपन से ही हम सब गाँधी जी के किस्से और कहानियाँ पढ़ते-सुनते हुए बड़े हुए हैं। लेकिन शायद ही कोई हमारे देश की ‘गाँधी बूढ़ी’ के बारे में जानता हो।

यह कहानी है भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में देश के लिए अपने प्राणों की आहुति देने वाली वीरांगना, मातंगिनी हाजरा की, जिन्हें ‘गाँधी बूढ़ी’ या फिर ‘ओल्ड लेडी गाँधी’ के नाम से जाना जाता है।

मातंगिनी हाजरा की प्रतिमा (साभार)

मातंगिनी हाजरा का जन्म 19 अक्टूबर 1870 को पूर्वी बंगाल (वर्तमान बांग्लादेश) में मिदनापुर जिले के होगला गाँव में एक गरीब किसान परिवार में हुआ। गरीबी के कारण 12 वर्ष की आयु में ही उनका विवाह 62 वर्षीय विधुर त्रिलोचन हाजरा से कर दिया गया। विवाह के छह साल में ही उनके पति की मौत हो गई और इसके बाद 18 साल की मातंगिनी अपने मायके लौट आई।

Advertisement

यह भी पढ़ें: गाँधीजी का वह डाइट प्लान जिसे सुभाष चंद्र बोस ने भी अपनाया!

हमेशा से ही स्वतंत्रता सैनानियों के बारे में सुनने-जानने में दिलचस्पी रखने वाली मातंगिनी कब एक सेनानी बन गई, शायद उन्हें खुद भी पता नहीं चला। लेकिन साल 1905 से उन्होंने सामने आकर गाँधी जी के आंदोलनों में भाग लेना शुरू किया। मिदनापुर का नाम यहाँ से स्वतंत्रता संग्राम में भाग लेने वाली महिलाओं के चलते इतिहास में दर्ज है और मातंगिनी उनमें से एक हैं।

मातंगिनी ने गाँधी जी की सीखों को अपने जीवन का हिस्सा बना लिया था। वह खुद अपना सूत कातती और खादी के कपड़े पहनती थीं। इसके अलावा, वह हमेशा लोगों की सेवा करने के लिए तत्पर रहती थीं। जनसेवा और भारत की आज़ादी को ही उन्होंने अपने जीवन का लक्ष्य बना लिया था।

Advertisement
मातंगिनी का जन्म-स्थल, उनकी याद में ये घर बनाया गया है (साभार)

कहते हैं 1932 में गाँधी जी के नेतृत्व में देश भर में स्वाधीनता आन्दोलन चला। वन्दे मातरम् का घोष करते हुए जुलूस प्रतिदिन निकलते थे। जब 26 जनवरी 1932 को ऐसा एक जुलूस मातंगिनी के घर के पास से निकला, तो वे भी उस जुलूस के साथ चल दीं। तामलुक के कृष्णगंज बाजार में पहुँचकर एक सभा हुई। वहाँ मातंगिनी ने सबके साथ स्वाधीनता संग्राम में तन, मन, धन से संघर्ष करने की शपथ ली।

उसी साल, मातंगिनी ने अलीनान नमक केंद्र पर नमक बनाकर, ब्रिटिश सरकार के नमक कानून की अवहेलना की। इसके लिए उन्हें ब्रिटिश पुलिस ने गिरफ्तार किया और उस समय उनकी उम्र 62 साल थी। जेल से रिहाई के बाद भी मातंगिनी अपने लक्ष्य पर डटी रहीं। उन्होंने एक पल के लिए भी स्वतंत्रता संग्राम को छोड़ने के बारे में नहीं सोचा।

यह भी पढ़ें: गाँधी जी के साथ 180 किलोमीटर मार्च कर, इस महिला स्वतंत्रता सेनानी ने छेड़ी थी अंग्रेज़ों के खिलाफ़ जंग!

