माइक्रोवेव के आने से सालों पहले से, माइक्रोवेव-सेफ बर्तन बना रहा है भारत का यह गाँव

Longpi Hampai Pottery

क्या आप जानते हैं कि मणिपुर में स्थित लोंगपी गांव के पारंपरिक शैली के बर्तन हमेशा से ही माइक्रोवेव-सेफ रहे हैं।

माइक्रोवेव आजकल बड़े शहरों ही नहीं छोटे शहरों और कस्बों में भी अपनी जगह बनाने लगा है। यही वजह है कि माइक्रोवेव-प्रूफ बर्तनों का भी चलन बढ़ने लगा है। अब किसी घर में माइक्रोवेव हो या न हो लेकिन लोग बर्तन ऐसे ही खरीदते हैं जो माइक्रोवेव सेफ हों, इस उम्मीद में कि कभी तो वे माइक्रोवेव खरीद ही लेंगे। लेकिन यहां आपको यह जानना जरूरी है कि भले ही माइक्रोवेव विदेशी तकनीक है लेकिन माइक्रोवेव प्रूफ बर्तन अपने यहां बरसों से बनते आ रहे हैं। आज हम आपको एक ऐसे ही बर्तन के बारे में बताने जा रहे हैं।

मणिपुर के मशहूर पारंपरिक काले बर्तन न सिर्फ इको फ्रेंडली हैं बल्कि माइक्रोवेव सेफ भी हैं। इन्हें दुनियाभर में लोंगपी हैम (Longpi Hampai) के नाम से जाना जाता है। इसकी वजह है कि ये बर्तन राज्य के उखरूल जिले के समीप स्थित दो गांव, लोंगपी खुल्लेन (Longpi Khullen) और लोंगपी कजुई (Longpi Kajui) में मिलने वाले खास पत्थर और मिट्टी के मिश्रण से बनाया जाता है। यह एक पारंपरिक शैली है, जिसमें बर्तनों को बनाने के लिए चाक का इस्तेमाल नहीं किया जाता है। बल्कि सांचों और औजारों की मदद से हाथ से ही बनाया जाता है। 

बताया जाता है कि यह कला बहुत ही ज्यादा पुरानी है और पीढ़ियों से मणिपुर की तांगखुल नागा जनजाति इन बर्तनों को बना रही है। बच्चे के जन्म या खास आयोजनों पर ही इस्तेमाल किए जाने वाले इन बर्तनों को एक जमाने में सिर्फ शाही घरानों के लोग ही खरीद पाते थे। इसलिए इन्हें ‘शाही बर्तन’ भी कहा जाता है। काले रंग के ये बर्तन न सिर्फ अपनी पारंपरिक शैली बल्कि अपने गुणों के कारण भी आज महानगरों और विदेशों में अपनी जगह बना रहे हैं। 

क्या है लोंगपी बर्तन की खासियत 

इन बर्तनों के निर्माण के लिए सर्पिल चट्टान को तोड़कर मिट्टी का रूप दिया जाता है। कई पीढ़ियों से इस कला से बर्तन बना रहे दिल्ली निवासी मैथ्यू ससा बताते हैं, “ये पत्थर लोंगपी गांव में नदी के किनारे बहुतायत में मिलते हैं। इनके चूरे में खास भूरे रंग की मिट्टी मिलाई जाती है। फिर पानी मिलाकर मिश्रण तैयार किया जाता है। मिट्टी को अच्छे से तैयार करने के बाद इससे बर्तन बनाए जाते हैं। ये काले रंग के होते हैं और देखने में सुंदर होने के साथ-साथ भोजन पकाने व स्टोर करने के लिए भी बहुत ही अच्छे होते हैं।”

Longpi Pottery
Making of Longpi (Source)

उन्होंने कहा कि इन बर्तनों को बिना चाक की मदद से बनाया जाता है। इसलिए बहुत अलग-अलग डिज़ाइन लोग बना सकते हैं। एक बार बर्तन जब बन जाता है तो इसे धूप में सुखाया जाता है। कुछ घंटों तक सुखाने के बाद इन्हें खुले में आंच पर सेका जाता है। लगभग सात घंटों तक आंच में सेंकने के बाद, बर्तनों को गर्म ही बाहर निकाल लिया जाता है। उनको माछी (Pasania pachyphylla) नामक एक स्थानीय पत्ते से घिस-घिस कर चिकना बनाया जाता है। 

