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इस किसान की बदौलत शिमला ही नहीं, अब राजस्थान में भी उगते हैं सेब!

Hariman sharma Apple Variety 99

हरिमन शर्मा

कुछ कर गुजरने का जज़्बा हो तो देर-सवेर आपको सफलता मिल ही जाती है। सफलता की यह कहानी भी कुछ ऐसा ही इशारा करती है।

हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर जिले की घुमारवीं तहसील के पन्याला (कोठी) के रहने वाले हौसले के धनी किसान हरिमन शर्मा अपने गाँव से 150 किलोमीटर दूर सेब की लहलहाती फसलों की सफलता की कहानियां सुनते हुए बड़े हुए। उनके मन में शुरू से ही चाह रही कि उनके यहां भी सेब उग जाए।

‛द बेटर इंडिया’ से बात करते हुए वे बताते हैं, “मैंने सुन रखा था कि सेब उगाने के लिए आपके आसपास बर्फ और ठंडा मौसम होना जरूरी होता है। मैंने स्कूल की किताबों में भी पढ़ा था कि हिमाचल में नीचे के इलाकों में सेब नहीं उग सकता। शुरू से ही मेरी ख़्वाहिश थी कि मेरे खेतों में भी सेब उग आए तो कितना अच्छा हो!”

वे हमेशा सेब खाने के बाद उसके बीजों को अपने आंगन में बिखेर देते और रोज़ निहारते कि काश सेब का पेड़ उग आए, उस में से सेब निकल आए। बचपन में अक्सर उनके दिन इसी तरह गुज़रते। फिर एक दिन कुछ ऐसा हुआ, जिसने उनकी ज़िंदगी बदलकर रख दी। 1999 में उन्होंने अपने बगीचे में फेंके गए पुराने बीजों से उगी हुई सेब की पौध देखी। हरिमन को बरसों से इसी दिन का इंतज़ार था। उन्होंने तुरंत इस पर काम करना शुरू कर दिया।

2001 में उन्होंने जब पहली बार एक पौधे में छोटे आकार के सेब लगे देखे तो उनकी ख़ुशी का कोई ठिकाना नहीं रहा। 

हरिमन 99 एप्पल।

इसे उन्नत करने के लिए इन्होंने इनकी कई तरह से कलम की। दूसरे साल में कुछ कलमे सफल हुई और सेब के फलों की गुणवत्ता में सुधार करने की उनकी आशा और बढ़ गई।

2003 से 2005 तक उन्होंने शिमला से कुछ नए रूट स्टॉक के पौधे लाकर उस पर ग्राफ्टिंग की और अपने शोध को जारी रखा। उन्होंने सेब के पेड़ो का एक छोटा सा बगीचा लगाया, जो आज तक फल दे रहा है। इस बगिया को दूसरे शब्दों में हरिमन शर्मा के संघर्ष और शोध का जीता जागता प्रत्यक्षदर्शी उदाहरण कहा जा सकता है।

समतल इलाकों में सेब की खेती के लिए प्रजाति व उसकी उपयुक्त प्रणाली विकसित करने के लिए हरिमन शर्मा ने अपने शोध को 2 चरणों में पूरा किया। सबसे पहले उन्होंने उपलब्ध सेबों में से प्राप्त बीजों को निचले क्षेत्र में जांचा, जिसका मुख्य आधार अंकुरण और विकास शक्ति था। दूसरे चरण में उन्होंने बेहतर किस्म को उपलब्ध रुट-स्टॉक्स के साथ ग्राफ्ट करके ऐसी पौध सुनिश्चित करने पर बल दिया जो बेहतर गुणवत्ता के फल दे सके।

अंततः उन्हें सेब की एक ऐसी उन्नत किस्म विकसित करने में सफलता मिल गई जो मैदानी, उष्ण कटिबंधीय और उपोष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों में बड़ी आसानी से विकसित हो सकती थी । इस किस्म को पनपने, फूल और फल आने के लिए कड़ी ठंड की आवश्यकता नहीं थी ।