Advertisement

इतना ही नहीं, साल 1933 में जब सेरमपुर (इसे श्रीरामपुर भी कहा जाता है) में कांग्रेस के अधिवेशन में ब्रिटिश सरकार ने लाठीचार्ज किया तो उन्हें काफ़ी चोटें भी आयीं। उस उम्र में भी, अपने दर्द को सहते हुए उन्होंने हमेशा भारत के बारे में ही सोचा। जब बंगाल के तत्कालीन ब्रिटिश गवर्नर, जॉन एंडरसन यहाँ दौरे पर आए, तो उन्होंने उनके सामने जाकर उन्हें काले झंडे दिखाएं और अपना विरोध प्रकट किया।

इसके बाद भी उन्हें बहरमपुर जेल में छह महीने की कैद मिली। इन कारावास और जेल की यातनाओं ने मातंगिनी के इरादों को और मजबूत किया।

1935 में तामलुक क्षेत्र, भीषण बाढ़ के कारण हैजा और चेचक की चपेट में आ गया। वे अपनी जान की परवाह किये बिना राहत कार्य में जुट गई। फिर साल 1942 में जब गाँधी जी ने भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया तो मातंगिनी इस आंदोलन की मुख्य महिला सेनानियों में से एक बनकर उभरीं।

Advertisement
29 सितंबर 1942 को हुई घटना पर आधारित एक पेंटिंग (साभार)

29 सितंबर 1942 को उन्होंने 6,000 लोगों की एक रैली का नेतृत्व किया और तामलुक पुलिस चौकी को घेरने के लिए निकल पड़ीं। लेकिन जैसे ही वे लोग सरकारी डाक बंगला पहुंचे तो पुलिस ने इन क्रांतिकारियों को रोकने के लिए दमनकारी नीति शुरू कर दीं।

ब्रिटिश पुलिस अफ़सरों ने निहत्थे लोगों पर गोलियाँ चलाई। मातंगिनी एक चबूतरे पर खड़े होकर, अपने हाथ में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का झंडा लेकर नारे लगवा रही थीं, जब उनके बाएं हाथ में गोली लगी। फिर भी वह रुकी नहीं, बल्कि पुलिस स्टेशन की तरफ आगे बढ़ने लगीं।

यह भी पढ़ें: ‘मलकानगिरी का गाँधी’ जिससे डरकर, अंग्रेज़ों ने दे दी थी फाँसी!

Advertisement

उन्हें बढ़ता देखकर, पुलिस ने दो और गोलियाँ उन पर चलाई, जिनमें से एक उनके दूसरे हाथ में लगी और एक उनके सिर में। अपने आख़िरी पलों में भी देश की इस महान बेटी ने झंडे को गिरने नहीं दिया और उनकी जुबां पर दो ही शब्द थे, ‘वन्दे मातरम’!

मातंगिनी की याद में, तामलुक में उसी जगह उनकी प्रतिमा का अनावरण किया गया। वे पहली महिला सेनानी थीं, जिनकी प्रतिमा स्वतंत्र भारत में कोलकाता में लगाई गई। उनके नाम पर बहुत से स्कूल, कॉलोनी और मार्गों आदि का नामकरण भी हुआ है। फिर साल 2002 में, भारत छोड़ो आंदोलन के 50 साल पूरे होने के उपलक्ष्य में भारत सरकार ने उनके सम्मान में डाक टिकट भी जारी की।

वह स्थान जहाँ मातंगिनी ने अपनी आख़िरी साँस ली (बाएं), कोलकाता में लगी उनकी प्रतिमा (दाएं): साभार

मातंगिनी उन हज़ारों लोगों में से एक हैं, जिन्होंने देश की आज़ादी के लिए खुद को कुर्बान कर दिया, लेकिन उनकी कुर्बानी आज शायद ही किसी को याद है।

Advertisement

द बेटर इंडिया, देश की इस वीरांगना को सलाम करता है!

संपादन: भगवती लाल तेली


यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर व्हाट्सएप कर सकते हैं।

close-icon
_tbi-social-media__share-icon