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जहाँ चाह वहाँ राह- शिक्षा से वंचित बच्चो के लिए बैठकगृह मे चलती पाठशाला!

ऋतु अब्भी इस बात की मिसाल है कि कुछ बड़ा करने के लिए बड़े-बड़े साधनो की ज़रूरत नही होती. अपने बैठकगृह को ही पाठशाला बनाकर ग़रीब और शिक्षा से वंचित बच्चो को ज्ञान का उपहार देती ऋतु अपने इस छोटे से कदम से कई ज़िंदगियाँ बदल रही है. यहाँ बच्चे अपने पाठ्यक्रम को बेहतर ढंग से समझने के साथ साथ, निःशुल्क, उच्च्स्तरिय शिक्षा का आनंद उठाते है.

ऋतु अब्भी इस बात की मिसाल है कि कुछ बड़ा करने के लिए बड़े-बड़े साधनो की ज़रूरत नही होती. अपने बैठकगृह को ही पाठशाला बनाकर ग़रीब और शिक्षा से वंचित बच्चो को ज्ञान का उपहार देती ऋतु अपने इस छोटे से कदम से कई ज़िंदगियाँ बदल रही है. यहाँ बच्चे अपने पाठ्यक्रम को बेहतर ढंग से समझने के साथ साथ, निःशुल्क, उच्च्स्तरिय शिक्षा का आनंद उठाते है.

दिन के चार बज रहे है. तेज़ी से चलता नोयडा शहर अपनी ही रफ़्तार मे व्यस्त है. ऐसे मे कुछ बच्चे अपना स्कूल ख़त्म करने के बाद ‘आज कौनसा  नया पाठ पढ़ाया जाएगा’ इस रोमांच को लिए, एक घर की ओर बढ़ रहे है. यहाँ हम आपको  बता दे कि ये कोई आम और औपचारिक स्कूल नही है. यहाँ पूर्णतः घरेलू माहौल मे बच्चो को पढ़ाया जाता है. बच्चो के आते ही उनकी शिक्षिका ऋतु अब्भी वहाँ आती है तथा सारे बच्चे किसी सूरजमुखी की फूल की भाँती ऋतु के ज्ञान के प्रकाश की ओर खीचे चले जाते है. और कुछ ही देर मे यह बात समझ आ जाती है की बच्चे ऋतु की ओर इतने आकर्षित क्यूँ है.

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हर दिन अपने औपचारिक स्कूल से आने के बाद बच्चे ऋतु के बैठकगृह मे एक रोचक पाठ पढ़ने के लिए एकत्रित होते है.

ऋतु के बैठक कक्ष मे ये बच्चे चारो ओर फैल जाते है. वे यहाँ अपने गुरु की छत्रछाया मे बहोत महफूस महसूस करते है. और ऋतु उनके साथ हँसती, खेलती और उन्हे प्रोत्साहित करती उन्हे इस तरह पढ़ाती चली जाती है जैसे एक माँ अपने बच्चो को सहलाती है.
आज के दौर मे जब हमारे देश मे शिक्षा सिर्फ़ अमीरो का अधिकार बनकर रह गया है, ऋतु का ये कदम निश्चित ही प्रशंसनीय है. परोपकार की भावना से जन्मे ऋतु के इस स्कूल मे स्कूल जाने वाले ग़रीब बच्चो के साथ साथ वे बच्चे भी आते है जिन्हे स्कूल जाने का सौभाग्य प्राप्त नही है.

“समाज सेवा की ओर मेरा  रुझान शुरू से ही रहा है. मैं जहाँ भी रही, मैने हमेशा से ही समाज के लिए कुछ ना कुछ करने का प्रयास किया है, चाहे वो हमारे देश के उत्तर पुर्विय रज्य हो या देश की राजधानी दिल्ली. मैं सोशल अंड डेवेलपमेंट रिसर्च अंड  अक्षण ग्रूप (सदर्ग) नामक गैर सरकारी संस्था से जुड़ी हुई हूँ. इसके अलावा मैं  लायनस क्लब की भी सदस्या हूँ. इसके तहत हम विभिन्न  गाँवो मे जाकर समाज सेवा का कार्य करते है. इसी दौरान मुझे ये आभास हुआ की मुझे गाँवो के उन बच्चो के लिए भी कुछ करना चाहिए जो मेरे आसपास रहते है.”

ऋतु की ये छोटी सी सोच अब आकार लेने लगी. उन्होने अपने आसपास की घर-घर काम करने वाली महिलाओ को स्वच्छता , शिक्षा तथा बॅंक वग़ैरह से संबंधित जानकारी देना शुरू किया जिससे कि वे स्वावलंबी बन सके. और फिर उन्होने, इन महिलाओ के बच्चो को पढ़ाने की भी इच्छा जताई. जो बच्चे पहले से ही स्कूल जाते थे उनके लिए ट्यूशंस तथा जो बच्चे स्कूल नही जा पाते उनके लिए ऋतु का घर ही स्कूल बन गया. “मेरी इस पहल को बेहद सराहा गया. अगले दिन से ही काफ़ी संख्या मे बच्चे मेरे बैठक्कक्ष मे पढ़ने आने लगे. मैने उनके लिए किताबे, पेन्सिल और बाकी पढ़ने का समान भी खरीदा.”

