गांववालों ने जिसे ‘पागल’ कहा, उसी ने बायो-फेंसिंग बनाकर की उनके खेतों की रक्षा

Jagan Prahlad Bagade: Cactus Man

महाराष्ट्र के रहने वाले जगन प्रह्लाद बागड़े को 'कैक्टस मैन' के नाम से भी जाना जाता है। उनके खेतों पर जंगली जानवर और कीट अक्सर हमला किया करते थे जिससे भारी नुकसान होता था। इस गंभीर समस्या को देखते हुए वह एक एनवायरनमेंट फ्रेंडली और कम लागत वाला समाधान लेकर आए हैं।

सोचिए अगर हर खेत के चारों ओर एक ऐसा बाड़ जो हर दिन बढ़ता रहता है और खेत को जंगली जानवरों और भेड़-बकरियों से बचाता है। यह फसल को पेस्ट अटैक और बारिश से सुरक्षित रखता है और मिट्टी की सेहत को बनाए रखने में मदद करता है। कुछ ऐसी ही कल्पना को महाराष्ट्र के अकोला जिले के खापरवाड़ी बुद्रुक गांव के रहने वाले जगन प्रह्लाद बागड़े ने, सच में बदल दिया है।  उन्होंने अपने 30 एकड़ के खेत के चारों तरफ़ एक बायो फेंस या बाड़ लगाया है जो पूरी तरह से जंगली कैक्टस (जिसका स्थानीय नाम निवडुंग है) से बना है। बागड़े द्वारा बनाया गया यह बाड़ अब 12 फीट तक बढ़ गया है।

बायो फेंसिंग को लाइव फेंसिंग के नाम से भी जाना जाता है। यह खेत के चारों तरफ़ एक लाइन में लगाए गए पेड़ या झाड़ियां होती है। लकड़ी, कांटेदार तार, या पत्थर की चिनाई से बने बाड़ की तुलना में यह कम ख़र्च में ज़्यादा मज़बूत और काम की होती है। इसे जैविक और पर्यावरण के लिए अच्छा तरीक़ा भी माना जाता है।

बागड़े के खेतों की बॉउंड्री पर लगे कैक्टस, यूफोरबिया लैक्टिया है, जो भारत में  उगाए जाते हैं। यह कांटेदार और छोटी रीढ़ के साथ रसीली शाखाओं वाली एक सीधी झाड़ी है, जो ऊंचाई में 16 फीट तक बढ़ सकता है।

पहले लोग मुझे पागल समझते थे: बागड़े

43 वर्षीय बागड़े याद करते हुए बताते हैं कि जब उन्होंने अपने खेत की बॉउंड्री पर कैक्टस की कटिंग लगाना शुरू किया तो लोग उनपर हंसते थे। वह कहते हैं, “लोग मुझे मूर्ख कहते थे। उन्होंने कहा वेड झाला आहे (वह पागल है)।” लेकिन लोगों की बातों की परवाह किए बिना बागड़े अपने काम में लगे रहे। सात साल बाद उनके खेत कैक्टस से पूरी तरह घिर गए।

बागड़े को अब ‘कैक्टस मैन’ के नाम से जाना जाता है। उन्हें अक्सर लोकल एग्रीकल्चरल अधिकारियों द्वारा बायो फेंस लगाने के फ़ायदे और सही तरीक़े के बारे में, किसानों को संबोधित करने के लिए बुलाया जाता है।

बागड़े की बायो फेंसिंग की खूबियां जल्द की दूसरे किसानों को भी समझ में आने लगीं। सबसे पहले लगभग 30 किसानों ने अपने खेतों की बॉउंड्री पर कैक्टस लगाए। और जैसे ही मैसेजिंग ऐप के ज़रिए यह बात फैली, राज्य के अलग-अलग हिस्सों से कई किसान बायो फेंसिंग के बारे में जानने के लिए बागड़े से मिलने आने लगे और उनसे कैक्टस कटिंग लेकर गए।

एक बायो फेंस के कई फ़ायदे 

पंजाबराव देशमुख बायोलॉजिकल मिशन के तालुका अध्यक्ष होने के नाते, बागड़े ने बायोलॉजिकल पेस्टीसाइड्स के प्रोडक्शन, आधुनिक उपकरणों के इस्तेमाल और जल संरक्षण गतिविधियों में ग्रामीणों को शामिल करने की पहल की। सालों से बंजर पड़ी ज़मीन को लोकल एग्रीकल्चरल डिपार्टमेंट की मदद से खेती के लिए तैयार किया गया है। कॉन्टूर बंडिंग, कम्पार्टमेंट बंडिंग, ढलानों पर क्षैतिज तरीक़े से बीजों को बोने जैसे कामों में किसान कुशल हो रहे हैं।

मई 2018 में, गाँव वालों ने 19 फार्म पॉन्ड्स खोदे, जिसके बाद वहाँ तालाब की कुल संख्या 70 हो गई है। इसके अलावा उन्होंने 1 किमी लंबे नाले को खाली किया और 150 एकड़ में कॉन्टूर बंडिंग को पूरा किया, जिससे ग्राउंडवॉटर लेवल 30 फीट से बढ़कर 10 फीट हो गया।

सबसे ख़ास बात यह है कि खारा पानी अब पीने लायक पानी में बदल गया है। 

लेकिन 2007 से, जब सिर्फ़ 35 किमी दूर वारी हनुमान डैम से पीने का पानी आसानी से मिलने लगा है, तब से गाँव वालों को लगता है कि जंगली जानवरों की आबादी बढ़ गई है।

कैसे आया बायो फेंस का आईडिया?

