Search Icon
Nav Arrow

पानी की कमी से घटने लगी थी खेती, एक शख्स बना डाले 350 टैंक, बचाया 65 लाख लीटर पानी

बच्ची सिंह बिष्ट के सभी दोस्त हालात देखकर गाँव छोड़कर चले गए लेकिन बच्ची ने गाँव में रहकर ही परिस्थितियों को बदलने के बारे में सोचा।

नैनीताल जिले के एक गाँव पाटा के निवासी बच्ची सिंह बिष्ट को लोग उनके काम के लिए बहुत सम्मान देते हैं। बिष्ट ने गाँवों में सिंचाई की समस्या को दूर करने में अहम भूमिका अदा की है। उन्होंने लोगों को जलवायु आधारित खेती के लिए प्रेरित किया। इसके साथ ही लोगों को साथ लेकर सात गाँवों की सिंचाई की समस्या को भी दूर कर दिया। उन्होंने इनमें पानी के 350 टैंक बना डाले। अब वह इन टैंकों के जरिये 65 लाख लीटर पानी का संरक्षण कर रहे हैं। ग्रामीण अपनी खेती की जरूरत के हिसाब से इन टैंकों से सिंचाई करते हैं। बच्ची को उनके इस कार्य के लिए क्षेत्र में हर कोई जानता है। बच्ची चाहते हैं कि पहाड़ के कोने कोने में ग्रामीण यह पहल करें और खेतों को सींचने का काम करें।

Uttarakhand
बच्ची सिंह बिष्ट

जनमैत्री संगठन बनाने से हुई शुरुआत 

बच्ची सिंह बिष्ट अपने छात्र जीवन से ही सामाजिक और पर्यावरण के क्षेत्र में सक्रिय रहे हैं। लोगों को इन मुद्दों पर जागरूक करने के लिए और एकजुट कर साथ लाने के लिए उन्होंने अपने तीन दोस्तों के साथ मिलकर आज से 28 साल पहले 1992 में जनमैत्री समूह का भी गठन किया था। बच्ची सिंह बिष्ट बताते हैं कि उनके साथ उनके मित्र महेश गलिया और महेश नयाल इस कार्य में साथ आए थे। यह अलग बात है कि बाद में रोजी रोटी की दौड़ में उनके दोनों दोस्तों ने दूसरे शहरों का रुख कर लिया, लेकिन बच्ची पहाड़ पर ही बने रहे। लोगों को जलवायु के अनुसार खेती और पर्यावरण के प्रति जागरूक करते रहे। उनकी कवायद रंग लाई है। लोग उनकी बातों को ध्यान से सुनते हैं और उन पर अमल करते हैं। उनके आइडिया गांव वालों की सूरत बदलने वाले होते हैं।

Advertisement

 

जमीन सूखने लगी तो 2005 में किया तस्वीर बदलने का फैसला

सामूहिक कार्य से तस्वीर बदलने का प्रयास

बच्ची सिंह बिष्ट बताते हैं कि पहाड़ में लगातार रिजार्ट बन रहे थे। प्राकृतिक स्रोतों का अप्राकृतिक और अवैज्ञानिक तरीके से दोहन हो रहा था। ऐसे में पानी स्रोतों में लगातार कमी आने लगी और गांवों में जमीन सूखने लगी। खेत बंजर होने लगे। इससे उन्हें चिंता हुई। बच्ची सिंह बताते हैं कि उन्होंने जलवायु परिवर्तन का सूफी, सतबुंगा, लोद, पाटा आदि गांवों में शोधार्थियों के साथ मिलकर बारीकी से अध्ययन किया था। इस क्षेत्र में बर्फबारी कम हो गई थी। इसके साथ ही सेब का उत्पादन भी गिर गया था। आलू और मटर की खेती भी प्रभावित होने लगी थी। ऐसे में केंद्र सरकार ने गोविंद वल्लभ पंत राष्ट्रीय हिमालय पर्यावरण शोध संस्थान के सहयोग से यहां माइक्रो लेवल पर जलवायु परिवर्तन के कारणों को पहचाना। बच्ची ने 2005 में जनमैत्री के जरिये ग्रामीणों में जलवायु के मुताबिक खेती को अलख जगाने और अपने प्रयासों से इस तस्वीर को बदलने का फैसला किया। उन्होंने वाटर टैंक के जरिये जल संरक्षण की बात पढ़ी थी। यहां उन्होंने इसे व्यावहारिक रूप देने की सोची।

Advertisement

 