जहां गर्मियों में तापमान 40 से 48 डिग्री तक रहता है, वहां भी यह किस्म बड़ी आसानी से पनप सकती है। इस उन्नत किस्म में स्व-परागण पाया जाता है। आप अपने आंगन या बगीचे में इसका एक पौधा भी लगा सकते हैं।

उनकी विकसित की हरिमन 99 किस्म के पौधे पर लगे सेब।

2007 से 2012 के दौरान उन्होंने अपने शोध यानी सेब की इस उन्नत प्रजाति को लोगों तक पहुंचाने के लिए बहुत संघर्ष किया। मदद के लिए उन्होंने राज्य के विश्वविद्यालय और कृषि विभाग से भी संपर्क किया, लेकिन ज़्यादातर ने उनके शोध को सिरे से नकारते हुए, उन्हें हतोत्साहित करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। पर वे भी एक अलग मिट्टी के बने हुए थे, हार कैसे मान लेते?

कुछ वैज्ञानिकों ने उन्हें यह भी तर्क दिए कि सेब की कुछ ऐसी प्रजातियां भी होती हैं, जो ज़्यादा तापमान में फल दे सकती हैं। इस पर उन्होंने कहा कि यदि इस प्रकार की प्रजातियां होती हैं, तो फिर क्यों उन्हें अब तक किसानों तक नहीं पहुंचाया गया?

वे अपने अनुसंधान और प्रसार के लिए किसी भी तरह की मदद पाने में विफल ही रहे। ऐसे में सबसे पहले सेवानिवृत्त बागवानी विशेषज्ञ डॉ. चिरंजीत परमार ने भारत में कम चिलिंग वाले सेब की खेती की दिशा में उठाए गए अद्वितीय और अभिनव कदम के लिए उन पर एक लेख लिखा। इसके बाद 2013 में ‛पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण’ के पूर्व अध्यक्ष डॉ. पीएल गौतम ने उनके द्वारा सेब पर किए जा रहे कार्य के मूल्यांकन और संवर्धन के लिए राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान  (एनआईएफ) को सूचित किया।

मणीपुर में उगे हुए सेब।

साल 2014 में सबसे पहले हिमाचल प्रदेश के निचले क्षेत्र में उनके द्वारा विकसित सेब की प्रजाति का मूल्यांकन किया गया। मूल्यांकन में यह बात सिद्ध हो गई कि वास्तव में यह प्रजाति निचले क्षेत्रों के लिए उपयुक्त सिद्ध हो सकती है। राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान ने इस किस्म को ‘एचआरएमएन-99’ (HRMN-99, HRMN= हरिमन, 99= वर्ष 1999) नाम दिया और पंजीयन के लिए ‛पौधा किस्म और कृषक अधिकार संरक्षण प्राधिकरण’ को आवेदन किया। इतना ही नहीं, इस किस्म की जांच के लिए एक नर्सरी की स्थापना करने और पौध तैयार करने के लिए 2.5 लाख रुपये का सहयोग भी प्रदान किया।

2014-15 से राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान ने सेब की इस किस्म की जांच व प्रसार के लिए मल्टी लोकेशन ट्रायल शुरू किए। राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान ने 2014 से 2019 के बीच देश के 29 राज्यों व केंद्र-शासित प्रदेशों के 1500 किसानों और 25 संस्थाओं में इस किस्म के लगभग 20,000 पौधे लगवाएं।

अब तक 23 राज्यों क्रमशः बिहार, झारखंड, मणिपुर, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, उत्तरप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, दादरा और नगर हवेली, कर्नाटक, हरियाणा, राजस्थान, जम्मू और कश्मीर, पंजाब, केरल, उत्तराखंड, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, उड़ीसा, पांडिचेरी, हिमाचल प्रदेश और दिल्ली में फ्रुटिंग शुरू हो गई है।

