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एक IRS के 10 वर्षों के प्रयासों से गाँव को मिला सड़क-स्कूल, पढ़िए यह प्रेरक कहानी

IRS Officer Efforts

सुरेश लखावत 2010 बैच के आईआरएस अधिकारी हैं। उन्होंने अपनी गरीबी, संघर्ष और सफलता के बाद, अपने गाँव की तस्वीर को बदलने का फैसला किया। उनकी यह राह आसान नहीं थी।

वह मूल रूप से आंध्र प्रदेश (अब तेलंगाना) के एक छोटे से गाँव सर्वापुरम के रहने वाले हैं। यहाँ पहले सड़क, साफ पानी, स्कूल जैसी बुनियादी सुविधाओं की कोई व्यवस्था नहीं थी और उन्होंने ठान लिया था कि वह अपने गाँव में एक बदलाव ला कर रहेंगे।

फिलहाल, हैदराबाद के आयकर विभाग में ‘संयुक्त आयुक्त’ के रूप में नियुक्त, सुरेश लखावत को अपने गाँव में 3 किलोमीटर की सड़क बनाने के लिए, जिले के अधिकारियों को राजी करने में 10 साल लग गए।

वह कहते हैं, “मैं करीब 10 साल तक जिलाधिकारियों, मंत्रियों और संबंधित विभाग के अधिकारियों को यहाँ सड़क बनाने के लिए नियमित रूप से पत्र लिखता रहा। उनके लिए यह विश्वास करना मुश्किल था कि एक ऐसी जगह, जहाँ से कोई IRS बना है, वहाँ 21वीं सदी में वाहन चलने योग्य सड़क नहीं है।”

UPSC में सफल होने के बाद, 2010 में सुरेश की नियुक्ति हैदराबाद के मसाब टैंक में इनकम टैक्स ऑफिस में हुई। पद संभालने के बाद, उन्होंने अपने गाँव में मूलभूत सुविधाओं के लिए संबंधित अधिकारियों को पत्र लिखना शुरू किया।

33 वर्षीय सुरेश कहते हैं, “अधिकारियों को विश्वास नहीं था कि एक ऐसे गाँव से कोई IRS अधिकारी बन सकता है, जहाँ बिजली, साफ पानी, सड़क जैसी मूलभूत सुविधाएं नहीं हैं।”

इसी प्रयास में उन्होंने अपने गाँव में अधिकारियों के साथ कई दौरे आयोजित किये। जो अधिकारी आ नहीं पाते थे, वह उन्हें तस्वीर दिखाते थे। वह अधिकारियों को समझाने के लिए, अपने जीवन की कहानी भी सुनाते थे।

अंततः उनकी मेहनत रंग लाई और उनके गाँव में साल 2020 में पक्की सड़क का निर्माण हुआ। यह सड़क गाँव को शहर और रेलवे स्टेशन से जोड़ती है। उनके प्रयासों से गाँव को RO जलापूर्ति योजना, एलईडी स्ट्रीट लाइट तथा पुस्तकालय की सुविधा मिलने के साथ ही, एक स्कूल भी मिला।

पहले ग्रामीणों को रेलवे ट्रैक के किनारे चलना पड़ता था

वह कहते हैं, “किसी सरकारी अधिकारी के लिए देश के सुदूरवर्ती क्षेत्रों में ऐसे प्रयास करना कठिन है। मुझे कभी नहीं लगा कि मेरे गाँव को दूसरे गाँव के बीच सर्वोच्च प्राथमिकता मिलनी चाहिए। लेकिन, मैं बचपन से ही एक अधिकारी बन कर, गाँव में बदलाव लाना चाहता था।”

लोगों के प्रति हैं आभारी

सुरेश कहते हैं कि इससे पहले गाँव वालों को हैदराबाद और किसी दूसरे शहर जाने के लिए, 3 किमी तक रेलवे लाइन के किनारे चलना पड़ता था। यहाँ तड़लापल्ली (Tadlapussally) रेलवे स्टेशन है।

इन्हीं राहों से निकल कर सुरेश ने अपने जीवन में एक नया आयाम हासिल किया। पाँच साल की उम्र तक वह इन्हीं गलियों में खेला करते थे और एक अस्थाई स्कूल में कभी-कभी पढ़ने भी जाते थे।

लेकिन, तभी एक जमींदार ने उनके दादा जी के सामने उनकी देखभाल की पेशकश की और तभी से उनका जीवन बदल गया।

वह कहते हैं, “मैं दिन के अधिकांश समय अपने दादा जी के साथ रहता था। वह एक जमींदार के खेत में काम करते थे। वह जमींदार मुझे जानते थे और एक दिन उन्होंने मेरे दादा जी से घर के कामों के लिए, मुझे अपने घर पर रखने के बारे में कहा। बदले में, उन्होंने मेरी पढ़ाई और सेहत की देखभाल के लिए आर्थिक मदद की पेशकश की।”

इसके बाद सुरेश के दादा राजी हो गए और वह जमींदार के घर पर काम करने लगे।

2011 तक सुरेश का घर

सुरेश कहते हैं, “जमींदार मुझे अपने दो बच्चों के साथ पढ़ाने लगे। लेकिन, जब परीक्षा के नतीजे आए तो उनके बच्चे असफल हो गए और मैं पास हो गया। इस नतीजे से नाखुश होकर उन्होंने मुझे मदद करना बंद कर दिया।”