एक दर्जन गांवों के ग्रामीणों को लिया साथ

Uttarakhand
ग्रामीण महिलाओं के साथ बच्ची सिंह

बच्ची सिंह बिष्ट ने लोद और पाटा गाँव के लोगों के साथ मिलकर वाटर टैंक बनवाने की कवायद शुरू कर दी। हालांकि शुरू में ग्रामीण आसानी से तैयार नहीं हुए, लेकिन जब उन्होंने उन्हें वॉटर टैंक से समस्या दूर होने से जुड़ी अन्य स्थानों की कहानियां सुनाईं तो वह इसके लिए तैयार हो गए। जन सहयोग से करीब एक दर्जन गांवों में लोगों को साथ लेकर उन्होंने गड्ढे खोदने शुरू कर दिए। शुरुआत लोद गांव से हुई। यहां पांच फीट गहरे और दस फीट लंबे और चौड़े गड्ढे खोदे गए। एक गड्ढे में प्लास्टिक को बिछाकर 10 हजार लीटर पानी संरक्षित किया गया। इससे ग्रामीणों को बहुत फायदा हुआ। वह खेती की जरूरत के मुताबिक इससे सिंचाई करने लगे। नदियों और दूसरे जल स्रोतों पर उनकी निर्भरता घट गई। एक वाक्य में कहें तो इससे जलस्रोतों को तोड़कर अपने खेतों तक लाने या उनके सूखने की स्थिति में आसमान की ओर देखने की उनकी विवशता खत्म हो गई।

Advertisement

 सिंचाई की दिक्कत खत्म, फसलों में किया बदलाव,

Uttarakhand
कुछ इस तरह के गड्ढों का निर्माण कर बनाये जाते हैं टैंक

बच्ची सिंह बिष्ट बताते हैं कि पहले किसान गेहूं, आलू, आडू, सेब की फसलें लगाते थे। बाद में उन्होंने संभावना देखते हुए विशेषज्ञों की सलाह से गोभी, बीन, मटर जैसी फसलों को बोना भी शुरू कर दिया। इसके अलावा सेब और आडू के बगीचों में भी वाटर टैंक बनाए गए थे। इन टैंकों के बनने के बाद अब पाटा गांव में सिंचाई की दिक्कत करीब करीब खत्म हो गई है। जनमैत्री संगठन ने 350 से अधिक वाटर टैंक बना दिए हैं। इस पूरे इलाके में करीब 65 लाख लीटर पानी जरूरतों के लिए संरक्षित कर लिया गया है। गांवों के लोग इनके बनने से बेहद खुश हैं। प्राकृतिक स्रोतों पर निर्भरता खत्म होने से सिंचाई अब उनके लिए कोई पत्थर तोड़ने जैसा मुश्किल काम नहीं रह गया है। वह अपने खेतों और फसलों का पोषण भली-भांति कर सकने में सक्षम हैं।

 सामूहिक सहभागिता से निकल सकता है मुश्किलों का हल

Advertisement
Uttarakhand
टैंक निर्माण में जुटे ग्रामीण

बच्ची सिंह बिष्ट ने कुमाऊं विश्वविद्यालय से एमए तक पढ़ाई की है। वह क्षेत्र की भौगोलिक परिस्थितियों, यहां की खेती, उस पर जलवायु परिवर्तन के असर को बखूबी समझते हैं। बच्ची का मानना है कि सामूहिक सहभागिता से पहाड़ पर जल संरक्षण से जुड़ी समस्याओं को दूर किया जा सकता है। इसके लिए पहाड़ के प्राचीन तरीकों को याद करते हैं, जिनमें वर्षा जल संरक्षण भी एक हैं। उनके अनुसार धीरे-धीरे लोग पुराने तरीकों को खारिज करने लगे, जिससे उनके लिए मुश्किल हो गई। वह हंसकर कहते हैं कि जीने का सही तरीका आज भी बड़े बुजुर्गों से ही सीखा जा सकता है। वह बच्चों को बचपन से ही इन प्राकृतिक और प्राचीन जल संरक्षण के तरीकों को सिखाने की पैरवी करते हैं। उनका कहना है कि वही बचेगा, जो प्रकृति के नजदीक रहेगा और इसके कार्य में दखल न देकर इसे पोषित करने का काम करेगा। इन दिनों कोरोना संक्रमण के चलते बच्ची बहुत सफर नहीं कर पा रहे। उनकी टैंक तैयार करने की कवायद भी रुकी हुई है। उन्हें भी इस बात का इंतजार है कि कब यह संक्रमण काल खत्म हो और वह अपने काम पर निकल सकें।

(बच्ची सिंह बिष्ट से उनके मोबाइल नंबर 8958381627 पर संपर्क किया जा सकता है )

यह भी पढ़ें- चीड़ के पत्तों से बिजली, फलों-फूलों से रंग और पहाड़ी कला, कुमाऊँ के इस अद्भुत सफर पर चलें?

Advertisement

यदि आपको इस कहानी से प्रेरणा मिली है, या आप अपने किसी अनुभव को हमारे साथ साझा करना चाहते हो, तो हमें hindi@thebetterindia.com पर लिखें, या Facebook और Twitter पर संपर्क करें। आप हमें किसी भी प्रेरणात्मक ख़बर का वीडियो 7337854222 पर व्हाट्सएप कर सकते हैं।

close-icon
_tbi-social-media__share-icon