राजस्थान में भी हो रही सेब की खेती।

एनआईएफ की ओर से इस किस्म पर शोध कर रहे रिसर्च एसोसिएट डॉ. नौशाद परवेज़ कहते हैं, “निचले और समतल क्षेत्रों में इस किस्म के सेब की खेती संभव है, पौधे पर सेब का लगना और सेब की खेती शुरू होना दो अलग-अलग बातें हैं। नए क्षेत्रों में सेब की खेती शुरू करने के लिए काफी जानकारियां जुटाने की आवश्यकता है। हालांकि कुछ क्षेत्रों में अध्ययन के उत्साहजनक परिणाम देखने को मिले हैं।”

‘एचआरएमएन-99’ सेब की किस्म में सफलता मिलने के बाद अन्य सेबों की दूसरी विदेशी क़िस्मों पर भी जांच शुरू हो गई है, जो निचले इलाकों में फल दे सकती है। इसमें ‛अन्ना’ और ‛डोर्सेट गोल्डन’ में तो फल भी आना शुरू हो गए हैं। राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान ने इन प्रजातियों के फलों की गुणवत्ता की जांच और आणविक रूपरेखा (Molecular Profiling) की है। 2017-18 की जांच में पाया गया है कि 3 से 5 वर्ष की आयु वाले ‘एचआरएमएन-99’ पौधे निचले हिमाचल प्रदेश, हरियाणा और मणिपुर के चार जिलों में प्रति पौधा 5 से 75 किलोग्राम फल प्रति वर्ष उत्पादन कर रहे थे।

‘एचआरएमएन-99’ का फल मध्यम  पीला, लाल, छीट लिए हुए, खट्टे मीठे स्वाद जैसी विशिष्ट विशेषताओं के साथ था। तीनों किस्में ग्राफ्टिंग से तैयार करके विभिन्न क्षेत्रों में लगाई गई थी, ‘एचआरएमएन-99’ का फल नरम और रसदार गूदे के साथ पाया गया। परिपक्वता के दौरान त्वचा का रंग पीले से अधिक लाल हो गया था। आणविक जांच में यह पाया गया कि ‘एचआरएमएन-99’ और ‛अन्ना’ में कम विभिन्नताएं थी, जबकि ‛डोर्सेट गोल्डन’ ‘एचआरएमएन-99’ से बिल्कुल अलग था।

हरिमन 99 सेब को विभिन्न स्तरों पर मापा व परखा भी गया है।

समतल और निचले क्षेत्रों में सेब की खेती के लिए शोध के अथक प्रयास और ‘एचआरएमएन-99’ सेब की प्रजाति के लिए किए गए कार्यों के लिए हरिमन को राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान द्वारा मार्च 2017 के महोत्सव में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया।

उम्मीद है की आने वाले दिनों में सेब की फसले भारत के गर्म क्षेत्रों में नए परिणाम और आशा के साथ पैदा होंगी। हालांकि सेब की फसल बहुत संवेदनशील और सालाना जलवायु पर निर्भर करने वाली है, लेकिन सही मिट्टी व फसल प्रबंधन के साथ खेती की जाए तो ‘एचआरएमएन-99’ निश्चित रूप से बेहतर प्रदर्शन करेगी।

राष्ट्रीय नवप्रवर्तन प्रतिष्ठान के निदेशक डॉ. विपिन कुमार कहते हैं, ‘एचआरएमएन-99’ सेब की किस्म, ज़मीनी स्तर पर नवाचार और नवीन कृषि पद्धतियों में भारतीय किसानों के योगदान का एक आदर्श उदाहरण है।”

हरिमन शर्मा से फेसबुक पर इस लिंक से जुड़ा जा सकता है। आप इन नम्बर्स 09418867209, 09817284251 पर उनसे बात भी कर सकते हैं।

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