Search Icon
Nav Arrow
youngsters built the road during Lockdown

रिटायर्ड फौजी की पहल; लॉकडाउन में युवाओं को जोड़ा और बनवा दी 3.5 किलोमीटर सड़क!

लॉकडाउन के दौरान 28 दिन तक 40 युवाओं ने 10 से 12 घंटे नियमित काम कर इस चुनौती को पूरा किया।

Advertisement

कहते हैं कि अगर हाथ से हाथ मिल जाएं तो इंसान बड़े से बड़ा काम साध सकता है। ऋषिकेश से 20 किलोमीटर दूर बूंगा-बीरकाटल ग्राम सभा के युवाओं ने इसे सच साबित कर दिखाया है। ग्राम सभा तक पहुंचने के लिए लोगों को मोहनचट्टी से साढ़े तीन किलोमीटर की पैदल चढ़ाई चढ़नी पड़ती थी, ऊबड़-खाबड़ पगडंडी पर  दुपहिया वाहन तो छोड़िए, दो लोग साथ-साथ पैदल भी चल नहीं सकते थे। लॉकडाउन के खाली समय का सदुपयोग करते हुए यहां के युवाओं ने रिटायर्ड फौजी हवलदार सुदेश भट्ट की अगुवाई में श्रम और साहस की नई मिसाल रच दी।

ग्रामीणों ने बड़े-बड़े बोल्डर हटाए, पत्थर तोड़े और ऊबड़ खाबड़ रास्ते को समतल कर साढ़े तीन किलोमीटर की सड़क खुद ही तैयार कर दी।

गाँव वालों से बात कर उन्हें इस कार्य के लिए तैयार किया

Uttarakhand Retired Army Man Builds Road
रिटा. हवलदार और क्षेत्र पंचायत सदस्य सुदेश भट्ट

रिटायर्वड हवलदार और वर्तमान में क्षेत्र पंचायत सदस्य सुदेश भट्ट की अगुवाई में ग्राम सभा के ग्रामीणों ने श्रमदान से गाँव की दुर्गम पगडंडी और पथरीली जमीन और चट्टानों को काटने का बेहद मुश्किल कार्य अंजाम दिया।

भट्ट ने द बेटर इंडिया को बताया, “दुपहिया आवाजाही न होने से गाँव वाले परेशानी भुगत रहे थे। लॉकडाउन की वजह से हर कोई घर में था। ऐसे में ख्याल आया कि क्यों न ये सड़क बनाई जाए। विचार तो आया, लेकिन इसके लिए गाँव वालों को तैयार कैसे किया जाए? यह सवाल मन में उठा। आखिर गाँव वालों के साथ बैठक करके यह मुद्दा रखा। कुछ बुजुर्ग गाँव वाले इसे एक मुश्किल काम मानते थे। उनकी नजर में यह एक बेहद दुरूह कार्य था। लेकिन कुछ युवा इस कार्य के लिए सहमत थे। ऐसे में उन्हें कार्य के लिए तैयार किया और काम शुरू कर दिया।”

40 युवाओं ने 28 दिन तक 10 से 12 घंटे काम किया

Uttarakhand Retired Army Man Builds Road
सड़क निर्माण में जुटे युवा

सुदेश भट्ट के अनुसार लॉकडाउन के दौरान 28 दिन तक 40 युवाओं ने 10 से 12 घंटे नियमित काम कर इस चुनौती को पूरा किया। फावड़े, गैती से यह बोल्डर उन्होंने खुद हटाए और खुद ही रिटेनिंग वॉल बनाई। खास बात यह रही कि उन्होंने रोटेशन में कार्य किया। जो युवा एक दिन श्रमदान के लिए आते, अगले दिन उन्हें आराम दिया जाता, उनकी जगह दूसरे युवा काम पर पहुंचते।

आखिरकार उनका सपना रंग लाया। 17 अप्रैल को उन्होंने काम शुरू किया था और 16 मई को उन्होंने इस सड़क को जनता के नाम कर दिया।

