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केवल एक रूपये में इडली खिलाती हैं 82 साल की यह दादी

Idli Grandmother

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साधारण से टीन शेड के घर में मिट्टी का चूल्हा है। चूल्हे पर एक बूढ़ी महिला इडली तैयार कर रही है। हम बात कर रहे हैं कोयंबटूर के वाडिवेलमपालयम गांव में रहने वाली 82 वर्षीय महिला एम. कमलाथल की, जो पिछले 30 सालों से मात्र ₹ 1 में इडली बेच रही हैं! यक़ीन नहीं होता ना?
महंगाई, बढ़ती हुई बेरोज़गारी और अवसरवादी स्वार्थ में लिप्त इस दुनिया में भी क्या ऐसा कोई व्यक्ति हो सकता है? परंतु एम. कमलाथल से मिलकर आपको महसूस होगा कि बतौर इंसान हमने अपने अंदर किस चीज़ को खो दिया है।

एम कमलाथल (इडली वाली दादी) source

एम. कमलाथल कहती हैं, “अब मैं 82 साल की हूं और नहीं जानती की कितने दिन और काम कर पाऊंगी। मेरे परिवार में और कोई नहीं है। मैं अकेली हूं। सुबह साढ़े पांच बजे से लेकर दोपहर बारह बजे तक काम करती हूं। मैं इससे फायदा कमाना नहीं चाहती। जितना मुझे मिलता है उसे मैं अपने जीवनयापन में खर्च कर देती हूं। हर दिन तकरीबन 400-500 इडलियों की बिक्री हो जाती है। इसके लिए सामग्री पर रोज़ाना ₹ 300 का खर्च आता है। इडली बेचकर मुनाफे के तौर पर लगभग ₹ 200 बचा लेती हूं। जिससे गुज़ारा हो जाता है। यह काम करने से मुझे खुशी मिलती है। ”
महानगरों और कस्बों में रहने वाले लोग शायद ही इस तरह सादगी, उदारता और मेहनत का जीवन जी पाएं। बाज़ार में कीमतों के उतार-चढ़ाव का हम पर गहरा असर पड़ता है। हमें बेवजह जमाखोरी करने की आदत हो गई है। हमें नए-नए कपड़े और सुख-सुविधा चाहिए जो आपको एक सभ्य समाज में दिखावटी हैसियत दिलाती है। हम सब एक कभी न खत्म होने वाली प्रतिस्पर्धा में लगे हुए हैं।

चूल्हे में इडली पकाती दादी। source

जबकि दूसरी तरफ, एक साधारण सी सफेद कॉटन की साड़ी में लिपटी, 82 वर्ष की महिला, जिससे जब भी यह पूछा जाता है कि उसे क्या चाहिए? तो उसका एक ही जवाब होता है – “कुछ नहीं।” कमलथाल एक ऐसी साहसी महिला हैं जिन्हें न फायदे की चिंता है और ना किसी नुकसान की। 30 वर्षों से चावल और दाल के दाम कई बार घटे-बढ़े पर फिर भी कमलथाल ने अपनी इडली के दाम कभी नहीं बढ़ाए। उनकी यह सहज उदारता आज के दौर में एक अनुकरणीय मिसाल है।
ज़्यादातर अकेली रहने वाली महिलाएं असुरक्षा की भावना से ग्रसित होती हैं। वे अक्सर यह कहकर अपना जीवन बिताती हैं – “अरे मेरा कोई करने वाला नहीं है।” इसी असुरक्षा की भावना की चलते कई लोग अपना सारा जीवन अपने भविष्य की चिंता में लगा देते हैं। लेकिन कमलथाल अपवाद हैं। उन्हें न आज कुछ हासिल करने का मोह है और न कल कुछ खो देने का मलाल, इस सबके परे वह निर्भीक होकर वर्तमान में जीती हैं। इसी चिन्तामुक्त और मस्त जीवन-शैली की वजह से शायद अब तक बीमारियों ने कमलथाल को छुआ नहीं है और इस उम्र में भी शारीरिक श्रम करने में सक्षम हैं। उनके चेहरे की झुर्रियों में सभी के लिए प्यार, स्नेह और हाथ की फूली हुई नसों में संघर्ष करने का ज़ज्बा दिखाई देता है।
कमलथाल जिस तरह एक छोटे से स्थान में सीमित संसाधनों के साथ इडली बनाकर लोगों को खिलाती हैं। उसे देखकर एक सहज जीवन नज़र आता है। जिसमें कोई दिखावा या आडम्बर नहीं है, बनावट नहीं है। कमलथाल के ग्राहक आम तौर पर साधारण खेतिहर मज़दूर होते हैं। केले के पत्ते पर इडली, सांबर और चटनी परोसी जाती है। लोग जिस तरह अपने हाथों से इसे चाव से खाते हैं, उसे देखकर आप भी इसे खाए बिना नहीं रह पाएंगे। इडली खाने के बाद सभी लोग बाँस की टोकरियों में अपने-अपने जूठे पत्तल डालकर काम पर निकल जाते हैं। यह किफायती और इकोफ्रेंडली तरीका है। इस तरह आपको न बर्तन धोने की आवश्यकता है और ना ही कचरे के प्रबंधन की चिंता; क्योंकि ये पत्तल या तो मवेशियों द्वारा खा ली जाएंगी या फिर कुछ दिनों में जैविक खाद बनकर काम आएंगी।

