लड़कियों! सेक्स की बात मत करो

आज 2018 में नारियाँ आगे आ रही हैं और अपनी लैंगिकता और कामुकता के बारे में बात कर लेती हैं. पचास-सौ साल पहले ऐसा होना समाज को कितना असहज कर देता?

“मैं तुमसे सच्चा प्यार करता हूँ, तुम्हारे शरीर के बारे में सोचता भी नहीं”.
वाह! कितनी सुन्दर बात है. प्यार अच्छा है – प्यार सच्चा है, बतायें कि शारीरिक आकर्षण में क्या बुराई है?
छिः छी! हम कोई जानवर हैं क्या? उबरो मोहन! ऊपर उठो अपनी कुत्सित मानसिकता से!

सच में? कुत्सित मानसिकता?
कुत्सित मानसिकता??

‘लड़कों को सिर्फ़ शरीर चाहिए – और लड़की को प्यार’.. यह मनोविज्ञान सम्पूर्ण विश्व में मान्य है. और अब मान्य है तो सही ही होगा. है ना? नहीं जी, यह बकवास है. यह कैसे संभव हो सकता है? नर और मादा में शारीरिक आकर्षण प्राकृतिक रूप से होता है. बराबर ही होता होगा. आज 2018 में नारियाँ आगे आ रही हैं और अपनी लैंगिकता और कामुकता के बारे में बात कर लेती हैं. पचास-सौ साल पहले ऐसा होना समाज को कितना असहज कर देता? तो क्या अब ये ज़्यादा कामुक होती जा रही हैं? ‘कलियुग की पहचान है यह’, ऐसी टिप्पणी देने वाले विद्वान हमारे आसपास मौजूद हैं. क्या हिन्दू और क्या मुसलमान इस बात पर सभी सहमत होंगे कि नारी की लैंगिकता और कामुकता पर बातचीत भी सामजिक पतन की निशानी है. सेक्स गन्दी बात है. बच्चे पैदा होना ठीक है उनकी बात करो, सेक्स की बात मत करो.

शारीरिक आकर्षण प्रकृति की देन है, प्यार सभ्यता की.
विवाह सभ्यता की देन है.
एक पुरुष और एक स्त्री जीवन भर एक साथ रहें – विवाहेतर कामुकता पाप है – यह विचार सभ्यता की देन है.
समलैंगिकता पाप है..
बाई-सेक्सुआलिटी विकृति है..
वैसे ही ग्रुप सेक्स भी..
पैन-सेक्सुआलिटी, पॉली-एमोरी.. तौबा तौबा कितनी घटिया बातें हैं.. यह सब समाज की देन है. यह सब धर्म का दिया हुआ है. यह लेख इस बारे में नहीं है कि क्या सही है क्या ग़लत. मेरा प्रयास मात्र कुछ सवाल खड़े करना है. मेरा मानना है कि नारियों का सेक्स के बारे में पुरुषों की तरह खुल कर बात करना सामाजिक पतन नहीं वरन तरक्कीपसंद सामाजिकता है. हमारे समाज में सेक्स बहुत हो रहा है.. उस पर बात करना हमारी ज़रूरत है. बच्चों से सेक्स के बारे में बात करना आवश्यक है – आप नहीं करेंगे तो इंटरनेट उन्हें सब कुछ सिखा देगा और कहीं ऐसा न हो कि अठारह-उन्नीस के होने के पहले ही कोई जीवन भर साथ चलने वाली बीमारी घर ले आयें. जो मानसिक अभिघात उनके मासूम चेतन पर लगें वो अलग हैं.