मैथ्यू कहते हैं कि इस पूरी प्रक्रिया में छह दिन का समय लगता है। इन बर्तनों में बनाने में सभी प्राकृतिक चीजों का इस्तेमाल किया जाता है। किसी भी तरह का कोई रसायन इस्तेमाल नहीं होता है। इसलिए इन बर्तनों में खाना पकाना और स्टोर करना सेहत के लिए भी फायदेमंद माना जाता है। लोंगपी बर्तनों को मिट्टी के चूल्हे, गैस और माइक्रोवेव में भी इस्तेमाल किया जाता है। ये बर्तन पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल हैं। वह कहते हैं कि इन बर्तनों को गैस या चूल्हे से उतारने के बाद भी इनमें काफी समय तक खाना गर्म रहता है। आप लोंगपी शैली से बने कड़ाही, हांडी, केतली, कप, मग, ट्रे, फ्राइंग पैन आदि खरीद सकते हैं। 

विदेशों में भी बढ़ रही है मांग 

मैथ्यू मूल रूप से लोंगपी से हैं। उन्होंने अपने पिता से यह कला सीखी है। उनके पिता मचिहन ससा सालों से लोंगपी बर्तन बना रहे हैं। उन्होंने युवा पीढ़ियों को इस कला को सिखाने के लिए ‘ससा हैम पॉटरी ट्रेनिंग कम प्रॉडक्शन सेंटर’ भी शुरू किया था। लोंगपी कला के क्षेत्र में काम के लिए उन्हें 1988 में नेशनल अवॉर्ड सर्टिफिकेट और 2008 में शिल्प अवॉर्ड भी मिला है। 

Longpi Hampai Pottery
Karipots (Source)

मैथ्यू कहते हैं, “मैं स्कूल के समय से ही पिताजी के साथ यह काम कर रहा हूं। जब मैंने स्कूल पास किया तो मुझे एक बार उनके साथ दिल्ली में लगे इंटरनेशनल फेयर में आने का मौका मिला। मैंने देखा कि सिर्फ शहरों के लोग ही नहीं बल्कि विदेशी लोगों को भी हमारे उत्पाद बहुत पसंद आ रहे हैं।” मेला खत्म होने के बाद उन्हें मणिपुर लौटना था। तब मैथ्यू को लगा कि अगर उन्हें इस कला को आगे बढ़ाना है तो मणिपुर से बाहर निकलकर इसकी मार्केटिंग करनी होगी। इसलिए मैथ्यू ने अपने पिता से कहा कि वह दिल्ली में रहकर ही लोंगपी कला को आगे बढ़ाएंगे। उन्होंने दिन-रात मेहनत की और दिल्ली में ‘मैथ्यू ससा क्राफ्ट’ नाम से अपना आउटलेट शुरू किया। आज इस आउटलेट से वह न सिर्फ दिल्ली और आसपास के इलाकों के लोगों को बल्कि अमेरिका, कनाडा, जर्मनी, जापान जैसे देशों में भी ग्राहकों को लोंगपी बर्तन पहुंचा रहे हैं। 

उन्होंने बताया, “हमारी पारम्परिक शैली को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर काफी पहचान मिली है। आज मुझे कई एक्सपोर्ट हाउसेस, नेशनल एम्पोरियम आदि से ऑर्डर मिलते हैं। इसके अलावा, हर महीने अलग-अलग देशों से भी मुझे ऑर्डर मिलते हैं। विदेशियों को हमारे बर्तन बहुत ज्यादा पसंद आ रहे हैं। मुझे हर महीने तीन से चार लाख रुपए के ऑर्डर विदेशों से ही मिल रहे हैं।” 

आज देश में बहुत से लोग मिट्टी के बर्तनों के साथ-साथ लोंगपी बर्तनों का बिज़नेस भी कर रहे हैं। अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान मिलने के कारण आज बहुत से युवा इस काम से जुड़ रहे हैं। 

बेंगलुरु स्थित Zishta कंपनी दुबई, अमेरिका जैसे देशों में अपने उत्पाद पहुंचा रही है। तो लंदन स्थित डिज़ाइन स्टूडियो, Tiipoi ने बेंगलुरु में अपनी एक वर्कशॉप सेटअप की है। यह स्टूडियो भारत के कई क्राफ्ट्स को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दे रहा है। जिनमें लोंगपी बर्तन भी शामिल हैं। 

संपादन- जी एन झा

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