सालों तक बागड़े जैसे किसानों को जंगली जानवरों से जूझना पड़ता था और अक्सर जानवरों को वे पटाखों या हवाई बंदूकों से डराते थे। लेकिन ऐसा तब तक ही हुआ करता था, जब तक उन्होंने सोशल मीडिया पर बढ़ते कैक्टि के बारे में वीडियो नहीं देखा था।

बागड़े बताते हैं, ”मैंने हर कटिंग के बीच एक फुट की दूरी रखी है। कांटेदार कैक्टस की वजह से जंगली जानवर खेतों में घुसने की हिम्मत नहीं करते हैं।”

कई पशु-पक्षी इस बायो फेंस में घर बनाकर रहते हैं। इसके अलावा भी यह कई तरह से काम में आता है जैसे कि इससे चारा, फर्टिलाइज़र मिलता है और यह विंडब्रेकर की तरह काम करता है। साथ ही ये बायो डायवर्सिटी संरक्षण में मदद करता है और कार्बन डाइऑक्साइड जैसी जलवायु-उत्प्रेरण गैसों को अब्सॉर्ब करता है।

बायो फेंस विंडब्रेकर का काम तो करता ही है, बागड़े बताते हैं, “इसके अलावा, गिरे हुए पत्ते मिट्टी की नमी को बनाए रखते हैं, जिससे मेरे खेत में नमी बरकरार रहती है।”

ख़र्च को कम करता है बायो फेंस

वह आगे कहते हैं, “शुरू में मैंने एक एकड़ में कांटेदार तार की बाड़ लगाई थी, जिसकी लागत 40,000 रुपये थी, लेकिन जल्द ही मुझे एहसास हुआ कि पूरे खेत में बाड़ लगाने के लिए तो मुझे अपने खेत का कुछ हिस्सा बेचना पड़ेगा।”

बागड़े किसान के तौर पर अपनी सफलता और अपनी रिकॉर्ड तोड़ फ़सल का श्रेय बायो फेंस को देते हैं। पिछले साल उन्होंने 33 क्विंटल हॉर्स ग्राम (एक हेक्टेयर में), 8 क्विंटल सोयाबीन (एक एकड़) और 12 क्विंटल कपास (एक एकड़) की बढ़िया फसल उगाई। इस उपलब्धि के लिए जिला अधिकारियों ने उन्हें सम्मानित किया था। बागड़े कहते हैं, “पिछले कुछ सालों में फसल की पैदावार लगभग तीन गुना हो गई है।”

यहाँ कैक्टस किसी भी ज़मीन या सामान्य जगहों पर ऐसे ही उगता रहता है। बागड़े एक ट्रैक्टर भरकर इसे लेकर आए और लगभग एक एकड़ में लगा दिया। वह कहते हैं, “मैंने कैक्टि लगाने के लिए 15,000 रुपये ख़र्च किए होंगे, जिसमें ज़्यादा तो लेबर में गया था।”

अकोट तालुका में खेत पर अक्सर जंगली सुअर, नीलगाय, हिरण और बंदर हमला करते हैं और खड़ी फसलों को नष्ट कर देते हैं। बागड़े कहते हैं, “हिरणों की आबादी पिछले कुछ सालों में काफ़ी बढ़ी है। वे एक बड़ा ख़तरा हैं और अक्सर 25-30 के झुंड में खेतों पर हमला करते हैं। लेकिन बाड़ लगाने के बाद से अब ऐसी घटनाएं कम होने लगी हैं।”

कई किसानों को किया प्रेरित

कैक्टस की बाड़ लगाने के बारे में, बागड़े सलाह देते हैं कि कम से कम 2 फीट ऊंचाई की कटिंग लगाएं और अगर ठीक से फर्टिलाइज़र दिया जाए तो एक-दो साल में इसकी ऊंचाई 5 फीट तक जा सकती है।

अकोट तालुका के एग्रीकल्चर ऑफिसर सुशांत शिंदे कहते हैं, “बागड़े एक प्रगतिशील किसान हैं, जिन्होंने सॉयल कंज़र्वेशन और ग्राउंड रिचार्ज और कंज़र्वेशन जैसी गतिविधियों में आगे आकर बहुत बड़ी भूमिका निभाई है। बायो फेंस में बागड़े की सफलता ने तालुका के बाकी किसानों को भी प्रेरित किया है।”

जगन प्रह्लाद बागड़े बायो फेंस से मिले फ़ायदों से काफ़ी खुश हैं। वह अंत में कहते हैं, “मैं कैक्टि की बदौलत अब करेला, चिचिड़ा और कई तरह की बीन्स उगा सकता हूँ।”

मूल लेख – हिरेन कुमार बोस

संपादन – भावना श्रीवास्तव

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