अपनी हाज़िर जवाबी, खुश-मिजाज़ी और दृढ़ता के लिए जाने जाने वाले मानेकशॉ सेना के मान-सम्मान के लिए किसी से भी अड़ सकते थे। 

चलिए जानते हैं उनसे जुड़े कुछ ऐसे ही खास अनसुने किस्सों के बारे में –

फील्ड मार्शल का पद हासिल करने पहले भारतीय ऑफिसर सैम मानेकशॉ डॉक्टरी की पढ़ाई करना चाहते थे, लेकिन पिता के मना कर देने के बाद उन्होंने IMA की प्रवेश परीक्षा दी और सेना में शामिल हो गए।

दूसरे विश्व युद्ध के दौरान वह दो Royal Scots से जुड़े, जहां स्कॉटिश ऑफिसर उन्हें ‘मिस्टर मैकिनटोश’ कहते थे। यहाँ उन्होंने अपनी बहादुरी के लिए मिलिट्री क्रॉस भी हासिल किया।

वह बेहद मज़ाकिया और खुशमिजाज़ इंसान थे। बर्मा में 9 गोलियां लगने के बाद जब उनका ऑपरेशन कर रहे सर्जन ने पूछा 'क्या हुआ', तो उन्होंने अपने अंदाज़ में जवाब दिया, ''कुछ नहीं हुआ, मुझे गधे ने लात मार दी थी।"

'सैम बहादुर' ने कभी किसी गोरखा रेजिमेंट की कमान नहीं संभाली, लेकिन वह गोरखा सैनिकों के गहरे प्रशंसक रहे।

1971 में जब उनसे ढाका में पाकिस्तानी सेना के आत्मसमर्पण को स्वीकार करने के लिए कहा गया, तो मानेकशॉ ने यह कहते हुए इनकार कर दिया कि यह सम्मान पूर्वी सेना कमांडर का है।

वह बेबाकी से अपनी बात रखते थे जिसका असर उनके रिटायरमेंट पर भी पड़ा। उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था, लेकिन जब उनकी मृत्यु हुई, तो 3 सेवा प्रमुखों में से कोई भी अंतिम संस्कार में शामिल नहीं हुआ।

पाकिस्तान के राष्ट्रपति याह्या खान ने मानेकशॉ की मोटरसाइकिल खरीदी, लेकिन इसकी कीमत नहीं चुकाई। 1971 के युद्ध के बाद मानेकशॉ ने इस  बारे में कहा, "आख़िरकार याह्या ने आधा देश देकर भुगतान कर दिया।"

1969 में सैम 8 गोरखा राइफल्स की एक बटालियन के दौरे पर गए थे। वहां पर उन्होंने एक गोरखा जवान से पूछा कि क्या तुम मुझे जानते हो? ऐसे में उसने सैम मानेकशॉ को सैम बहादुर कहा। सैम ने उस जवान को गले लगाया और उसके बाद से वह हमेशा सैम बहादुर के नाम से जाने गए।