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इंजीनियर ने नौकरी छोड़ चुनी खेती, शुरू की जीरो बजट फार्मिंग, गोबर से बनाते हैं कीटनाशक

बीटेक करने के बाद जहाँ ज़्यादातर लोग नौकरी की तलाश में मेट्रो शहरों के चक्कर काटते हैं, वहीं 32 साल के कमल ने खेती को अपना करियर चुना। आइये जानते हैं खेती ने उन्हें लाइफ में पैसे के अलावा और क्या-क्या दिया!

आज हम आपकी मुलाकात एक ऐसे शख्स से करवा रहे हैं, जिन्होंने बीटेक की डिग्री हासिल कर कुछ समय नौकरी की, लेकिन इसके बाद गाँव की पुकार पर खेती से जुड़ गए। खास बात यह है कि उन्होंने रासायनिक खेती की जगह प्राकृतिक खेती को महत्व दिया है।

मेरठ के कमल प्रताप तोमर ने शुरूआत में छह बीघा जमीन पर जीरो बजट खेती की लेकिन अब वह 12 बीघे में खेती कर रहे हैं।

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कमल

मेरठ के नजदीक सिसौली गाँव के कमल ने 2012 में बीटेक करने के बाद कुछ दिन नौकरी भी की। इसके बाद आगे की पढ़ाई के लिए जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी का एंट्रेंस टेस्ट दिया। कामयाब हुए, लेकिन उन्होंने आगे की पढ़ाई नहीं की। इसके बाद उन्होंने खेती की शुरूआत की।

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कमल ने द बेटर इंडिया को बताया, “करीब तीन साल पहले धान से जैविक खेती की शुरूआत की, लेकिन उसका मनमाफिक नतीजा नहीं निकला। हालाँकि मैं निराश नहीं हुआ। इसी विधि से मैंने गेहूँ की खेती शुरू की, जिसमें बेहतरीन फसल हुई। इसने मेरा हौसला बढ़ाया और आज मैं प्राकृतिक तरीके से मिश्रित खेती कर रहा हूँ।”

गेहूँ से 40 हजार का हुआ मुनाफा

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गेहूँ की फसल

गाँव के आसपास के लोग कमल की खेती के तरीके की तारीफ कर रहे हैं। जैविक खाद से नेचुरल फार्मिंग कर रहे कमल की फसल की बिक्री हाथों-हाथ हो जाती है। इस बार गेहूँ से उन्हें 40 हजार रुपये का मुनाफा हुआ। इतना ही नहीं, अब वह मिश्रित खेती कर रहे हैं। इस बार वह अरहर, उड़द, मूंग और बाजरा बो रहे हैं। इससे उन्हें 1.25 लाख रुपये की कमाई का अनुमान है।

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जीरो बजट फार्मिंग को दे रहे हैं बढ़ावा

32 वर्षीय कमल बताते हैं कि उनकी खेती का आधार गाय है। वह कहते हैं, “एक देसी गाय से इतना गोबर मिल जाता है कि पूरे साल बाजार से खाद खरीदने की जरूरत नहीं पड़ती। देसी गाय के एक ग्राम गोबर में तीन सौ से लेकर पांच सौ करोड़ तक माइक्रो बैक्टीरिया पाए जाते हैं। यह खेती के लिए बेहद आवश्यक है। गाय के गोबर और गोमूत्र से कई खाद बनाई जाती है। इसके साथ ही कीटनाशक भी तैयार किए जाते हैं। इनका मकसद कीटों को खत्म करना नहीं, क्योंकि शत्रु कीट होते हैं तो ढेरों मित्र कीट भी होते हैं। यह कीटनाशक शत्रु कीट को फसल खराब करने से रोकते हैं।”

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प्रकृतिक खाद का इस्तेमाल करने से हो रहा फायदा 

खुद ही गोमूत्र और गोबर से तैयार करते हैं जैविक खाद

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कमल खेती के लिए जैविक खाद जीवामृत भी खुद ही तैयार करते हैं। दरअसल जीवामृत सुभाष पालेकर जी द्वारा सुझाया गया बहुत ही आसान और किफायती तरीका है, जिसके जरिए किसान घर पर ही जैविक खाद बना सकते हैं।

