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गुजरात: सहजन की खेती व प्रोसेसिंग ने दीपेन शाह को बनाया लखपति किसान

गुजरात के किसान दीपेन शाह को सहजन के क्षेत्र में उम्दा काम करने के लिए कृषि पुरस्कार, जगजीवन राम अवॉर्ड से भी नवाज़ा गया है!

आज हम आपको एक ऐसे किसान की कहानी से रूबरू करवा रहे हैं, जो जैविक तरीके से मोरिंगा (सहजन) की खेती के साथ फसल की प्रोसेसिंग भी कर रहे हैं। खेती में तकनीक के इस्तेमाल से यह किसान सालाना 30 से 40 लाख रुपये कमा रहा है।

गुजरात में अनाना जिला के कुंजराव गाँव में रहने वाले दीपेन कुमार शाह को सहजन की जैविक खेती और इसके वैल्यू एडिशन में नवाचारों के लिए जगजीवन राम सम्मान सहित कई कृषि पुरस्कारों से नवाज़ा जा चुका है।

दीपेन ने अपनी इस यात्रा के बारे में द बेटर इंडिया को विस्तार से बताया। उन्होंने कहा कि 1997 में 12वीं की पढ़ाई पूरी करने के बाद से ही वह खेती करने लगे। वह कहते हैं, “मेरे पास 20 एकड़ जमीन है। पिताजी के साथ मैं टमाटर, मिर्च जैसे सब्जियों के अलावा तम्बाकू की भी खेती करता था। बाकी किसानों की तरह हम भी खेत में रसायन का उपयोग करते थे लेकिन लगातार मंडी और कृषि मेले में जाने की वजह से मुझे जैविक खेती के संबंध में कई नई जानकारी मिली।”

साल 2009 में उन्होंने तय किया कि वह धीरे-धीरे जैविक खेती की तरफ बढ़ेंगे लेकिन जैविक खेती भी तभी सफल थी जब सही मार्गदर्शन मिले। खासतौर पर, सब्जियों में जैविक खेती से शुरुआत में अच्छी उपज लेना काफी मुश्किल था। ऐसे में वह ऐसी कोई फसल उगाने के बारे में सोचने लगे जो जैविक तरीकों से जल्दी कामयाब हो सके।

Dipen Kumar Shah

“मैं सब्जी लेकर मंडी गया था और वहाँ पर मैंने सहजन बेचने आए किसानों को देखा। यह 2010 की बात है। मैंने देखा कि उन्हें काफी अच्छा दाम मंडी से मिल रहा था। किसानों से बात करके पता चला कि सहजन को उगाना आसान है और यह गर्म इलाकों में अच्छा उत्पादन देता है। बस उसी वक़्त मैंने तय किया कि इस खेती में हाथ आज़माना है,” उन्होंने कहा।

घर-परिवार में उन्होंने सबको राजी किया कि कुछ ज़मीन पर उन्हें एक्सपेरिमेंट करना चाहिए। उनके आत्मविश्वास को देखकर उनके पिता ने उन्हें 5 एकड़ ज़मीन पर सहजन लगाने की अनुमति दे दी। शुरूआती साल से ही, उन्हें सहजन की अच्छी उपज मिल गई और बाज़ार में भी अच्छा दाम मिला। साथ ही, उनकी लागत भी कोई ज्यादा नहीं आई। वह बताते हैं कि सहजन गर्मियों में काफी अच्छी होती है और इसके बाद, जिन भी जगहों पर थोड़ी नमी या फिर बारिश आदि का मौसम रहता है, वहाँ इसका उत्पादन नहीं होता।

“इसलिए गुजरात का मौसम इसके लिए हमेशा अच्छा है। यहाँ पर हम उस मौसम में भी सहजन की फसल लेते हैं, जब दूसरे राज्यों में इसका बहुत ही कम उत्पादन होता है। सर्दी में तो हमें इसका अच्छा बाजार मिल जाता है लेकिन गर्मी में इसकी कीमत कम हो जाती है क्योंकि यह सब जगह होती है। ऐसे में फसल बेचने में परेशानी आने लगी,” दीपेन ने आगे कहा।