सोशल डिस्टेंसिंग का रखा पूरा ख्याल 

लॉकडाउन, कोरोना संक्रमण की आशंका को देखते हुए लगाया गया है, ऐसे में सड़क निर्माण के दौरान भी इन युवाओं ने सोशल डिस्टेंसिंग के नियम का पूरी तरह पालन किया। एक दूसरे से दूरी बरतकर हाथ चलाए। भोजन कभी किसी के घर से पहुंचता तो कभी किसी के घर से। गाँव वाले यह सोचकर ही खुश थे कि उनकी बरसों की साध कुछ उत्साही युवाओं की वजह से पूरी होने जा रही है। बूंगा और बीरकाटल के लोगों ने गाँव को जोड़ने वाले मार्ग को आखिर दुपहिया वाहनों की आवाजाही के लिए तैयार करने में सफलता पाई।

Advertisement

पहले चरण में ढाई किलोमीटर का काम

Uttarakhand Retired Army Man Builds Road
औजारों को कंधे पर थामे युवा

पहले चरण में युवाओं ने ढाई किलोमीटर की सड़क तैयार की। इसके बाद एक किलोमीटर के हिस्से को दूसरे चरण में पूरा किया गया। इस सड़क पर से दुपहिया गुजारकर सड़क का ट्रायल भी किया गया, जो कि कामयाब रहा। इसके बाद तो उनकी खुशी का ठिकाना न रहा। ग्रामीणों ने अपने फावड़े और अन्य उपकरण लहराकर काम पूरा होने की खुशी मनाई।

स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को समर्पित की सड़क

Uttarakhand Retired Army Man Builds Road
पत्थर हटाने में जुटे युवा

ग्रामीणों ने इस सड़क को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंदन सिंह बिष्ट को समर्पित किया। इस सड़क का नामकरण उन्हीं के नाम पर किया गया। इसके लिए वॉल राइटिंग भी की गई है। क्षेत्र पंचायत बूंगा की ग्राम सभा कुमार्या निवासी स्वतंत्रता संग्राम सेनानी चंदन सिंह बिष्ट का नाम क्षेत्र में गर्व से लिया जाता है। भारत छोड़ो आंदोलन में अग्रणी भूमिका निभाने वाले सेनानी पर अंग्रेजी हुकूमत ने जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर डेढ़ हजार रुपये का ईनाम रखा था। अक्टूबर, 1942 में इनके बच्चों को अंग्रेज सरकार ने घर से बाहर निकालकर उनकी संपत्ति की कुर्की कर दी थी। उनके संघर्ष को लोग आज भी याद करते हैं।

वॉलराइटिंग भी की, जागरूकता संदेश लिखे

युवाओं ने न केवल सड़क निर्माण किया, बल्कि उन्होंने इसके किनारे स्थित चट्टानों पर वॉलराइटिंग कर कई सार्थक संदेश भी दिए। इनमें इन दिनों कोरोना संक्रमण की आशंका को देखते हुए इससे बचने की अपीलों पर ज्यादा आधारित हैं। फिलहाल गाँव वाले उनकी तारीफ करते नहीं थक रहे। हर जुबां पर उन्हीं का नाम है।

काम खत्म होने पर खुशी का इजहार करते युवा

सुदेश भट्ट की नजर अब गाँव को मुख्य मार्ग से जोड़ने वाली पुलिया पर है। यह पुलिया 2013 में आई आपदा में क्षतिग्रस्त हो गई थी। लोग इस पर बिजली के क्षतिग्रस्त खंभों को रखकर बनाए गए रास्ते से गुजरने के लिए विवश हैं। वह ढांगूपट्टी और उदयपुरपट्टी को जोड़ने के लिए भी युवाओं को तैयार कर रहे हैं, ताकि इन दोनों के बीच घूमकर आनेवाला 50 किलोमीटर का फासला कम हो सके। सुदेश भट्ट का मानना है  कि दृढ़ इच्छाशक्ति से कोई भी कार्य मुश्किल नहीं होता। सड़क बनाने के कार्य को वह शुरुआत भर मानते हैं।

(सुदेश भट्ट से उनके मोबाइल नंबर 9759854793 पर संपर्क किया जा सकता है।)

यह भी पढ़ें- झारखंड: लॉकडाउन में 1.44 करोड़ थालियां परोस चुकी हैं सखी मंडल की ये ग्रामीण महिलाएं

Advertisement
_tbi-social-media__share-icon