ऋतु के इस अनोखी पाठशाला मे पाँच साल से लेकर चौदह साल के बच्चे आ सकते है. पर यहाँ सिर्फ़ उन्ही बच्चो को पढ़ाया जाता है जो समाज के उस  तपके से आते है जहाँ शिक्षा प्राप्त करना आसान नही है, जो आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के कारण स्कूल नही जा पाते. “कुछ बच्चे ऐसे भी है जो स्कूल तो जाते है परंतु उनके माता-पिता के साक्षर ना होने के कारण उन्हे घर पर उनकी पढ़ाई से जुड़ी कोई सहायता नही मिलती. ऐसे बच्चो को मैं उनके कक्षा के हिसाब से स्कूल मे पढ़ाए जाने वाले सभी विषयो मे मदत करती हूँ जैसे की गणित, विज्ञान, भूगोल इत्यादि.”

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ऋतु, पाँच से चौदह साल के बच्चो को पढ़ाने मे अपना ध्यान केंद्रित करती है

छात्रो की समस्या तथा ज़रूरतो के मुताबिक, ऋतु उनकी सहायता करती है. “मैं इन बच्चो को इनके स्कूल के हिसाब से होमवर्क करने मे तथा परीक्षा के लिए तयारी करने मे मदत करती हू. और जो बच्चे स्कूल नही जाते उन्हे मैं बिल्कुल शुरू से पढ़ाती हूँ. इसके अलावा शिक्षा के साथ साथ मैं उन्हे सॉफ सुथरा तथा स्वस्थ रहने के लिए भी प्रेरित करती हूँ”

शिक्षा के प्रति रूचि बनाए रखना कोई आसान काम नही है, ख़ासकर बच्चो के लिए. “सिर्फ़ पढ़ते रहने से बच्चे ऊब जाते है. इसलिए मैं उन्हे पढ़ाई के अलावा भी बहोत कुछ करने का मौका देती हू. हम लोग घर के भीतर ही कई खेल खेलते है. चित्रकारी करने मे भी बच्चे बड़ा आनंद लेते है. मैं उनसे कभी गाना गाने को कहती हू और कभी कविताए पाठ करने को. अपनी कला सबके सामने लाने हेतु मैं उन्हे अपने बनाए हुए किसी भी कला का प्रदर्शन करने को भी कहती हू.”

बच्चे उर्जा का संग्रह होते है. इस उर्जा को सही दिशा दिखाने हेतु उचित मार्गदर्शन का होना बेहद ज़रूरी होता है. यही जटिल काम ऋतु कर रही है. “ये बच्चे पढ़ाई को लेकर बेहद उत्साहित है. मुझे उन्हे कभी क्लास के लिए आने के लिए याद नही दिलाना पड़ता. मैने इन बच्चो को क्लास मे हमेशा वक़्त पर या वक़्त से पहले ही आते देखा है. कुछ बच्चे तो पढ़ाई मे बहोत तेज़ है और उन्हे बस अपना भविष्य गढ़ने के लिए उचित मार्गदर्शन की आव्यशकता है.”

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ऋतु अब्भी उन बच्चो को पढ़ाने पर ज़ोर देती है जो आर्थिक रूप से कमज़ोर होने की वजह से शिक्षा से वंचित रह जाते है

रौशनी फैलाने के दो तरीके है- या तो खुद दीपक बन जाए या तो उनके प्रकाश को प्रतिबिंबित करने वाला दर्पण. ऋतु ऐसे ही कई दीपक के प्रकाश को प्रतिबिंबित करने वाले दर्पण का काम कर रही है. जिनकी रोशनी से एक दिन सारा समाज जगमगा उठेगा.

“शिक्षा एक बेहद बुनियादी अधिकार है जो हर किसी को मिलना चाहिए. पर इन बच्चो को ये बुनियादी अधिकार भी सही ढंग से नही मिलता. इसके कई दुष्प्रभाव हो सकते है. ये बच्चे शिक्षा के अभाव मे कभी उभर कर नही आते. देश और विदेश मे कई जगह भ्रमण करने के कारण तथा समाज सेवा से जुड़े रहने के मेरे अनुभव के कारण मेरा ये मानना है कि आर्थिक रूप से पिछड़े हुए इन बच्चो के लिए हम बहोत कुछ कर सकते है.”

मूल लेख- कीर्ति जयकुमार

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