Drumstick

दीपेन ने इस समस्या का समाधान तलाशना शुरू किया कि आखिर ऐसा क्या किया जाए कि पूरे साल उन्हें सहजन की खेती से फायदा हो। इसके लिए उन्होंने अलग-अलग जगहों से पता करके कई एक्सपेरिमेंट भी किए। सबसे पहले उन्हें अपने किसी रिश्तेदार से पता चला कि बाहर देशों में सहजन की फलियों को छोटा-छोटा काटकर एक टिन के डिब्बे में पानी और नमक के घोल में पैक किया जाता है। इसे फलियों की कैनिंग करना कहते हैं। उन्होंने भी यह ट्राई करके बेचने की कोशिश की लेकिन इसमें मेहनत और लागत दोनों ही बहुत ज्यादा थी।

“2012-13 में सहजन को लेकर बहुत ज्यादा जागरूकता भी नहीं थी। मुझे हर कोई यही सलाह देता कि अब मुझे सहजन को निकालकर किसी और खेती पर ध्यान देना चाहिए। इसकी वैल्यू एडिशन के लिए मैं काफी पैसे भी लगा चुका था लेकिन कामयाबी नहीं मिल रही थी,” उन्होंने आगे बताया।

दीपेन ने सोचा कि जब हल्दी, मिर्च आदि का पाउडर बनाया जा सकता है तो सहजन की सूखी हुई फलियों का भी पाउडर बन सकता है। उन्होंने ग्राइंडर मिक्सर में फलियों को पीसकर पाउडर बनाया। इन फलियों को सांबर आदि बनाने में इस्तेमाल किया जाता है, दीपेन ने अपने घर में दाल, राजमा आदि में इस पाउडर को डालने के लिए कहा। उन्होंने महसूस किया कि सहजन का पाउडर डालने से दाल और सब्ज़ियों का स्वाद बढ़ गया।

उनके कुछ जानने वालों ने भी यह ट्राई किया और सबसे अच्छा रिस्पांस मिला। इस पाउडर को लेकर वह आनंद एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी पहुँचे और वहाँ इसकी न्यूट्रीशन वैल्यू निकाली गई। “मुझे आज भी याद है कि वहाँ पर एक्सपर्ट्स ने कहा था कि आपने ‘देसी पॉवरहाउस’ बनाया है। इसके आगे सभी तरह के सप्लीमेंट फेल हैं,” दीपेन ने कहा।

हालांकि, उनकी समस्या यहीं खत्म नहीं हुई। एक गाँव का साधारण किसान आखिर कैसे और कहाँ तक इसकी मार्केटिंग करता। लेकिन दीपेन ने हिम्मत नहीं हारी। और कहते हैं ना कोशिश करने वालों की हार नहीं होती।

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साल 2013 में एक बार फिर वह अपने इस नए प्रोडक्ट को लेकर आनंद के कृषि मेला पहुँच गए। वहाँ राज्य के तत्कालीन मुख्यमंत्री और अन्य कुछ प्रशासनिक अधिकारी भी आए थे। मुख्यमंत्री ने सभी किसानों की फसलों को देखा लेकिन वहाँ दीपेन ऐसे किसान थे जो फसल नहीं बल्कि वैल्यू एड करके प्रोडक्ट लेकर गए थे। सभी ने उनकी स्टॉल पर आकर इसके बारे में जानना चाहा। “मैंने बताया कि यह सहजन का पाउडर है और इसमें लगभग 22 पोषक तत्व हैं। हमारे देश में सहजन इतना ज्यादा होता है लेकिन फिर भी बच्चे कुपोषण का शिकार हैं और यह सब मैं यूँ ही नहीं कह रहा था। मेरे पास यूनिवर्सिटी के एक्सपर्ट्स की रिपोर्ट थी,” उन्होंने आगे कहा।

Meeting the then CM of Gujarat

इस कृषि मेले के लगभग एक महीने बाद से ही दीपेन को गुजरात सरकार की तरह से सहजन के पाउडर की प्रोसेसिंग और मार्केटिंग करने में मदद मिल गई। सभी स्कूल-कॉलेज और जंगली इलाके में सहजन के पेड़ लगाने और इसे लोगों की डाइट में शामिल करने पर काम होने लगा। इस सबके लिए दीपेन की मदद ली गई और साथ ही, उनकी प्रोसेसिंग यूनिट सेट-अप करने में भी मदद मिली। वह कहते हैं कि उन्हें बिल्कुल भी यकीन ही नहीं हुआ कि मात्र एक साल में उनकी तस्वीर बदल गई।