इसके बाद, सुरेश के किसान पिता शंकर ने ऐसे लोगों को तलाशना शुरू कर दिया, जो उनके बेटे की पढ़ाई में उनका मार्गदर्शन कर सके।

वह कहते हैं, “एक छात्रवृति योजना के बारे में जानने के बाद, मेरे पिता मुझे इसमें आवेदन कराने के लिए हैदराबाद ले गए। इसके लिए हमें एक महीने तक कई कठिनाइयों से गुजरना पड़ा। यहाँ तक कि हम ‘आदिवासी कल्याण कार्यालय’ के पास सड़क के किनारे भी सोए। यह राज्य की सबसे बड़ी जनजातीय छात्रवृत्ति योजना थी और इसके लिए बच्चों को कई चरणों से गुजरना पड़ता है।”

सफलता की ओर पहला कदम

सुरेश ने 1993 में इस छात्रवृति को प्राप्त करने में सफलता हासिल की और उन्होंने हैदराबाद पब्लिक स्कूल से 2005 में बारहवीं पास की।

वह कहते हैं, “इस स्कूल को देश के सबसे बेहतरीन स्कूलों में माना जाता है। मैंने अकादमिक परीक्षाओं के साथ-साथ एथलेटिक्स में भी उत्कृष्ट प्रदर्शन किया। खेलों में 250 से अधिक पदक जीते और स्कूल में हेड बॉय की भी भूमिका निभाई।”

स्कूल में जब वह आठवीं क्लास में थे तब उदयचरण उनके दोस्त बने। सुरेश को लगा जैसे उन्हें जीवन भर के लिए कोई सच्चा दोस्त मिल गया। उदयचरण ने, सुरेश के करियर में उनके लक्ष्यों को हासिल करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। 

सुरेश अपने जीवन में एक अधिकारी बन कर, अपने समुदाय के लोगों के जीवन को बेहतर बनाना चाहते थे।

वह कहते हैं, “2005 में, मैं घर लौट आया था और कॉल सेंटर में नौकरी की तलाश में था। इसी बीच, उदयचरण ने मुझे बताया कि वह दिल्ली में पढ़ाई की योजना बना रहे हैं। उनके पिता, जिनके मैं काफी करीब था। उन्होंने मेरी पढ़ाई के लिए, मुझे मदद की पेशकश की और मुझे अपने बेटे के साथ दिल्ली में रहने और पढ़ाई करने के लिए कहा। इसके बाद, मैंने बिना कन्फर्म टिकट के ट्रेन पकड़ी और पूरे सफर के दौरान, मैं 38 घंटे तक खड़ा रहा।”

दिल्ली में उन्होंने ग्रैजुएशन की पढ़ाई के लिए एक कॉलेज में नामांकन लिया और सिविल सेवा परीक्षाओं की तैयारी की योजना बनाई।

2008 में, सुरेश ने बेहतरीन अंकों के साथ अपना ग्रैजुएशन पूरा किया और यूपीएससी की तैयारी में जुट गए।

गाँव वालों के साथ सुरेश

वह कहते हैं, “मैंने यूपीएससी में पहली बार में ही सफलता हासिल कर ली। अगले साल मेरी ट्रेनिंग पूरी हुई और मैं घर लौट आया। मुझे हैदराबाद के मसाब टैंक में इनकम टैक्स ऑफिस में नियुक्त किया गया। यह आदिवासी कल्याण कार्यालय के नजदीक है, जहाँ मैं छात्रवृत्ति के लिए चक्कर लगाया करता था और सड़कों पर भी सोया था।”

वह बताते हैं, “मेरी पहली सैलरी जनवरी 2010 में आई। सबसे बड़े बेटे होने के नाते, मैंने अपने छोटे भाइयों का खर्च उठाना शुरू कर दिया और अपने माता-पिता की मदद की। मुझे महसूस हुआ कि जीवन के हर पड़ाव पर, मेरे साथ सही समय पर मदद करने वाले लोग खड़े थे। मेरे दोस्त उदयचरण ने हर मोड़ पर मेरा साथ निभाया।”

इसी से प्रेरित होकर, सुरेश ने अपने गाँव के लोगों की सहायता करने की ठानी। वह कहते हैं, “सरकार ने छात्रवृत्ति के जरिये मेरी मदद की। अब मैं एक गरिमापूर्ण जीवन जी सकता हूँ। मैं ग्रामीणों के जीवन को बेहतर बनाने के लिए, उसी सिस्टम का उपयोग करना चाहता था।”

वह आगे कहते हैं, “यहाँ सड़क बनाना एक बड़ी चुनौती थी, फिर भी मेरा एक सपना सच हो गया। सर्वापुरम अब 10 अन्य छोटे-छोटे गाँवों से जुड़ा है और इस बुनियादी ढांचे से करीब 5000 लोगों को लाभ होगा। यहाँ यातायात में धीरे-धीरे वृद्धि होगी और लोगों की कमाई बढ़ेगी। जल्द ही, यहाँ स्कूल और आरओ वाटर प्लांट भी चालू हो जाएगा।”

सुरेश कहते हैं कि उनके गाँव के 28 लोग उनकी मदद से सरकारी विभागों में नौकरी पा चुके हैं और उनका इरादा गाँव से अधिक से अधिक प्रतिभाओं को सामने लाने का है।

मूल लेख – हिमांशु नित्नावरे

संपादन – जी एन झा

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