दादी की इडली source

वर्ष 2019 में उनका एक विडियो वायरल होने के बाद सभी का ध्यान एम. कमलथाल की ओर आकर्षित हुआ। इसके बाद हाल में ही इन्‍हें सरकार की ओर से एल.पी.जी. कनेक्‍शन दिया गया है।
पता नहीं यह कमलथाल के लिए कितना उपयोगी होगा, क्योंकि कमलथाल ने जिंदगी भर चूल्हे में लकड़ी जलाकर इडली बनाई हैं। इस उम्र में गैस पर इडली बनाना शायद उन्हें रास नहीं आएगा। बनाने वाले व्यक्ति के अनुभवी हाथों का प्यार, चूल्हे की हल्की आंच का स्पर्श और धुँए की सौंधी गन्ध खाने में जो बेमिसाल स्वाद का रस भरती है, उस ज़ायके को दुनिया का कोई मसाला या कोई तकनीक पैदा नही कर सकती। कमलथाल के लिए रसोई गैस पर काम करना कितना सहज होगा, यह तो वक्त ही बताएगा।
हाल ही में महिंद्रा ग्रुप के चेयरमैन आनंद महिंद्रा ने भी इस वायरल वीडियो को ट्वीटर पर शेयर किया था। कमलाथल के घर को नए सिरे से बनाने के लिए भारत गैस, हिंदुस्‍तान पेट्रोलियम, थाइरोकेयर टेक्‍नोलॉजीज़ ने ज़िम्मेदारी ली है। परंतु जिन्हें जीवन में कुछ पाने की महात्वाकांक्षा ही नहीं, उनके लिए शायद इस तरह की मदद पता नहीं कितनी सार्थक होगी।

केले के पत्ते पर इडली, सांभर व चटनी।  source

कोविड-19 के कारण मौजूदा दौर में जहां हर तरफ अविश्वास, डर और अनिश्चितता का माहौल है, लोग जीवनावश्यक वस्तुओं की जमाखोरी और कालाबाज़ारी में लगे हैं, कीमतों के दाम कृत्रिम रूप से बढ़ गए हैं। ऐसे समय में भी कमलनाथ ने अपनी इडली ने दाम नहीं बढ़ाए। वह कहती हैं कि गरीब से ज़्यादा पैसे लेकर क्या करेंगी? कमलथाल पिछले 30 सालों से ₹ 1 में इडली बेचने वाली दादी के रूप में काफी चर्चित हुई हैं परंतु इडली से कहीं अधिक कमलथाल की कहानी मानवता एवं एक इंसान होने के मायने हैं, इसको बखूबी बयां करती है।
हम चाहें तो इडली दादी की तारीफ करें, उनकी चर्चा करें, उनके विडियो को, उनकी कहानी को सोशल मीडिया पर पोस्ट करते रहें या फिर उनके जीवन से प्रेरणा लेकर खुद भी ऐसा कुछ करें जैसा वो इडली दादी कर रही हैं।

संपादन- पार्थ निगम

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