साल 2015 में उनके अपने खेतों पर प्रोसेसिंग यूनिट बनकर तैयार थी। उन्होंने खुद एक वर्कशॉप से अपनी निगरानी में सहजन की फलियों और पत्तों की प्रोसेसिंग के लिए मशीन बनवाई। प्रोसेसिंग यूनिट सेट-अप करने के साथ-साथ उन्होंने सहजन की खेती 5 एकड़ से बढ़ाकर 12.5 एकड़ में शुरू कर दी। अब वह आसपास के इलाकों के किसानों से भी सहजन खरीदते हैं। जिस सीजन में किसानों को बाज़ार में अच्छा दाम नहीं मिलता, वह उस फसल को दीपेन कुमार को दे देते हैं।

इस तरह से किसानों को दोनों सीजन में बराबर का मुनाफा हो जाता है। उनकी प्रोसेसिंग यूनिट से लगभग 80 किसान जुड़े हुए हैं। हर साल वह लगभग 15 हज़ार किलो सहजन की फलियों और इसके पत्तों का पाउडर बनाते हैं। फ़िलहाल, वह सिर्फ इन्हीं दो प्रोडक्ट्स पर काम कर रहे हैं और कुछ अन्य प्रोडक्ट्स की रिसर्च चल रही है।

Moringa and Drumstick Powder

इन प्रोडक्ट्स को वह 200 और 250 ग्राम के डिब्बों में पैक करते हैं। हर साल 60 हज़ार से भी ज्यादा डिब्बे वह बेचते हैं, जो सीधा ग्राहकों, कुछ स्टोर मालिकों तो कुछ आयुर्वेदिक कंपनियों को जाते हैं। उन्होंने अपने माता-पिता के नाम, पुष्प और मुकुंद के नाम को जोड़कर ‘पुष्पम’ नाम बनाया और इसे ही अपना ब्रांड नाम, पुष्पम फूड्स रखा।

उनकी प्रोसेसिंग यूनिट से पूरे साल लगभग 10-12 लोगों को रोज़गार भी मिलता है। इसके अलावा, साल के जिन तीन महीनों में खेतों में कोई खास काम नहीं होता और मजदूरों के पास रोज़गार नहीं होता, उस समय उनकी प्रोसेसिंग यूनिट में काफी काम रहता है। इन तीन महीनों के लिए वह लगभग 70 मजदूरों को रोजगार देते हैं।

सहजन की प्रोसेसिंग तकनीक पर भी उनका पेटेंट हैं और उनके पास एक्सपोर्ट करने का लाइसेंस भी है। फ़िलहाल, वह सहजन की प्रोसेसिंग के ज़रिए सालाना 30-40 लाख रुपये तक की कमाई कर पाते हैं। आगे उनका उद्देश्य इसके और भी प्रोडक्ट्स बाज़ार में लाने का है।

He has won several awards

दीपेन का 15 किलो सहजन के पाउडर से 15 हज़ार किलो तक सहजन पाउडर बनाने का सफर बिल्कुल आसान नहीं था लेकिन उन्हें खुद पर भरोसा था। इसलिए वह बाकी किसानों से भी वह यही कहते हैं कि छोटे से छोटा किसान भी आज के जमाने में प्रोसेसिंग के ज़रिए अच्छा कमा सकता है।

“जब मैं अपनी पहचान बनाने में जुटा था तब सोशल मीडिया का भी बोलबाला नहीं था और न ही इंटरनेट और स्मार्ट फ़ोन की ज्यादा सुविधा थी। लेकिन अब आपको गाँव में भी व्हाट्सअप, फेसबुक और गूगल की जानकारी रखने वाले लोग मिल जाएंगे। किसानों को आगे बढ़ने के लिए इस तकनीक का भरपूर उपयोग करना चाहिए और फसलों के वैल्यू एडिशन पर ध्यान देना चाहिए। मुश्किलें हर काम में आपको मिलेंगी लेकिन आप उन्हें पार करते हैं या हार मान लेते हैं, यह आपके ऊपर है,” उन्होंने अंत में कहा।

दीपेन कुमार शाह से संपर्क करने के लिए आप यहाँ क्लिक करें!

यह भी पढ़ें: किसान का जंगल मॉडल: पौने एकड़ में लगाए 54 निम्बू, 133 अनार, 170 केले और 420 सहजन


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Written by निशा डागर

बातें करने और लिखने की शौक़ीन निशा डागर हरियाणा से ताल्लुक रखती हैं. निशा ने दिल्ली विश्वविद्यालय से अपनी ग्रेजुएशन और हैदराबाद विश्वविद्यालय से मास्टर्स की है. लेखन के अलावा निशा को 'डेवलपमेंट कम्युनिकेशन' और रिसर्च के क्षेत्र में दिलचस्पी है.

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