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कभी करते थे ऑफिस बॉय की नौकरी, पराली से प्लाइवुड बनाकर खड़ी कर दी करोड़ों की कंपनी

हम सब जानते हैं कि गेहूँ या धान की फसल की कटाई के बाद, बचनेवाली पराली को जलाने से कई राज्यों में वायु प्रदूषण की परेशानी बढ़ जाती है। इस परेशानी के समाधान के लिए सरकार ने कई कदम उठाए हैं। साथ ही, हर राज्य में स्थानीय प्रशासन किसानों से लगातार अनुरोध करता आ रहा है कि वे पराली न जलाएं। पर्यावरण को लेकर संवेदनशील रहने वाले लोग, सरकार और प्रशासन के इन अनुरोधों पर अमल कर रहे हैं। आज हम आपको एक ऐसे स्टार्टअप के बारे में बताने जा रहे हैं, जो पराली से प्लाइवुड बनाने का काम कर रहा है। 

हम बात कर रहे हैं चेन्नई स्थित स्टार्टअप, ‘Indowud Design Technology’ की। इस स्टार्टअप को चेन्नई के रहने वाले, 61 वर्षीय बी. एल. बेंगानी ने अपने बेटे, वरुण बेंगानी और बेटी, प्रियंका कुचेरिया के साथ मिलकर शुरू किया है। इस स्टार्टअप के जरिए वे ऐग्री-वेस्ट, जैसे- धान की पराली का इस्तेमाल करके प्लाइवुड बना रहे हैं। यह एक Natural Fibre Composite (NFC) बोर्ड है, जिसे फर्नीचर, होम डेकॉर या दूसरे सामान बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। यह बोर्ड लकड़ी के प्लाइवुड का एक इको फ्रेंडली और टिकाऊ विकल्प है। द बेटर इंडिया से बात करते हुए, बेंगानी ने अपने इस सफर के बारे में विस्तार से बताया।

बहुत छोटी थी शुरुआत 

बी.एल बेंगानी मूल रूप से राजस्थान से हैं। वह 1972 में अपने परिवार के साथ कोलकाता आ गए थे। उनके पिता, कोलकाता की एक जूट मिल में काम करते थे। वह बताते हैं, “उन दिनों हमारा रहन-सहन किसी लोअर मिडिल क्लास परिवार जैसा ही था। इसलिए मैंने 10वीं के बाद से ही काम करना शुरू कर दिया था। मैंने शाम की शिफ्ट वाले कॉलेज में दाखिला लिया और पढ़ाई के साथ-साथ, नौकरी भी करने लगा। सबसे पहले मैंने एक ऑफिस बॉय के तौर पर काम किया। तब मुझे हर महीने मात्र 100 रुपए मिलते थे। इसी तरह, कई जगह काम करते-करते, मैंने बीकॉम की डिग्री भी पूरी कर ली।”

B. L Bengani, Varun Bengani, and Priyanka Kucheria

साल 1987 में, बेंगानी चेन्नई आ गए और एक कंपनी में बतौर अकाउंटेंट काम करने लगे। बेंगानी ने बताया कि कई सालों तक अकाउंटेंट का काम करने के बाद, उन्हें एक प्लाइवुड कंपनी में मार्केटिंग का काम संभालने का मौका मिला। बेंगानी के दिल में हमेशा से ही अपना काम करने की चाह थी, इसलिए कुछ सालों तक प्लाइवुड इंडस्ट्री में काम करने के बाद, उन्होंने अपनी खुद की कंपनी खोलने का मन बनाया। इस राह में संघर्ष काफी था, लेकिन उन्हें खुद पर भरोसा था। उन्होंने कहा, “मुझे इस इंडस्ट्री के बारे में अच्छी जानकारी हो गयी थी। मुझे पता था कि अगर मैं सही तरीके से मेहनत करूँगा, तो मुझे सफलता जरूर मिलेगी। आखिरकार खुद पर विश्वास करके, मैंने यह जोखिम उठा ही लिया।”

साल 1997 में उन्होंने अपनी एक कंपनी शुरू की, जिसके तहत वह दूसरे देशों से हाई क्वालिटी प्लाइवुड बोर्ड लाकर बेचते थे। लेकिन, फिर उन्हें लगा कि उन्हें ये बोर्ड खुद बनाने चाहिए, इसलिए 2001 में उन्होंने अपनी खुद की फैक्ट्री भी लगायी। वह बोर्ड बनाने के लिए, बर्मा से रॉ मटेरियल मंगवाते थे।
उन्होंने आगे कहा, “साल 2010 से मेरा बेटा, वरुण भी कंपनी से जुड़ गया था। लेकिन, 2014 में किन्हीं वजहों से हमने इस बिज़नेस को छोड़कर, कुछ अलग करने का सोचा। इसलिए 2015 में, हमने किसी दूसरे निवेशक को अपनी कंपनी दे दी और खुद एक अलग स्टार्टअप पर काम करना शुरू किया। हमारी पहली कंपनी का टर्नओवर करोड़ों में था, लेकिन कुछ अलग करने की चाह में हमने एक नयी शुरुआत की।” 