अपने यहाँ कोई रिसर्च नहीं है लेकिन हमारे आसपास बेशुमार बलात्कार हो रहे हैं. इन्सेस्ट जैसी चीजों पर बात ही नहीं की जाती – किसी दिन आँकड़े आगे आये तो हाहाकार मच जाएगा. किसी भी मनोवैज्ञानिक और डॉक्टर से पूछ कर देखें कितना ज़्यादा इन्सेस्ट है उसका अंदाज़ा हो जाएगा आपको. सेक्स पर परदा डाल कर रखा जाता है. अनगिनत कुंठाएँ और बाहर किसी से मिलने के अवसरों की कमी की वजह से इन्सेस्ट की घटनाएँ ज़्यादा हैं. उस पर बात नहीं होती तो और भी ज़्यादा हैं.

फिर एक्स्ट्रा-मेरिटल अफ़ेयर? मुंबई जैसी जगह में विवाहेतर सम्बन्ध अब आम चलन जैसा प्रतीत होता है. बड़ी आसानी से कह दिया जाता है कि क्या करे बेचारा जब पत्नी ही इतनी कमीनी है. मुंबई को बदनाम करना आसान है, सदमा तब लगता है जब कहा जाय कि अहमदाबाद में विवाहेतर संबन्ध बहुत होते हैं, पूना में होते हैं, हैदराबाद में होते हैं, नागपुर में होते हैं, लखनऊ.. और छोटे शहरों / कस्बों में.. यूँ ही नहीं है कि वहाँ ‘भाभीजी घर पर हैं’ शिद्दत से देखा जाता है और प्रोफ़ेसर लोग सुबह की सैर पर कल शाम के एपिसोड की चर्चा करते हैं (आँखों देखी बात). यूँ ही नहीं है कि वहाँ ‘जीजा को लम्बो है हथियार’ जैसे लोकप्रिय गाने कस्बे-कस्बे मिलेंगे. कोई प्रकाश डालेगा कस्बाई समलैंगिकता पर? कितने लोगों का पहला सेक्स-अनुभव अपने ही जेंडर के साथ होता है. कोई आँकड़े नहीं मिलते इसके.. हाँ, यह सही है कि करीब 56% लड़के अपने बचपन में यौन शोषण का शिकार होते हैं.

पति-पत्नी के बीच भी सेक्स होता है, उस पर बात चीत नहीं होती. यहाँ तक कि लोग अपने आप से भी इस विषय पर बात करने से कतराते हैं. यौन कुंठाएँ एक बहुत बड़ी सामाजिक महामारी है. और सेक्स पर बातचीत नहीं करना एक बहुत बड़ा कारण है कुंठाएँ जन्मने का.

आज भी भारत में जो लड़कियाँ सेक्स पर आसानी से बात कर लेती हैं और मर्द उन्हें शाबासी देते हैं लेकिन सामने-सामने, पीठ पीछे उन पर विश्वास नहीं कर पाते – या इस चक्कर में रहते हैं कि देखो शायद एक दिन अपना भी नंबर लग जाए. लड़कियो! तुमसे इतना ही कहना है कि शायद तुम सब बहुत कुछ बदल सकती हो. इस लेख पर अपने वालिदैन से बातचीत करना भी एक शुरुआत हो सकती है. अपनी जान-पहचान वालों से, भांजियों-भतीजियों, मौसियों-मामियों-चाचियों से बात करने में न हिचकें.. इसे साझा कर लें (यह कोई बड़ी हिम्मत का काम नहीं कहलाएगा वैसे).

अर्शाना का यह वीडियो कहीं आपकी भावनाओं को आहत कर रहा है तो शायद आप भी कुँए के मेंढक ही हैं. अर्शाना इसे पढ़ रही हो तो मेरी तरफ़ से शाबासी क़ुबूल हो 🙂

Featured Image – A painting by Manish Gupta

लेखक –  मनीष गुप्ता

फिल्म निर्माता निर्देशक मनीष गुप्ता कई साल विदेश में रहने के बाद भारत केवल हिंदी साहित्य का प्रचार प्रसार करने हेतु लौट आये! आप ने अपने यूट्यूब चैनल ‘हिंदी कविता’ के ज़रिये हिंदी साहित्य को एक नयी पहचान प्रदान की हैं!


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