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वाराणसी: इन बेटी और बहुओं ने मिलकर शुरुआत की है एक बदलाव की!

भी-कभी आपकी सच्ची भावनाएं काफी होती हैं, सैकड़ों वर्षों से चली आ रही रूढ़िवादी परम्पराओं को तोड़ने के लिए। हम सब जानते हैं कि हमारे समाज में सदियों से औरतों को अपने परिवारजनों का अंतिम संस्कार करने से दूर रखा जाता है। बहुत से परिवारों में, किसी की मृत्यु होने पर औरतें घर पर शोक करती हैं जबकि आदमी शमशान जाकर अंतिम संस्कार करते हैं।

हालाँकि, वाराणसी की निवासी पुष्पावती पटेल ने अपनी मां का अंतिम संस्कार कर इस परम्परा को तोडा है। लेकिन उसने ऐसा बहुत ही साधारण कारण के चलते किया – अपनी माँ की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए।

पुष्पावती के पिता बीस साल पहले निधन हो गया था।

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तब उनकी माँ संतोरा देवी ने कहा था कि समय आने पर उनका अंतिम संस्कार उनकी इकलौती बेटी करे।

उन्होंने अपने परिवार को उनके मरने बाद उनकी आँखे दान करने के लिए भी कहा था।

22 जुलाई को संतोरा देवी का निधन हो गया, और पुष्पावती अपनी माँ की 20 वर्षीय पुरानी इच्छा पूरी करने के लिए दृढ़ थीं। हालांकि, उन्हें पड़ोसियों और रिश्तेदारों से बहुत प्रतिरोध का सामना करना पड़ा, जिन्होंने कहा कि मृतकों के शरीर को घाट में ले जाने या अंतिम संस्कार करने में महिलाओं ले लिए कोई जगह नहीं है।

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पर पुष्पावती ने किसी की भी नहीं सुनी। उनके दोनों भाई, बाबूलाल और त्रिभुवन ने भी उनका पूरा साथ दिया।

अपनी नन्द को अपनी माँ की आखिरी इच्छा पूरी करने के लिए लड़ता देख बबूलाल और त्रिभुवन की पत्नियां भी पुष्पावती के साथ अपनी सास के मृत शरीर को शमशान घाट तक लेकर गयीं।

वाराणसी का शमशान घाट (प्रतीकात्मक तस्वीर)

आज तक से बात करते हुए पुष्पावती ने बताया कि वह केवल अपनी माँ की अंतिम इच्छा पूरी कर रही थी। उनके भाइयों ने कहा कि उन्हें अपनी बहन पर गर्व है, जो अपने फैसले पर डटी रही।

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संतोरा देवी के परिवार ने उनकी आँखे दान कर, उनकी दूसरी इच्छा का भी मान रखा है।

संतोरा देवी के इस बीस वर्षीय प्रण के चलते उनके परिवार में औरतों को रूढ़िवादी परम्परा को तोड़ने का हक़ मिला और किसी जरूरतमंद को आँखों की रोशनी मिली है।

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मूल लेख: तन्वी पटेल


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