वरुण कहते हैं कि ऐसा करने की सबसे बड़ी वजह, पर्यावरण के प्रति उनकी बढ़ती संवेदनशीलता थी। वे कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिससे प्लाइवुड बनाने के लिए, पेड़ों को न काटना पड़े। लगभग दो-ढाई साल की रिसर्च के बाद, आखिरकार उन्होंने लकड़ी के प्लाइवुड बोर्ड का रास्ता ढूंढ ही लिया।

पराली से बनाया प्लाइवुड बोर्ड 

Agri-waste to NFC Board

वरुण ने आगे बताया, “हमने काफी रिसर्च के बाद, नेचुरल फाइबर, ऐग्री-वेस्ट और कुछ दूसरे एडिटिव को मिलाकर, ये उच्च गुणवत्ता वाले NFC बोर्ड तैयार किए हैं। इन्हें प्लाइवुड की तरह ही घर, होटल, कैफ़े या दूसरी किसी भी जगह का फर्नीचर बनाने के लिए इस्तेमाल किया जा सकता है। सबसे बड़ी बात यह है कि हमने इन्हें बनाने के लिए किसी भी जीव-जंतु को कोई नुकसान नहीं पहुँचाया है। हमने सबकुछ प्रकृति के अनुकूल ही किया है। हम अहिंसा में विश्वास करते हैं और इसका पालन अपने काम-काज में भी करना चाहते हैं।” 

इको फ्रेंडली होने के साथ, NFC बोर्ड पूरी तरह से रिसायक्लेबल हैं। साथ ही, इन फर्नीचर में कभी भी दीमक नहीं लगेगी और न ही ये पानी से गलेंगे। इन्हें आसानी से कोई भी आकार दिया जा सकता है। आप इनसे अपने घर, गार्डन, कैफ़े, होटल, स्कूल, अस्पताल के लिए फर्नीचर बना सकते हैं। उन्होंने आगे कहा, “हमने सभी तरह के लैब टेस्ट और सर्टिफिकेट लेने के बाद ही, इसे बाजार में लॉन्च किया है। फिलहाल हम अलग-अलग डिस्ट्रीब्यूटर्स के साथ काम कर रहे हैं, जिन्हें हम NFC बोर्ड देते हैं और वे उत्पाद बनाने के लिए इन्हें आगे पहुंचाते हैं।” 

उनके NFC बोर्ड्स को इस्तेमाल करनेवाले डिज़ाइनर, जे. के. सुतार बताते हैं, “मैंने यह मटेरियल इस्तेमाल किया और इसकी गुणवत्ता बहुत ही अच्छी है। इन बोर्ड्स पर आसानी से कील लगायी जा सकती है। दूसरे मटेरियल की तुलना में हमें इनसे काफी अच्छे नतीजे मिले हैं।”
प्रियंका बताती हैं कि इस बारे में और जागरूकता फैलाने के लिए, वे आर्किटेक्चर्स और डिज़ाइनर्स के साथ काम कर रहे हैं। क्योंकि, उनके जरिए वे आम लोगों को भी NFC बोर्ड के बारे में बता सकते हैं, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग इसके बारे में जाने और फर्नीचर के काम के लिए पेड़ों पर अपनी निर्भरता कम करें।

One can make furniture and home decor from this

वह कहती हैं, “जब भी हम एक पेड़ काटते हैं, तो हम बहुत से जीवों से उनका घर छीनते हैं, इसलिए हमारी कोशिश रहती है कि हम जितना हो सके प्रकृति के अनुकूल काम करें। साथ ही, हमारी यह भी कोशिश है कि इस स्टार्टअप से किसानों को अतिरिक्त आय मिलती रहे।”

प्रियंका आगे कहती हैं कि फिलहाल वे धान मिलों से पराली खरीद रहे हैं, क्योंकि कोरोना महामारी और लॉकडाउन के कारण, उनके लिए अलग-अलग किसानों से जाकर मिलना संभव नहीं हो पा रहा है। लेकिन, आगे उनकी योजना है कि वे सीधा किसानों तक पहुंचकर, उनकी मदद करें। उनके साथ 40 लोगों की एक टीम काम कर रही है और उन्हें उम्मीद है कि साल 2022 तक उनकी इस टीम में और भी कई लोग शामिल होंगे।

टर्नओवर के बारे में बात करते हुए उन्होंने कहा, “हमारा सालाना टर्नओवर करोड़ों में है, लेकिन कोरोना महामारी की वजह से बिजनेस सबसे ज्यादा प्रभावित हुआ है। वैसे हम बेहतर कल की उम्मीद तो कर ही सकते हैं। अगर सबकुछ सामान्य रहा, तो 2022 तक हमारा टर्नओवर पहले से ज्यादा होगा। साथ ही, हम कोशिश करेंगे कि हमारी यह तकनीक ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचे।” 

अगर आप NFC बोर्ड के बारे में ज्यादा जानना चाहते हैं, तो Indowud Design Technology की वेबसाइट देख सकते हैं या info@indowud.com पर ईमेल कर सकते हैं। 

संपादन- जी एन झा

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