कमल कहते हैं कि इससे धरती की उर्वरा शक्ति में बढ़ोत्तरी होती है और फसल भी रोग मुक्त रहती है। इसे बनाने का तरीका साझा करते हुए वह बताते हैं, “यह बेहद आसान प्रक्रिया है। सभी स्टेप्स निर्धारित हैं। एक एकड़ के लिए जीवामृत तैयार करने के लिए 10 किलो गोबर, 10 लीटर गोमूत्र का इस्तेमाल बहुत होता है। गोबर और गोमूत्र के साथ दो किलो गुड़, एक से दो किलो बेसन, बरगद या पीपल के पेड़ के नीचे की सौ ग्राम मिट्टी को मिलाकर 200 लीटर पानी के ड्रम्स में रखा जाता है। इस ड्रम को जूट की बोरी से ढ़ककर छाया में दो दिन के लिए रख देते हैं। सुबह शाम मिश्रण को घड़ी की सुई की दिशा में हिलाते हैं। यह भी ध्यान रखें कि यह घोल सप्ताह भर के लिए बहुत होता है।”

खुद बना रहे हैं घन जीवामृत

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कमल घन जीवामृत भी तैयार करते हैं। उन्होंने बताया कि घन जीवामृत सूखी खाद होती है। इसे बनाने के लिए 100 किलोग्राम गोबर, एक किलो गुड़, एक किलो बेसन, खेत की 100 ग्राम मिट्टी और 5 लीटर गोमूत्र लें। इन सभी चीजों को अच्छी तरह मिला लें। इसके बाद इन्हें दो दिन छाँव में रखकर जूट की बोरी से ढक दें। इस खाद को आप छह महीने तक इस्तेमाल में ला सकते हैं। एक क्विंटल घन जीवामृत एक एकड़ के लिए काफी है। इससे मिट्टी उपजाऊ होगी।

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कमल से प्राकृतिक खेती के गुर सीखने के लिए कई किसान आते हैं

कीट रोकने में भी बेहद प्रभावी है गोबर व गोमूत्र

कमल बताते हैं कि गोबर और गोमूत्र कीट पतंगों को रोकने में भी बहुत कारगर हैं। इसके लिए पंचगव्य तैयार करना होगा। पाँच किलो गोबर में 500 ग्राम देसी घी को मिलाएँ। इसे एक घड़े में कपड़े से ढककर रख दें। सुबह शाम चार दिन लगातार हिलाएँ। जब गोबर में घी की खुशबू आने लगे तो तीन लीटर गोमूत्र, दो लीटर गाय का दूध, दो लीटर दही, तीन लीटर गुड़ का पानी, 12 पके हुए केले पीसकर मिला लें। इस मिश्रण को 15 दिन रोज 10 मिनट तक हिलाएँ। एक लीटर पंचगव्य में 50 लीटर पानी मिला दें। यह मिश्रण एक एकड़ खेती के लिए काफी होगा। यह छह महीने तक खराब नहीं होता।

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कमल बीज तैयार कर किसानों को बाँटते भी हैं। उन्होंने अपने फार्म का नाम केशवम रखा है, जहाँ लोग उनकी खेती देखने के लिए आते हैं। अपने फार्म में उन्होंने इस बार लौकी की पैदावार में कुछ प्रयोग किए हैं, जिनके अच्छे परिणाम देखने को मिल रहे हैं।

केमिकल ने किया जमीन को खराब, नेचुरल फार्मिंग लौटा रही स्वरूप

कमल बताते हैं कि इंसानों के स्वास्थ्य को तो रासायनिक खेती की मार झेलनी ही पड़ रही है, इन रसायनों ने धरती को भी खराब किया है। उसकी उर्वरा शक्ति घट गई है। अब नेचुरल फार्मिंग जमीन को उसका वास्तविक स्वरूप लौटा रही है। वह बताते हैं कि घन जीवामृत से मिट्टी की उत्पादन क्षमता बढ़ती है।

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कमल कहते हैं कि नौकरी में केवल अपना ही भला होता, लेकिन खेती ने सबके लिए सोचने का मौका दिया। वह बताते हैं,  “खेती शुरू करने से पहले मैं कई किसानों और विशेषज्ञों से जाकर मिला। जीरो बजट खेती की जरूरतें समझी, इसके बाद पूरी एकाग्रता के साथ काम शुरू कर दिया।”

वह कहते हैं कि समाज में हर कोई उसे ही सफल मानता है जो पढ़ -लिखकर नौकरी करता है, जबकि यह सही बात नहीं है। वह सभी को आत्मनिर्भर बनने की सलाह देते हैं।

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