लखनऊ की एक सड़क पर, जहाँ लोग अक्सर बिना रुके गुज़र जाते हैं,
वहीं 84 साल के इश्तियाक अली लकड़ी में आस्था को आकार देते हैं।
उनके पास न कोई बड़ी दुकान है, न औज़ारों की लंबी फेहरिस्त।
बस एक छैनी, एक चाकू और वो हुनर, जो समय से भी पुराना है।
आज़ादी से पहले जन्मे इश्तियाक अली की ज़िंदगी संघर्षों से तराशी गई है।
कभी सड़क पर करतब दिखाए, कभी बढ़ई बने, तो कभी गाड़ियाँ साफ़ कीं
हर काम सिर्फ़ इसलिए, ताकि घर में चूल्हा जलता रहे।
साल हो, मदार हो या अशोक लकड़ी बदलती रही, पर उनका जुनून नहीं।
धीरे-धीरे उनकी उँगलियों से बनी शिव, गणेश और बजरंगबली की मूर्तियाँ
लोगों के दिल तक पहुँचने लगीं।
हर मूर्ति के साथ वो सिर्फ़ भगवान नहीं गढ़ते, बल्कि मेहनत, एकता
और अपने काम के प्रति सच्ची निष्ठा की कहानी भी कहते हैं।
गुमनाम सितारे उन कलाकारों की आवाज़ है जिनकी पहचान नाम से नहीं,
हुनर से बनती है।
मदद के लिए संपर्क करें - LDA स्टेडियम के पास, अलीगंज, लखनऊ
8534045554
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